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    <title>जयपुर संपादकीय</title>
    <link>https://editor.manzill.com/</link>
    <description>प्रतिदिन सुबह 7 बजे की जयपुर संपादकीय</description>
    <language>hi</language>
    <lastBuildDate>Sun, 26 Jul 2026 04:56:34 +0000</lastBuildDate>
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      <title>&quot;भारत टैक्सी&quot;: गुलाबी शहर का नया ख्वाब?</title>
      <link>https://editor.manzill.com/2026-07-26/</link>
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      <pubDate>Sun, 26 Jul 2026 00:00:00 +0000</pubDate>
      <dc:creator>मंज़िल सुरोलिया</dc:creator>
      <description>गुलाबी नगरी की सड़कों पर एक और &apos;क्रांति&apos; का ढोल बजा है। मुख्यमंत्री ने &apos;भारत टैक्सी&apos; सेवा का उद्घाटन किया, बड़े-बड़े वादे हुए – ओला-उबर से 15% सस्ता। क्या यह…</description>
      <content:encoded><![CDATA[<h1 id="भारत-टैक्सी-गुलाबी-शहर-का-नया-ख्वाब">“भारत टैक्सी”: गुलाबी शहर का नया ख्वाब?</h1>

<h2 id="संपादक-की-राय">संपादक की राय</h2>

<p>गुलाबी नगरी की सड़कों पर एक और ‘क्रांति’ का ढोल बजा है। मुख्यमंत्री ने ‘भारत टैक्सी’ सेवा का उद्घाटन किया, बड़े-बड़े वादे हुए – ओला-उबर से 15% सस्ता। क्या यह वही कहानी नहीं, जो हम वर्षों से सुनते आ रहे हैं? नए रंग-रोगन के साथ पुरानी बोतल में नया शोरबा, बस नाम बदल दिया गया है। जनता को तो बस एक सवारी चाहिए, लेकिन हर बार उन्हें एक नया सपना थमा दिया जाता है।</p>

<p>दावा है कि यह ‘सहकारी’ मॉडल परिवर्तनकारी बदलाव लाएगा। परिवर्तन? क्या परिवर्तन होगा? क्या वे ऑटो वाले सुधर जाएंगे जो मीटर पर चलने से पहले सौ नखरे दिखाते हैं? क्या वे टैक्सी चालक अनुशासित हो जाएंगे जो मनमानी दरों पर यात्रियों को लूटते हैं? या फिर यह सिर्फ एक और सरकारी उपक्रम होगा, जो कुछ महीने शोर मचाएगा और फिर अपनी ही लागतों के बोझ तले हांफने लगेगा?</p>

<p>पूरे जयपुर के लिए सौ कैब। सिर्फ सौ! इस शहर की आबादी, इसकी सड़कों पर दौड़ती गाड़ियां, और हर दिन की यातायात समस्या। सौ टैक्सियां इस विशालकाय समस्या के सामने क्या हैं? एक बूंद, एक जुमला, एक फोटो-ऑप। यह समाधान नहीं, यह तो मजाक है, उस जनता के साथ जो हर सुबह बस स्टैंड या टैक्सी स्टैंड पर अपनी बारी का इंतज़ार करती है।</p>

<p>मंत्रियों के बयानों में यह “सहकारी क्षेत्र में परिवर्तनकारी बदलाव” है। वाह! क्या यह परिवर्तन तब आएगा जब 15% सस्ती सवारी ढूंढते-ढूंढते एक आम आदमी पंद्रह और जगह ठगा जाएगा? या जब इन सौ टैक्सियों को ढूंढने में उसका इतना समय और पैसा खर्च हो जाएगा कि वह ओला-उबर की महंगी सवारी को ही बेहतर समझने लगेगा? परिवर्तन अक्सर कागजों पर बड़ा लगता है, जमीन पर आते ही वह धूल चाटने लगता है।</p>

<p>यह पहली बार नहीं है जब सरकार ने परिवहन के क्षेत्र में ऐसे ‘मास्टरस्ट्रोक’ चलने की कोशिश की है। सरकारी बसों की बदहाली, निजी ऑपरेटरों की मनमानी, और फिर कुछ नई योजनाओं का ऐलान। क्या पिछली योजनाएं इतनी सफल थीं कि अब एक नई ‘भारत टैक्सी’ की जरूरत पड़ गई? या पुरानी विफलताओं को ढकने का यह एक और तरीका है? शहर के लोग इन कहानियों से अब थक चुके हैं।</p>

<p>ओला और उबर को टक्कर देने की बात हो रही है। ठीक है। लेकिन क्या सरकार पहले अपनी परिवहन व्यवस्था को इतना सक्षम नहीं बना सकती कि निजी प्लेयर्स को टक्कर देने के लिए उसे ऐसे “सहकारी” ढोंग रचने पड़ें? क्या यह एक स्वस्थ प्रतिस्पर्धा है, या सत्ता का सहारा लेकर बाजार में घुसने की एक चाल? अंतिम बोझ किसे उठाना पड़ेगा – सरकार को (हमारे टैक्स के पैसों से) या फिर उन ड्राइवरों को, जो इस नए जुमले के तले पिसेंगे?</p>

<p>सवालों की लंबी फेहरिस्त है, लेकिन जवाब हमेशा खामोश रहते हैं। गुलाबी नगर की सड़कों पर आज एक नई चमचमाती टैक्सी दौड़नी शुरू हुई है। कितने दिन दौड़ेगी? कितनी दूर जाएगी? और क्या यह सच में किसी की यात्रा को आसान बनाएगी, या सिर्फ सरकार के रिपोर्ट कार्ड में एक और बेजान आंकड़ा बन कर रह जाएगी? वक्त बताएगा, या शायद नहीं। शायद हम तब तक किसी और ‘क्रांति’ का ढोल सुनने को तैयार बैठे होंगे।</p>
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    </item>
    <item>
      <title>70 हज़ार करोड़ का सट्टा: यह शहर किसका है?</title>
      <link>https://editor.manzill.com/2026-07-25/</link>
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      <pubDate>Sat, 25 Jul 2026 00:00:00 +0000</pubDate>
      <dc:creator>मंज़िल सुरोलिया</dc:creator>
      <description>गुलाबी नगर में 70 हज़ार करोड़ रुपए का सट्टा? आँखें फटी की फटी रह जाती हैं ये आँकड़ा सुनकर। यह कौन सी अर्थव्यस्था है, जो खुलेआम हमारी नाक के नीचे पल रही थी और…</description>
      <content:encoded><![CDATA[<h1 id="70-हज़ार-करोड़-का-सट्टा-यह-शहर-किसका-है">70 हज़ार करोड़ का सट्टा: यह शहर किसका है?</h1>

<h2 id="संपादक-की-राय">संपादक की राय</h2>

<p>गुलाबी नगर में 70 हज़ार करोड़ रुपए का सट्टा? आँखें फटी की फटी रह जाती हैं ये आँकड़ा सुनकर। यह कौन सी अर्थव्यस्था है, जो खुलेआम हमारी नाक के नीचे पल रही थी और हमें ख़बर तक नहीं? क्या यह कोई समानांतर सरकार है, जिसकी अपनी डिजिटल सड़कें और अपने छिपे हुए बैंक हैं, और हमारी पुलिस, हमारी एजेंसियाँ अब तक सिर्फ़ तमाशा देख रही थीं?</p>

<p>750 फ़र्ज़ी कंपनियाँ, भुगतान के ऐसे रास्ते जहाँ से पैसा भूत की तरह आता-जाता रहा। हमें बताया जाता है कि हर छोटे से छोटे लेन-देन पर सरकार की पैनी नज़र है, हर पैनकार्ड, हर आधार नंबर खंगाला जाता है, लेकिन यहाँ तो हज़ारों करोड़ रुपए ऐसे हवा में उड़ रहे थे जैसे पतंग की डोर ही न हो। क्या हमारे चौकीदार इतनी गहरी नींद में थे कि ये पूरा बाज़ार उनके सपनों में भी नहीं दिखा?</p>

<p>और फिर आता है 19,600 करोड़ रुपए की जीएसटी चोरी का आंकड़ा। यह सिर्फ़ कागज़ों पर लिखी एक संख्या नहीं है। यह उन सड़कों का पैसा है जो कभी बनी नहीं, उन अस्पतालों का बजट है जहाँ आज भी मरीज़ ज़मीन पर लेटे हैं, उन स्कूलों की फीस है जो बच्चों से जबरन वसूली जाती है। यह हमारी जेब से निकला वो पैसा है जो कुछ लोगों ने अपने खेल में उड़ा दिया और व्यवस्था मुस्कुराती रही।</p>

<p>बात सिर्फ़ सट्टे की नहीं है। बात उस ‘फ़िनटेक नेटवर्क’ की है, जो ‘डम्मी फर्मों’ के जाल से इतना बड़ा साम्राज्य खड़ा कर लेता है। यह दिखाता है कि इस शहर की, इस प्रदेश की वित्तीय धमनियों में कौन सी गंदगी बह रही है। कौन से बड़े खिलाड़ी हैं, जिनकी शह पर यह सब खेल चल रहा था? क्या ये ‘शेल मर्चेंट’ सिर्फ़ मोहरे हैं, या पूरी बिसात ही इनकी है?</p>

<p>पुलिस की जाँच चौड़ी हो रही है, अख़बारों में सुर्ख़ियाँ बन रही हैं। लेकिन ज़रा सोचिए, इतने बड़े पैमाने पर यह खेल कितने समय से चल रहा होगा? क्या यह रातों-रात हुआ? या यह हमारे समाज में, हमारी व्यवस्था में एक कैंसर की तरह धीरे-धीरे फैल रहा था, और हमने तब तक आँखें मूंदे रखीं, जब तक यह एक विशालकाय दानव नहीं बन गया?</p>

<p>ये तो वही बात हुई कि घर में डाका पड़ा, और चोरों के जाने के बाद हमने दरवाज़े मज़बूत करने की बात शुरू की। असली सवाल यह नहीं है कि जाँच कितनी चौड़ी होगी, बल्कि यह है कि इस ‘चौड़े’ नेटवर्क को बनने ही क्यों दिया गया? कौन से अफ़सर, कौन से नेता इस खेल पर अपनी आँखें बंद रखे थे, या शायद उनसे ज़्यादा कुछ कर ही नहीं सकते थे?</p>

<p>इस ‘डिजिटल इंडिया’ में, जहाँ हर डेटा पर नज़र रखने का दावा है, वहाँ 70 हज़ार करोड़ रुपए का काला धन, एक समानांतर ‘ई-कॉमर्स’ की तरह चलता रहा। यह सिर्फ़ एक घोटाला नहीं, यह हमारे शासन की, हमारे कानून के राज की, और हमारे नैतिक ताने-बाने की खुली चुनौती है। इस शहर में, इस प्रदेश में, क्या वाकई कोई बचा है जो इन सट्टेबाज़ों की मर्ज़ी के बिना साँस ले सके?</p>
]]></content:encoded>
    </item>
    <item>
      <title>शाही थाली में मिलावट का स्वाद: चौखी ढाणी</title>
      <link>https://editor.manzill.com/2026-07-24/</link>
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      <pubDate>Fri, 24 Jul 2026 00:00:00 +0000</pubDate>
      <dc:creator>मंज़िल सुरोलिया</dc:creator>
      <description>जयपुर की पहचान क्या सिर्फ़ गुलाबी पत्थरों और लोक नृत्यों तक सीमित रह गई है? जब शहर के उस नामी-गिरामी प्रतिष्ठान में, जिसे हम &quot;राजस्थानी संस्कृति&quot; का पर्याय…</description>
      <content:encoded><![CDATA[<h1 id="शाही-थाली-में-मिलावट-का-स्वाद-चौखी-ढाणी">शाही थाली में मिलावट का स्वाद: चौखी ढाणी</h1>

<h2 id="संपादक-की-राय">संपादक की राय</h2>

<p>जयपुर की पहचान क्या सिर्फ़ गुलाबी पत्थरों और लोक नृत्यों तक सीमित रह गई है? जब शहर के उस नामी-गिरामी प्रतिष्ठान में, जिसे हम “राजस्थानी संस्कृति” का पर्याय मानते आए हैं, खाद्य सुरक्षा विभाग को नब्बे किलो मिलावटी काजू मिलते हैं, तो यह सिर्फ़ एक ख़बर नहीं, यह एक कड़वा तमाचा है हमारी संवेदनहीनता पर। चौखी ढाणी, जहाँ पर्यटक ‘शाही अनुभव’ लेने आते हैं, वहाँ काजू के नाम पर यह धोखा! क्या यही है हमारी मेहमाननवाज़ी?</p>

<p>यह घटना महज़ कुछ काजू के टुकड़ों की बात नहीं है। यह उस भरोसे की हत्या है जो एक शहर अपने iconic संस्थानों पर करता है। चौखी ढाणी सिर्फ़ एक रेस्तरां नहीं, यह एक ब्रांड है, एक अनुभव है, जिसे लोग परिवार के साथ, मेहमानों के साथ साझा करते हैं। क्या उस थाली में अब सिर्फ़ व्यंग्य परोसा जाएगा, जिसके हर कौर में मिलावट का ज़ायका घुला होगा?</p>

<p>सवाल तो खाद्य सुरक्षा विभाग पर भी उठता है। नब्बे किलो मिलावटी माल— क्या यह एक दिन में जमा हो गया था? क्या विभाग सिर्फ़ सुर्ख़ियों में आने के लिए ऐसे बड़े नामों पर छापा मारता है, या साल भर उसकी चौकसी इतनी पुख़्ता होती है कि ऐसे मामले पनप ही न सकें? या फिर यह सिर्फ़ एक औपचारिकता है, जो वक़्त-बेवक़्त निभाई जाती है?</p>

<p>हमें सोचना होगा, जब जयपुर का गौरव कहे जाने वाले स्थान पर गुणवत्ता से समझौता किया जा सकता है, तो शहर के गली-नुक्कड़ पर क्या हाल होगा? वहाँ कौन पूछता है, कौन देखता है? यह सिर्फ़ आर्थिक लाभ के लिए स्वास्थ्य से खिलवाड़ नहीं, यह उस सांस्कृतिक गरिमा को नीलाम करना है, जिसका ढोल हम हर मंच पर पीटते नहीं थकते।</p>

<p>यह ‘पधारो म्हारे देश’ का कौन सा नया संस्करण है, जहाँ मेहमानों को परोसे जाने वाले व्यंजनों में भी धोखा छिपा हो? क्या गुलाबी शहर की अब यही नई पहचान बनेगी कि यहाँ हर चमकती चीज़ सोना नहीं, बल्कि मिलावट का नया चेहरा है?</p>

<p>इस शहर ने हर चीज़ को अपनी बाहों में समेटा है — इतिहास, कला, व्यापार। लेकिन क्या इस सब के बीच हम नागरिक सुरक्षा और बुनियादी ईमानदारी को खो बैठे हैं? यह घटना सिर्फ़ एक चेतावनी नहीं, यह एक ज़ोरदार दस्तक है उन दरवाज़ों पर, जिनके पीछे मुनाफ़े की अंधी दौड़ में नैतिकता को बंधक बना लिया गया है।</p>

<p>तो अगली बार जब आप ‘शाही थाली’ का लुत्फ़ उठाने निकलें, तो ज़रा रुक कर सोचिएगा। क्या आप सचमुच शाही व्यंजन खा रहे हैं, या महज़ ‘धोखे’ का एक नया स्वाद चख रहे हैं, जिसे एक प्रतिष्ठित नाम की चाशनी में लपेटकर परोसा जा रहा है? जवाब, शायद, आपकी ज़ुबान पर नहीं, बल्कि आपके ज़मीर पर होगा।</p>
]]></content:encoded>
    </item>
    <item>
      <title>गुलाबी नगर में सुरक्षा का भाड़ा</title>
      <link>https://editor.manzill.com/2026-07-23/</link>
      <guid isPermaLink="true">https://editor.manzill.com/2026-07-23/</guid>
      <pubDate>Thu, 23 Jul 2026 00:00:00 +0000</pubDate>
      <dc:creator>मंज़िल सुरोलिया</dc:creator>
      <description>जयपुर की सड़कें आजकल बड़ी अजीब हो गई हैं। आप एक कैब बुक करते हैं, हवाई अड्डे तक पहुँचने की उम्मीद में बैठते हैं, और एक &apos;ऑफिस कैब&apos; का चालक &apos;प्रकृति के बुलाव&apos; का…</description>
      <content:encoded><![CDATA[<h1 id="गुलाबी-नगर-में-सुरक्षा-का-भाड़ा">गुलाबी नगर में सुरक्षा का भाड़ा</h1>

<h2 id="संपादक-की-राय">संपादक की राय</h2>

<p>जयपुर की सड़कें आजकल बड़ी अजीब हो गई हैं। आप एक कैब बुक करते हैं, हवाई अड्डे तक पहुँचने की उम्मीद में बैठते हैं, और एक ‘ऑफिस कैब’ का चालक ‘प्रकृति के बुलाव’ का बहाना बनाकर आपको जीवन भर का ऐसा सदमा दे जाता है, जिससे गुलाबी नगर की हर चमक फीकी पड़ जाती है। यह कोई गली का अनजान रिक्शा नहीं था, बल्कि एक पेशेवर सेवा थी, जिस पर विश्वास किया गया था।</p>

<p>विश्वास की इस ‘किराए’ वाली अर्थव्यवस्था में क्या हर यात्री सिर्फ़ एक संभावित शिकार है? एक शहर जो खुद को पर्यटन और मेहमानवाज़ी का केंद्र कहता है, वहाँ एक महिला को हवाई अड्डे तक जाने के लिए भी दरिंदों से जूझना पड़े, तो यह किस तरह की मेहमानवाज़ी है? क्या यह गुलाबी रंग सिर्फ़ पत्थरों पर चढ़ा है, या हमारी चेतना पर भी एक गुलाबी पर्दा डाल दिया गया है?</p>

<p>यह कहानी सिर्फ़ एक रात की काली घटना नहीं, यह उस व्यवस्था की सच्चाई है जहाँ ‘पृष्ठभूमि जाँच’ जैसे शब्द कागज़ों तक सिमट कर रह गए हैं। जब कोई चालक किसी प्रतिष्ठित ‘ऑफिस कैब’ का स्टीयरिंग संभालता है, तो एक अदृश्य अनुबंध होता है विश्वास का। वह अनुबंध एक ‘नेचर कॉल’ के बहाने पर तार-तार हो जाता है, और हम एक बार फिर उस खोखलेपन के सामने खड़े रह जाते हैं, जहाँ हर दावा एक मज़ाक बन जाता है।</p>

<p>फिर वही पुलिस की तत्परता, वही बयान, वही गिरफ्तारी, और फिर वही अगले शिकार का इंतज़ार। यह एक रस्म बन गई है। एक अपराध होता है, हंगामा मचता है, कुछ दिन सुर्ख़ियों में रहता है, और फिर कोई नई घटना उस पुरानी टीस को दबा देती है। शहर मुस्कुराता रहता है, पर्यटक आते-जाते रहते हैं, और भीतर ही भीतर वह घाव रिसता रहता है।</p>

<p>सवाल सिर्फ़ उस चालक का नहीं, सवाल उस हर व्यवस्था का है जो सुरक्षा का झाँसा देकर चलती है। क्या हमारे ऐप-आधारित यातायात समाधान सिर्फ़ सुविधा बेचते हैं, या सुरक्षा की भी कोई गारंटी देते हैं? क्या यह सिर्फ़ एक ‘बहाने’ की बात है, या यह हमारी पुरुषवादी मानसिकता का एक और वीभत्स चेहरा है जो मौका मिलते ही सामने आ जाता है?</p>

<p>हमने ‘स्मार्ट सिटी’ का सपना देखा था। क्या उस सपने में महिलाओं की सुरक्षा सिर्फ़ एक ‘फीचर’ बनकर रह जाएगी जिसे कभी ‘अपडेट’ नहीं किया जाएगा? या यह वही पुराना शहर है, जहाँ कुछ भी नहीं बदलता, बस नाम और तकनीक बदल जाती है, और दरिंदगी का रंग हमेशा गहरा रहता है?</p>

<p>कोई बताएगा, उस महिला ने हवाई अड्डे तक पहुँचने के लिए जो किराया चुकाया, उसमें उसके टूटे हुए भरोसे की कीमत भी शामिल थी क्या? यह शहर कब अपनी इस सचाई से आंखें मिलाएगा, या गुलाबी रंग के नशे में ही सब कुछ भुला देगा?</p>
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    </item>
    <item>
      <title>जयपुर-दिल्ली मार्ग पर टोल: किस विकास की कीमत?</title>
      <link>https://editor.manzill.com/2026-07-22/</link>
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      <pubDate>Wed, 22 Jul 2026 00:00:00 +0000</pubDate>
      <dc:creator>मंज़िल सुरोलिया</dc:creator>
      <description>जयपुर-दिल्ली मार्ग पर टोल नाकों की बढ़ी हुई दरें, एक बार फिर हमें इस बात पर सोचने को मजबूर करती हैं कि &quot;विकास&quot; की हमारी परिभाषा क्या है और इसकी कीमत कौन चुका…</description>
      <content:encoded><![CDATA[<h1 id="जयपुर-दिल्ली-मार्ग-पर-टोल-किस-विकास-की-कीमत">जयपुर-दिल्ली मार्ग पर टोल: किस विकास की कीमत?</h1>

<h2 id="संपादक-की-राय">संपादक की राय</h2>

<p>जयपुर-दिल्ली मार्ग पर टोल नाकों की बढ़ी हुई दरें, एक बार फिर हमें इस बात पर सोचने को मजबूर करती हैं कि “विकास” की हमारी परिभाषा क्या है और इसकी कीमत कौन चुका रहा है। क्या यह सिर्फ़ अंकगणित का खेल है, जहाँ सड़कों को बेहतर करने के नाम पर जेबें हल्की की जाती हैं, या इसके पीछे कोई गहरी विडंबना छिपी है?</p>

<p>आज फिर उन्हीं टोल नाकों पर वाहनों की कतारें लंबी होंगी, जहाँ हर गुजरता वाहनचालक अब पहले से ज़्यादा शुल्क देगा। नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया ने अपनी ‘मजबूरी’ का हवाला देते हुए दरें बढ़ाई हैं, मानो राजमार्गों का रखरखाव कोई आकस्मिक खर्च हो, न कि सतत विकास का हिस्सा। क्या यह “सुविधा शुल्क” है, या नागरिकों के धैर्य की परीक्षा लेने का नया तरीक़ा?</p>

<p>गुलाबी नगर से देश की राजधानी का सफ़र अब सिर्फ़ दूरी का नहीं, बल्कि जेब पर पड़ने वाले बोझ का भी प्रतीक बन गया है। जिन ‘विश्वस्तरीय’ सड़कों के वादे किए गए थे, उनका हिसाब-किताब आज भी आम आदमी की समझ से परे है। सड़कों पर गड्ढे, टूटी रेलिंग और बेतरतीब आवागमन की तस्वीरें अक्सर सोशल मीडिया पर तैरती दिखती हैं, लेकिन टोल की रसीद पर दर्ज राशि कभी घटती नहीं।</p>

<p>यह अजीबोगरीब न्याय है कि ‘बेहतर कनेक्टिविटी’ का जश्न मनाने वाले ही इसके लिए सबसे भारी कीमत चुकाते हैं। विकास के नाम पर हर रोज़ एक नई ईंट रखी जाती है, और उसकी लागत का हिसाब-किताब सीधे जनता की जेब से होता है। क्या यह सुविधा देने के बजाय एक तरह का कर नहीं है, जो बिना किसी बहस या सहमति के थोप दिया जाता है?</p>

<p>सवाल उठता है कि इन दरों को तय करने की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है? क्या इसमें जनता की राय का कोई मूल्य है? या यह सिर्फ़ अफ़सरशाही का एक अदृश्य हाथ है, जो अपनी सुविधानुसार बटन दबाकर लोगों के मासिक बजट में सेंध लगा देता है? जिस देश में हर छोटे-बड़े खर्च का हिसाब मांगा जाता है, वहाँ राजमार्गों के इस ‘महंगे विकास’ पर चुप्पी क्यों?</p>

<p>जयपुर, जो खुद को पर्यटन और व्यापार का केंद्र मानता है, उसके लिए यह रोज़मर्रा की हकीकत है। बाहर से आने वाले सैलानी और स्थानीय व्यापारी, सभी इस बढ़ी हुई कीमत को चुकाएंगे। क्या यह हमारे बढ़ते हुए शहर की छवि के अनुकूल है, या यह एक ऐसी अघोषित बाधा है जो आर्थिक गतिविधियों को धीमा करेगी?</p>

<p>यह सिर्फ़ टोल टैक्स की बात नहीं है। यह उस प्रवृत्ति की ओर इशारा करता है, जहाँ विकास को एकतरफ़ा तरीक़े से परिभाषित किया जाता है — लाभ कुछ के लिए और बोझ सबके लिए। एक दिन हम सिर्फ़ यह गिनते रह जाएंगे कि हमें अपने ही शहर से बाहर निकलने और वापस आने के लिए कितनी जेब ढीली करनी पड़ी।</p>
]]></content:encoded>
    </item>
    <item>
      <title>घर से दुकान: गुलाबी शहर में नया &apos;सेटबैक&apos;!</title>
      <link>https://editor.manzill.com/2026-07-21/</link>
      <guid isPermaLink="true">https://editor.manzill.com/2026-07-21/</guid>
      <pubDate>Tue, 21 Jul 2026 00:00:00 +0000</pubDate>
      <dc:creator>मंज़िल सुरोलिया</dc:creator>
      <description>गुलाबी नगरी की गलियों में एक नया &quot;झटका&quot; नियम आया है। अब घर को दुकान बनाना इतना आसान नहीं रहा। क्या खूब! एक शहर जो बरसों से अपनी ही धुन में अतिक्रमण और…</description>
      <content:encoded><![CDATA[<h1 id="घर-से-दुकान-गुलाबी-शहर-में-नया-सेटबैक">घर से दुकान: गुलाबी शहर में नया ‘सेटबैक’!</h1>

<h2 id="संपादक-की-राय">संपादक की राय</h2>

<p>गुलाबी नगरी की गलियों में एक नया “झटका” नियम आया है। अब घर को दुकान बनाना इतना आसान नहीं रहा। क्या खूब! एक शहर जो बरसों से अपनी ही धुन में अतिक्रमण और अव्यवस्था का राग अलाप रहा था, अचानक उसे ‘प्लानिंग’ की सुध आ गई?</p>

<p>कहा जाता है कि यह शहरी नियोजन और सुव्यवस्थित विकास के लिए है। तर्क वही घिसे-पिटे, ‘बढ़ते दबाव’ और ‘बेतरतीब विस्तार’ के। पर क्या सच में ऐसा है, या यह सिर्फ़ एक और नया जाल है, जहाँ हर कागज़, हर हस्ताक्षर पर एक नई कीमत तय होगी? क्या गुलाबी रंग अब सिर्फ़ “रिश्वत” के लिफाफों पर ही चढ़ेगा?</p>

<p>ज़रा सोचिए, उस छोटे व्यापारी का क्या, जिसने बरसों पहले अपने पुश्तैनी घर का निचला हिस्सा दुकान में बदला था, बिना किसी ‘सेटबैक’ के? या वह, जो अब अपने बुढ़ापे में दो पैसे कमाने के लिए घर में ही कोई छोटा व्यवसाय शुरू करना चाहता है? क्या शहर की हर दीवार अब सरकार की अनुमति की मोहताज होगी? क्या जयपुर को सिर्फ़ बड़े-बड़े मॉल और फाइव-स्टार होटल ही चाहिए?</p>

<p>यह नियम सिर्फ़ कागज़ों पर एक नई लकीर नहीं है। यह सरकारी बाबुओं के लिए एक नया ‘खजाना’ खोलने जैसा है। ‘सेटबैक’ नियमों का जाल इतना उलझा हुआ होगा कि उसे सुलझाने के लिए अलग से ‘मार्गदर्शक’ पैदा होंगे, और हर मार्गदर्शक की अपनी ‘फीस’। यह विकास नहीं, ‘अटकाओ और कमाओ’ का नया अध्याय है।</p>

<p>जिस शहर में अनाधिकृत कॉलोनियाँ रातों-रात कट जाती हैं, जहाँ बड़े-बड़े अतिक्रमण सालों तक आँखें मूंद कर देखे जाते हैं, वहाँ अब रिहायशी इमारतों के व्यावसायिक उपयोग पर ‘नियमों की तलवार’ चलेगी। वाह रे न्याय! क्या यह सिर्फ़ दिखावा नहीं कि हम व्यवस्था सुधार रहे हैं, जबकि असल में हम सिर्फ़ छोटे लोगों के रास्ते में और कांटे बिछा रहे हैं?</p>

<p>यकीन मानिए, इस नियम का डंडा सिर्फ़ उन पर चलेगा, जिनके पास बचाने वाला कोई नहीं। जो पहुँच वाले हैं, जो सत्ता के गलियारों में ‘नमस्ते’ कर सकते हैं, उनके लिए यह नियम भी एक ‘छूट’ का रास्ता निकाल लेगा। बड़े बिल्डर और प्रभावी व्यवसायी कभी ‘सेटबैक’ में नहीं आते, आते हैं तो सिर्फ़ गरीब और मध्यम वर्ग के लोग।</p>

<p>तो क्या जयपुर अब सिर्फ़ कागज़ी नियमों का शहर बनकर रह जाएगा, जहाँ हर छोटे बदलाव के लिए सरकार की इजाज़त और उसकी कीमत चुकानी होगी? क्या ‘गुलाबी शहर’ की पहचान अब सिर्फ़ फाइलों में दबे, लाल-पीले होते नक्शों से होगी? या फिर, यह नया नियम सिर्फ़ एक और ‘खेल’ है, जिसका असली मक़सद कुछ और ही है, जो आम जनता की समझ से परे है?</p>
]]></content:encoded>
    </item>
    <item>
      <title>न्याय की कुर्सी पर मुकदमे का इंतज़ार</title>
      <link>https://editor.manzill.com/2026-07-20/</link>
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      <pubDate>Mon, 20 Jul 2026 00:00:00 +0000</pubDate>
      <dc:creator>मंज़िल सुरोलिया</dc:creator>
      <description>गुलाबी नगर में आज एक अजीब सा सन्नाटा पसरा है। यह सन्नाटा उन सवालों का है जो हवा में तैर रहे हैं, पर कोई उन्हें सुनना नहीं चाहता। जब प्रदेश के पाँच माननीय…</description>
      <content:encoded><![CDATA[<h1 id="न्याय-की-कुर्सी-पर-मुकदमे-का-इंतज़ार">न्याय की कुर्सी पर मुकदमे का इंतज़ार</h1>

<h2 id="संपादक-की-राय">संपादक की राय</h2>

<p>गुलाबी नगर में आज एक अजीब सा सन्नाटा पसरा है। यह सन्नाटा उन सवालों का है जो हवा में तैर रहे हैं, पर कोई उन्हें सुनना नहीं चाहता। जब प्रदेश के पाँच माननीय मंत्रियों और तेरह विधायकों पर आपराधिक मुकदमे धूल फाँक रहे हों, तो न्याय की देवी की आँख पर बंधी पट्टी भी शायद तिरछी हो जाती होगी। अदालतें तारीख़ पर तारीख़ देती हैं, पर क्या कोई हिसाब रखता है कि ये तारीख़ें कितनों के सपनों को निगल जाती हैं और कितनों के हौसलों को तोड़ देती हैं?</p>

<p>विधानसभा के गलियारों में घूमते हुए इन ‘जनसेवकों’ को देखकर क्या कभी किसी को यह नहीं लगता कि इनके सिर पर कानून की तलवार नहीं, बल्कि एक लटकती हुई तख्ती है जिस पर ‘विचाराधीन’ लिखा है? जनता से उम्मीद की जाती है कि वह कानून का पालन करे, हर नियम माने, चालान कटवाए, पर उन्हीं पर कानून लागू करने वाले, या यूँ कहें कि कानून बनाने वाले, खुद कानून की गिरफ़्त से बाहर क्यों दिखते हैं?</p>

<p>एक मुकदमा तो सिर्फ़ गवाहों के न आने के कारण अटका पड़ा है। कल्पना कीजिए, एक आम आदमी का मामला होता तो क्या होता? क्या पुलिस उस गवाह को ढूँढ नहीं लाती, या खुद अदालत ही उसे तलब करने के लिए पूरा तंत्र झोंक देती? पर यहाँ बात ‘माननीयों’ की है। शायद उनके रसूख की परछाई इतनी लंबी है कि गवाह उस तक पहुँचते-पहुँचते रास्ता भटक जाते हैं।</p>

<p>यह सिर्फ़ लंबित मुकदमों का आँकड़ा नहीं है, यह उस व्यवस्था का चेहरा है जहाँ सत्ता की ताक़त न्याय की रफ़्तार को तय करती है। ये वही लोग हैं जो मंचों से सुशासन और पारदर्शिता के दावे करते हैं। इन्हीं के भाषणों में कानून का राज स्थापित करने की बातें होती हैं। पर जब आईना उनके अपने गिरेबाँ में झाँकने को कहता है, तो या तो आईना तोड़ दिया जाता है, या उसे धुँधला बता दिया जाता है।</p>

<p>एक तरफ़ आम नागरिक छोटी सी गलती के लिए महीनों जेल में सड़ता है, तो दूसरी तरफ़ जिनके नाम के आगे ‘मंत्री’ या ‘विधायक’ जुड़ा है, उन पर संगीन आरोप होने के बावजूद वे आज़ादी से घूमते हैं, जनसभाएँ करते हैं और अगली कुर्सी की जुगत में लगे रहते हैं। क्या यह दोहरा मापदंड नहीं है? क्या यह न्याय की सबसे बड़ी विडंबना नहीं कि जिन हाथों में कानून की रखवाली की जिम्मेदारी है, उन्हीं पर कानून के उल्लंघन के आरोप हैं?</p>

<p>हम गुलाबी नगर के नागरिक सदियों से देखते आ रहे हैं कि कैसे सत्ता के केंद्र में बैठे लोग खुद को आम नियमों से ऊपर समझते हैं। चाहे वह अवैध अतिक्रमण हो या भ्रष्टाचार का कोई छोटा-मोटा खेल, जब तक कोई ‘बड़ा नाम’ शामिल न हो, तब तक कानून की लाठी सिर्फ़ कमज़ोर पर बरसती है। इन मुकदमों का लंबित रहना कोई संयोग नहीं, यह एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा लगता है।</p>

<p>सवाल यह नहीं कि वे निर्दोष हैं या दोषी। सवाल यह है कि न्याय की प्रक्रिया उनके लिए इतनी सुस्त और सुविधाजनक क्यों है? क्या कानून की किताब में ‘माननीय’ के लिए अलग से कोई अध्याय है, जहाँ तारीख़ें अपनी मर्ज़ी से चलती हैं और सबूत अपनी शक्ल बदलने में आज़ाद होते हैं? या फिर हमारी अदालतों को भी पता है कि इस खेल का असली नतीजा क्या होना है, इसलिए वे सिर्फ़ वक्त काट रही हैं?</p>

<p>यह उन मतदाताओं के साथ सीधा मज़ाक है जिन्होंने उन्हें चुना है। यह उन सभी के साथ अन्याय है जो न्याय की उम्मीद लगाए कोर्ट-कचहरी के चक्कर काटते हैं। क्या हम सिर्फ़ यही मान लें कि हमारे ‘माननीय’ तब तक निर्दोष हैं जब तक उनकी कुर्सी सलामत है? और अगर हाँ, तो फिर न्याय का यह नाटक कब तक चलेगा?</p>
]]></content:encoded>
    </item>
    <item>
      <title>हवेली का &apos;ख़ज़ाना&apos;: खुदाई किसकी, कमाई किसकी?</title>
      <link>https://editor.manzill.com/2026-07-19/</link>
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      <pubDate>Sun, 19 Jul 2026 00:00:00 +0000</pubDate>
      <dc:creator>मंज़िल सुरोलिया</dc:creator>
      <description>जयपुर की पुरानी हवेलियों में जब खुदाई होती है, तो अक्सर उम्मीद होती है कि इतिहास की कोई परत खुलेगी। लेकिन, &apos;बॉम्बे वालों की हवेली&apos; में जो खुला, वह इतिहास से…</description>
      <content:encoded><![CDATA[<h1 id="हवेली-का-ख़ज़ाना-खुदाई-किसकी-कमाई-किसकी">हवेली का ‘ख़ज़ाना’: खुदाई किसकी, कमाई किसकी?</h1>

<h2 id="संपादक-की-राय">संपादक की राय</h2>

<p>जयपुर की पुरानी हवेलियों में जब खुदाई होती है, तो अक्सर उम्मीद होती है कि इतिहास की कोई परत खुलेगी। लेकिन, ‘बॉम्बे वालों की हवेली’ में जो खुला, वह इतिहास से ज़्यादा वर्तमान के लालच की कहानी है। अचानक ज़मीन से निकली तिजोरी और सोने के घड़ों की अफवाहें, गुलाबी नगर में सदियों से दबी पड़ी उस भूख को फिर जगा गई हैं, जिसका नाम है – अनायास मिला धन।</p>

<p>यह कैसी खुदाई थी, जिसमें ठेकेदार को ‘ख़ज़ाना’ पहले दिखा? या यह सिर्फ़ एक इत्तेफ़ाक था कि हवेली का नया ख़रीदार और खुदाई करने वाला ठेकेदार, दोनों ही अचानक ‘अतीत के विशेषज्ञ’ बन बैठे? एक तिजोरी गायब होने के दावे के साथ, हर हाथ उस कथित ‘ख़ज़ाने’ की ओर ऐसे लपका है, मानो ज़मीन ने नहीं, बल्कि किस्मत ने खुद उन्हें पुकारा हो।</p>

<p>राज्य का नियम कहता है कि ज़मीन के नीचे जो कुछ भी है, वह सरकार का है। लेकिन, जब तक घड़े मिट्टी में दबे थे, तब तक किसी को परवाह नहीं थी। अब जब उनके अंदर से सोना झाँकने लगा है, तो अचानक क़ानून के रखवाले भी सक्रिय हो गए हैं। यह सक्रियता अगर पहले होती, तो शायद ऐसी ‘खोज’ और ‘चोरी’ के दावों का खेल ही शुरू न होता।</p>

<p>जयपुर, जो अपने शाही वैभव और समृद्ध विरासत के लिए जाना जाता है, आज उसी विरासत के टुकड़ों पर लड़ रहा है। ‘बॉम्बे वालों की हवेली’ की दीवारों में क्या सिर्फ़ ईंट-पत्थर थे या सदियों से दबी उम्मीदें और लालच? यह विडंबना है कि जिस शहर की पहचान ही उसके गौरवशाली इतिहास से है, वहीं ज़मीन से निकला कोई भी अवशेष संग्रहालय में पहुँचने से पहले ही अदालती मुकदमों और निजी झगड़ों की भेंट चढ़ जाता है।</p>

<p>एक तरफ़ आम आदमी मामूली दस्तावेज़ों के लिए सरकारी दफ़्तरों के चक्कर काटता है, तो दूसरी तरफ़ कुछ ‘भाग्यशाली’ लोग ज़मीन खोदते ही अकूत संपत्ति के मालिक बनने के सपने देखने लगते हैं। इस तथाकथित ‘ख़ज़ाने’ की एक तिजोरी ग़ायब होने की ख़बर बताती है कि प्रशासन की आँखें तब खुलती हैं, जब ‘अमूल्य’ वस्तुएँ अदृश्य हो जाती हैं, न कि तब जब उन्हें खोजा जा रहा होता है।</p>

<p>क्या यह ‘ख़ज़ाना’ कभी सार्वजनिक होगा? क्या यह कभी राज्य के कोष में पहुँचेगा और जनता के विकास के लिए इस्तेमाल होगा? या फिर यह भी उन अनगिनत कहानियों में से एक बन कर रह जाएगा, जहाँ ‘खोज’ का शोर होता है, ‘दावों’ की लड़ाई होती है, और अंत में सिर्फ़ ‘अदृश्य’ हो जाने की ख़बर आती है? ज़मीन से निकला सोना अक्सर नेताओं और अफ़सरों की जेबों में ही समा जाता है, इतिहास गवाह है।</p>

<p>यह पहली बार नहीं है और न ही आख़िरी होगा कि ऐसी कहानियाँ सुर्ख़ियाँ बनेंगी। हर कुछ समय बाद, राजस्थान की मिट्टी अपने गर्भ से ऐसे ‘आश्चर्य’ उगलेगी, और हर बार वही नाटक दोहराया जाएगा। लालच का वही खेल, क़ानून की वही धीमी चाल, और जनता की वही बेबसी जो सिर्फ़ तमाशा देखती रह जाती है।</p>

<p>तो सवाल यह नहीं कि ज़मीन से सोना निकला या नहीं। सवाल यह है कि गुलाबी नगर में कब तक सिर्फ़ ज़मीन के नीचे दबे ‘ख़ज़ाने’ ही दिखेंगे, और कब यहाँ की व्यवस्था के अंदर दबी ईमानदारी और जवाबदेही की उम्मीद जगेगी? शायद यह ‘ख़ज़ाना’ हमें फिर एक बार आईना दिखा रहा है कि असली ‘गड़े मुर्दे’ हमारी नियत में हैं, ज़मीन में नहीं।</p>
]]></content:encoded>
    </item>
    <item>
      <title>जनाना का अँधेरा, सरकारी उजियारा</title>
      <link>https://editor.manzill.com/2026-07-18/</link>
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      <pubDate>Sat, 18 Jul 2026 00:00:00 +0000</pubDate>
      <dc:creator>मंज़िल सुरोलिया</dc:creator>
      <description>गुलाबी नगर के जनाना अस्पताल में जब बिजली गुल हुई, तब क्या किसी ने सोचा कि ऑपरेशन टेबल पर पड़ा मरीज़ किस अंधेरे में डूब गया होगा? यह सिर्फ़ कुछ मिनटों का…</description>
      <content:encoded><![CDATA[<h1 id="जनाना-का-अँधेरा-सरकारी-उजियारा">जनाना का अँधेरा, सरकारी उजियारा</h1>

<h2 id="संपादक-की-राय">संपादक की राय</h2>

<p>गुलाबी नगर के जनाना अस्पताल में जब बिजली गुल हुई, तब क्या किसी ने सोचा कि ऑपरेशन टेबल पर पड़ा मरीज़ किस अंधेरे में डूब गया होगा? यह सिर्फ़ कुछ मिनटों का व्यवधान नहीं था; यह उस व्यवस्था के खोखलेपन का सीधा प्रदर्शन था जो जीवन बचाने के सबसे बुनियादी साधन को भी अक्षुण्ण रखने में असमर्थ है।</p>

<p>जयपुर को ‘स्मार्ट सिटी’ और ‘विश्वस्तरीय’ बनाने के दावे करने वालों से कोई पूछे कि उस अंधेरे ऑपरेशन थिएटर में क्या ‘विश्वस्तरीय’ था? क्या खून के इंतज़ार में पड़ी नन्ही ज़िंदगी को ‘स्मार्ट’ बिजली के वादे से बचाया जा सकता था, जब रक्त बैंक के रेफ्रिजरेटर दम तोड़ रहे थे?</p>

<p>यह सिर्फ़ एक ‘तकनीकी ख़राबी’ का बहाना नहीं हो सकता। यह उस लापरवाही का परिणाम है जो हमारी सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की रीढ़ को दीमक की तरह खा रही है। क्या जनरेटर चलाने के लिए ईंधन नहीं था, या उसकी जाँच करने की फुर्सत नहीं थी? या फिर, नागरिकों की ज़िंदगी की क़ीमत इतनी सस्ती हो चुकी है कि ऐसे हादसों पर केवल कंधा उचका कर आगे बढ़ जाया जाता है?</p>

<p>उस दिन, कई परिवारों की उम्मीदें उन बंद पड़े उपकरणों के साथ ठहर गई होंगी। क्या किसी ने उन आँखों में झाँका, जो अपने प्रियजनों की सलामती के लिए दुआ कर रही थीं, और अचानक एक छोटे से स्विच के बंद होने से उनकी दुनिया थमने लगी? प्रशासन के लिए यह एक और फ़ाइल होगी, पर पीड़ित के लिए ज़िंदगी और मौत के बीच का फ़र्क।</p>

<p>अफ़सरशाही की मोटी चमड़ी पर ऐसे वाकये कोई असर नहीं करते। एक जाँच बिठा दी जाएगी, कुछ काग़ज़ों पर हस्ताक्षर होंगे, और फिर वही पुरानी चाल। किसी को सज़ा नहीं मिलेगी, किसी की जवाबदेही तय नहीं होगी। क्योंकि यहाँ तो ‘काम’ कागज़ों पर होता है, ज़मीनी हक़ीक़त से उसका कोई संबंध नहीं।</p>

<p>यह सिर्फ़ जनाना अस्पताल का मुद्दा नहीं, यह उस पूरे तंत्र का आईना है जहाँ बड़ी-बड़ी योजनाओं की बातें तो होती हैं, पर बुनियादी सुविधाओं को हमेशा अनदेखा किया जाता है। जब शहर बड़े-बड़े वादों की इमारतें खड़ी करने में व्यस्त है, तब मूलभूत सुविधाओं की नींव क्यों चरमरा रही है?</p>

<p>हमारी आँखों के सामने यह सब होता है, और हम चुपचाप देखते रहते हैं। क्या हम अपनी सरकारों से यह भी नहीं पूछ सकते कि क्या हमारा जीवन इतना सस्ता है कि एक मामूली बिजली कट भी हमें मौत के मुहाने तक धकेल सकता है? या फिर, अब हमने मान लिया है कि यही हमारी नियति है?</p>

<p>अगली बार जब कोई नेता मंच से विकास के बड़े-बड़े दावे करेगा, तो ज़रा उस अंधेरे ऑपरेशन थिएटर की कल्पना कर लीजिएगा। शायद तब हमें ‘उजियारे’ और ‘अंधेरे’ के बीच का असली फ़र्क समझ आएगा।</p>
]]></content:encoded>
    </item>
    <item>
      <title>जनाना अस्पताल: जीवन की उम्मीदों पर अँधेरा</title>
      <link>https://editor.manzill.com/2026-07-17/</link>
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      <pubDate>Fri, 17 Jul 2026 00:00:00 +0000</pubDate>
      <dc:creator>मंज़िल सुरोलिया</dc:creator>
      <description>जनाना अस्पताल, जहाँ जीवन का पहला अध्याय लिखा जाता है, वहाँ ऑपरेशन थिएटर की बत्तियाँ बुझ जाएं और रक्त बैंक ठप्प पड़ जाए – क्या यह सिर्फ़ एक इत्तफ़ाक था, या…</description>
      <content:encoded><![CDATA[<h1 id="जनाना-अस्पताल-जीवन-की-उम्मीदों-पर-अँधेरा">जनाना अस्पताल: जीवन की उम्मीदों पर अँधेरा</h1>

<h2 id="संपादक-की-राय">संपादक की राय</h2>

<p>जनाना अस्पताल, जहाँ जीवन का पहला अध्याय लिखा जाता है, वहाँ ऑपरेशन थिएटर की बत्तियाँ बुझ जाएं और रक्त बैंक ठप्प पड़ जाए – क्या यह सिर्फ़ एक इत्तफ़ाक था, या हमारी व्यवस्था की शिराओं में दौड़ता बिजली का वह करंट, जो अब बेजान हो चुका है? गुलाबी शहर की चकाचौंध में यह स्याह सच कितने चेहरों से नक़ाब उठा रहा है।</p>

<p>तीन घंटे का अँधेरा! ये सिर्फ़ समय की इकाई नहीं, उन माओं की धड़कनें थीं, उन शिशुओं का भविष्य था, जो शायद किसी ऑपरेशन टेबल पर पड़े होंगे। जब अस्पताल ही अपनी सांसें रोकने लगे, तो मरीज़ किस उम्मीद से भीतर आएँ? क्या ‘आपातकाल’ शब्द सिर्फ़ फाइलों में सिमट कर रह गया है?</p>

<p>सवाल उठता है कि क्या जयपुर में बिजली का कटना कोई नई बात है? दशकों से यह शहर अनियमित बिजली कटौती का आदी रहा है। पर एक अस्पताल, जहाँ हर पल जीवन-मृत्यु का खेल चलता है, वहाँ के लिए वैकल्पिक व्यवस्था कहाँ थी? क्या जेनरेटर सिर्फ़ सजावट के लिए हैं, या उनकी देखभाल भी उतनी ही शिद्दत से होती है, जितनी नेताओं के काफिलों की?</p>

<p>हमें बताया जाता है कि जयपुर ‘स्मार्ट सिटी’ बन रहा है, विश्व स्तरीय सुविधाएँ मिल रही हैं। पर जब एक सरकारी अस्पताल तीन घंटे तक अँधेरे में डूबा रहे, तो कौन-सी स्मार्टनेस और कौन-सी विश्व-स्तरीय सुविधा की बात करते हैं हम? यह ‘विकास’ का कौन-सा मॉडल है, जहाँ नींव ही जर्जर हो?</p>

<p>इस घटना पर भी वही पुरानी रस्मी प्रतिक्रियाएँ आएँगी। ‘जाँच कमेटी’ का गठन होगा, कागज़ों का पेट भरा जाएगा, और कुछ दिनों बाद यह मामला भी शहर के शोर में कहीं दब जाएगा। किसी की जवाबदेही तय नहीं होगी, किसी पर कोई गाज नहीं गिरेगी। क्योंकि इस शहर में ‘लापरवाही’ एक सरकारी विभाग का स्थायी सदस्य बन चुकी है।</p>

<p>यह सिर्फ़ बिजली की आपूर्ति का मसला नहीं, यह उस मानसिक अंधेपन का प्रतीक है, जो व्यवस्था को भीतर से खोखला कर रहा है। जब सत्ता के गलियारों में बैठे लोग अपनी वातानुकूलित इमारतों से बाहर निकलकर ज़मीनी हकीकत देखेंगे, तब शायद उन्हें एहसास होगा कि यह अँधेरा सिर्फ़ अस्पताल में नहीं, हमारी नागरिकता की चेतना में भी घुसपैठ कर रहा है।</p>

<p>अगली बार जब कोई बच्चा या माँ सिर्फ़ इस वजह से मौत के मुँह में समा जाए कि किसी ने एक स्विच ऑन रखना ज़रूरी नहीं समझा, तब क्या हम उसे सिर्फ़ ‘दुर्घटना’ कहकर पल्ला झाड़ लेंगे? या उस दिन हम पूछेंगे, कि हमारी उम्मीदों के इस जनाना अस्पताल में, आखिर कब तक अँधेरा रहेगा?</p>
]]></content:encoded>
    </item>
    <item>
      <title>खाकी का तबादला, जनता का क्या?</title>
      <link>https://editor.manzill.com/2026-07-16/</link>
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      <pubDate>Thu, 16 Jul 2026 00:00:00 +0000</pubDate>
      <dc:creator>मंज़िल सुरोलिया</dc:creator>
      <description>जयपुर के थानों में हर कुछ दिनों बाद कुर्सियां घूमती हैं, नाम बदलते हैं, और कागज़ों पर एक नई &apos;व्यवस्था&apos; अवतरित होती है। क्या वाकई यह फेरबदल किसी बड़ी समस्या का…</description>
      <content:encoded><![CDATA[<h1 id="खाकी-का-तबादला-जनता-का-क्या">खाकी का तबादला, जनता का क्या?</h1>

<h2 id="संपादक-की-राय">संपादक की राय</h2>

<p>जयपुर के थानों में हर कुछ दिनों बाद कुर्सियां घूमती हैं, नाम बदलते हैं, और कागज़ों पर एक नई ‘व्यवस्था’ अवतरित होती है। क्या वाकई यह फेरबदल किसी बड़ी समस्या का हल है, या बस वह चिरपरिचित बहाना है जो हमारी नौकरशाही दशकों से ढूंढती आई है – कि समस्या को ठीक करने से बेहतर है, उसे एक जगह से उठाकर दूसरी जगह रख देना? गुलाबी नगरी की गलियों में यह खेल कोई नया नहीं, पर हर बार यह सवाल उतनी ही शिद्दत से पूछता है: इन तबादलों से किसे फ़र्क पड़ता है, सिवाय उन चंद अफ़सरों के जिनकी तरक्की या सज़ा का हिसाब होता है?</p>

<p>प्रशासनिक सुधारों की दुहाई देते हुए जब अधिकारी बस एक दफ़्तर से दूसरे दफ़्तर भेज दिए जाते हैं, तब कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर क्या बदलता है? शायद कुछ नहीं, सिवाय इसके कि नए साहब के आने पर फ़ाइलों का ढेर फिर से खंगाला जाता है, और पुराने मामलों में नई सिरे से ‘गति’ देने का ढोंग रचा जाता है। यह कैसी दक्षता है, जहाँ हर दूसरे महीने अधिकारियों को यह समझने में लग जाता है कि उनके नए कार्यक्षेत्र में क्या चल रहा है और कौन किसे जानता है।</p>

<p>यह तो सत्ता के गलियारों का वह काला जादू है, जहाँ नेता अपनी पसंद के मोहरे बिठाते हैं और नापसंदों को दूर फेंकते हैं। इन तबादलों की सूची सिर्फ़ कागज़ का एक टुकड़ा नहीं होती, बल्कि यह इस बात का सीधा प्रमाण होती है कि कौन कितना ताक़तवर है, और किसकी जुबान पर सरकार का कितना भरोसा है। आम नागरिक, जो रात को बेख़ौफ़ सोना चाहता है, उसे बस दूर से यह तमाशा देखने को मिलता है।</p>

<p>जब शहर के एक छोर से दूसरे छोर तक अपराध की ख़बरें गूंजती हैं, तो हमें बताया जाता है कि ‘जांच जारी है’ और ‘कड़े कदम उठाए जा रहे हैं’। ये ‘कड़े कदम’ अक्सर अफ़सरों के बस्ते उठवाने तक ही सीमित रह जाते हैं। क्या कोई सोचता है कि लगातार बदलते चेहरे ज़मीनी स्तर पर काम कर रहे पुलिसवालों का मनोबल कितना गिराते होंगे? कौन सी स्थाई रणनीति बनेगी, कौन से अपराधी पकड़े जाएंगे, जब हर कुछ दिन में रणनीति बनाने वाले ही बदल जाते हैं?</p>

<p>सवाल यह है कि क्या जयपुर की पुलिस व्यवस्था इतनी लचर है कि उसे लगातार सर्जरी की ज़रूरत पड़ती है? या फिर हमारी व्यवस्था ने यह मान लिया है कि समस्या को जड़ से मिटाने की बजाय, उसकी सतह पर लीपापोती करना ज़्यादा आसान है? हर नया डीसीपी, हर नया एसएचओ अपनी ‘नई पहल’ की बात करता है, जो अक्सर उसके तबादले के साथ ही दम तोड़ देती है।</p>

<p>यह विडंबना नहीं तो और क्या है कि हम एक तरफ़ तकनीक और आधुनिक पुलिसिंग की बात करते हैं, और दूसरी तरफ़ हमारे अफ़सरों की ऊर्जा इस बात में खप जाती है कि नया दफ़्तर कहाँ मिलेगा और कौन सा फ़ोन नंबर काम करेगा। क्या यह उम्मीद करना ज़्यादा है कि पुलिस अपनी कुर्सी पर टिक कर काम करे और अपराधियों की जड़ों तक जाए, न कि बस अपनी कुर्सी से दूसरी कुर्सी तक का सफ़र तय करे?</p>

<p>इन प्रशासनिक फेरबदल का असली बोझ किस पर पड़ता है? न उस मंत्री पर जो आदेश पर दस्तख़त करता है, न उस अफ़सर पर जो नई गाड़ी में बैठकर नए दफ़्तर जाता है। इसका बोझ पड़ता है उस आम नागरिक पर, जो शिकायत लेकर बार-बार एक ही कहानी सुनाता है, और हर बार उसे एक नया चेहरा मिलता है जो ‘मामले को देखेगा’।</p>

<p>तो चलिए, यह तबादलों का खेल जारी रहे। नई सूचियाँ छपती रहें, अफ़सर अपनी गाड़ियों में घूमते रहें। मगर इस सब के बीच, जो सवाल कभी नहीं बदलते, वे हैं: मेरी सुरक्षा का क्या? मेरे न्याय का क्या? और इस शहर में सुशासन की उम्मीद का क्या?</p>
]]></content:encoded>
    </item>
    <item>
      <title>पोक्सो पीड़िता: न्याय की चौखट से गुम</title>
      <link>https://editor.manzill.com/2026-07-15/</link>
      <guid isPermaLink="true">https://editor.manzill.com/2026-07-15/</guid>
      <pubDate>Wed, 15 Jul 2026 00:00:00 +0000</pubDate>
      <dc:creator>मंज़िल सुरोलिया</dc:creator>
      <description>जयपुर में बैठकर जब हम यह खबर पढ़ते हैं कि जिस नाबालिग ने बलात्कार का आरोप लगाया था, वह फिर गायब हो गई है और पुलिस को शक है कि उसे उसी आरोपी ने उठाया है जिसके…</description>
      <content:encoded><![CDATA[<h1 id="पोक्सो-पीड़िता-न्याय-की-चौखट-से-गुम">पोक्सो पीड़िता: न्याय की चौखट से गुम</h1>

<h2 id="संपादक-की-राय">संपादक की राय</h2>

<p>जयपुर में बैठकर जब हम यह खबर पढ़ते हैं कि जिस नाबालिग ने बलात्कार का आरोप लगाया था, वह फिर गायब हो गई है और पुलिस को शक है कि उसे उसी आरोपी ने उठाया है जिसके खिलाफ पॉक्सो का मामला दर्ज है, तो सवाल सिर्फ पीड़िता की सुरक्षा का नहीं, बल्कि हमारी पूरी व्यवस्था की आत्मा का उठ खड़ा होता है। यह कैसा न्याय है जहां एक बार आवाज उठाने के बाद भी बच्ची को अपनी जान और इज्जत के लिए हर पल खौफ में जीना पड़ता है?</p>

<p>पुलिस के कागजों में एक ‘पॉक्सो केस’ दर्ज है। अदालत में शायद सुनवाई भी चल रही होगी। लेकिन उस कागजी कार्यवाही का क्या अर्थ, जब आरोपी इतना बेखौफ है कि वह पीड़िता को दोबारा गायब कर सकता है? क्या कानून सिर्फ रस्म अदायगी के लिए बना है? क्या एक लड़की की सुरक्षा की जिम्मेदारी सिर्फ उसी पर है, या उस व्यवस्था पर भी जिसे हम ‘रक्षक’ कहते हैं?</p>

<p>पिंक सिटी की चमक-धमक और रंगीन मिजाजी के पीछे अक्सर ऐसे स्याह सच छिपे रहते हैं, जिन पर पर्दा डालना हमारी फितरत बन गई है। हम विकास के दावे करते हैं, स्मार्ट सिटी की बात करते हैं, लेकिन शहर की गलियों में सिसकती सुरक्षा और कानून के सामने दम तोड़ते विश्वास की कहानियों से आंखें फेर लेते हैं। क्या यही हमारी तरक्की है?</p>

<p>अब पुलिस की टीमें तलाश में निकली हैं। यह सुनकर मन में एक कड़वी मुस्कान आती है। जब मोबाइल स्विच ऑफ होने की खबर आती है, तो क्या यह इतनी बड़ी खोज होती है? यह सब कुछ ‘हो जाने’ के बाद की कवायद क्यों? जिस आरोपी पर पहले से संगीन आरोप हैं, क्या उसकी निगरानी इतनी लचर थी कि वह फिर से अपने नापाक इरादों में कामयाब हो सके?</p>

<p>यह घटना सिर्फ एक बच्ची के अपहरण की नहीं, बल्कि उस हर लड़की के भरोसे के अपहरण की है जो किसी दरिंदे के खिलाफ आवाज उठाने की हिम्मत करती है। यह सवाल उठाती है कि क्या हमारे कानून का खौफ अपराधियों के लिए है भी, या वे उसे सिर्फ एक कागजी खानापूर्ति मानते हैं? आरोपी खुले घूमते रहें और पीड़िताएं खौफ में जीती रहें, यह कैसा न्याय है?</p>

<p>क्या हमें यह मानना पड़ेगा कि कानून का डंडा सिर्फ कमजोरों पर चलता है, और जिनके हाथ सत्ता या पैसे की डोर से जुड़े हैं, वे बेखौफ घूम सकते हैं? यह कैसा समाज है जहां एक नाबालिग को न्याय की उम्मीद में अपनी जान जोखिम में डालनी पड़ती है, और अंत में उसे फिर उसी अंधेरे में धकेल दिया जाता है जिससे वह बाहर निकलने की कोशिश कर रही थी?</p>

<p>यह सिर्फ एक ‘केस’ नहीं है, यह हमारे समाज और व्यवस्था के माथे पर लगा एक ऐसा दाग है जिसे धोना आसान नहीं होगा। यह उन सभी मासूम चेहरों पर सवालिया निशान है जो अब भी न्याय की आस लगाए बैठे हैं। क्या उन्हें भी यही दिन देखने पड़ेंगे?</p>

<p>जब न्याय के मंदिर से आवाज लगाने वाली खुद ही गुम हो जाए, तो फिर किस पर भरोसा करें?</p>
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    </item>
    <item>
      <title>माँ की क़ीमत, सरकारी नौकरी का मोल</title>
      <link>https://editor.manzill.com/2026-07-14/</link>
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      <pubDate>Tue, 14 Jul 2026 00:00:00 +0000</pubDate>
      <dc:creator>मंज़िल सुरोलिया</dc:creator>
      <description>पिंकसिटी में आज फिर खून की स्याही से एक ऐसी कहानी लिखी गई है, जहाँ रिश्तों की मर्यादा का आखिरी कतरा भी सूख गया है। जिस शहर को दुनिया के सबसे खूबसूरत शहरों में…</description>
      <content:encoded><![CDATA[<h1 id="माँ-की-क़ीमत-सरकारी-नौकरी-का-मोल">माँ की क़ीमत, सरकारी नौकरी का मोल</h1>

<h2 id="संपादक-की-राय">संपादक की राय</h2>

<p>पिंकसिटी में आज फिर खून की स्याही से एक ऐसी कहानी लिखी गई है, जहाँ रिश्तों की मर्यादा का आखिरी कतरा भी सूख गया है। जिस शहर को दुनिया के सबसे खूबसूरत शहरों में शुमार किया जाता है, वहाँ एक बेटी ने अपनी ही माँ का गला रेतने के लिए सात लाख रुपये की सुपारी दी। क्या यही हमारा ‘विश्व स्तरीय’ समाज है, जहाँ एक अदद सरकारी नौकरी माँ के जीवन से ज़्यादा कीमती हो गई?</p>

<p>यह सौदा सिर्फ़ रुपयों का नहीं था, यह सौदा था आत्मा की बिक्री का। एक बेटी, जिसने माँ के आँचल में पलकर बड़े होने की बजाय, उसकी हत्या का ताना-बाना बुना। सात लाख रुपये… क्या वाकई सरकारी नौकरी की चमक इतनी चौंधियाने वाली है कि उसने ममता की आँखें फोड़ दीं, या फिर यह उस समाज का नंगा सच है जहाँ हर रिश्ते की कीमत सिर्फ़ संख्या में आँकी जाती है?</p>

<p>सरकारी नौकरी। आह! यह दो शब्द नहीं, हमारे समाज की एक सामूहिक सनक हैं। सुरक्षा, रुतबा, और एक झटके में ज़िंदगी संवार देने का वादा। यह ऐसा मृगतृष्णा है जिसके पीछे दौड़ते-दौड़ते लोग अपनी जड़ों को, अपने संस्कारों को, और अब अपनी माँ को भी मिट्टी में मिला रहे हैं। क्या किसी भी नौकरी की गरिमा इतनी बड़ी हो सकती है कि वह माँ के बलिदान को निगल जाए?</p>

<p>यह मामला सिर्फ़ एक बेटी की क्रूरता का नहीं। यह उस व्यवस्था का भी आईना है, जहाँ सरकारी नौकरी पाना एक ऐसा स्वर्ण-द्वार बन चुका है, जिसके लिए लोग साम, दाम, दंड, भेद… और अब हत्या तक करने को तैयार हैं। क्या हमारी शिक्षा प्रणाली, हमारी आर्थिक नीतियाँ और हमारी सामाजिक मूल्य-पद्धति कहीं इस विकृति को बढ़ावा तो नहीं दे रही हैं?</p>

<p>और कहानी में एक और खौफ़नाक मोड़। अब शक है कि इसी बेटी ने अपने पिता की हत्या में भी हाथ बँटाया था। यह एक वारदात नहीं, यह तो अपराध की एक पूरी श्रृंखला है, जो एक ही घर की चारदीवारी के भीतर रची गई। क्या यह सामान्य इंसान है, या हमने अपने बीच ऐसे भेड़िए पाल लिए हैं जो रिश्तों का मांस नोचते हैं?</p>

<p>गुलाबी नगरी की चमक के नीचे यह कैसा स्याह अंधेरा पसरा है? एक ओर दुनिया हमें पर्यटन के नक्शे पर चमका रही है, और दूसरी ओर हमारे घरों के भीतर ऐसी वीभत्स घटनाएँ घट रही हैं, जो रूह कंपा देती हैं। यह कैसा विकास है, जो इमारतों को तो ऊँचा कर रहा है, पर इंसानी मूल्यों को पाताल में धकेल रहा है?</p>

<p>जब एक सरकारी नौकरी इतनी बड़ी हो जाए कि वह रिश्तों की सारी पवित्रता को भस्म कर दे, तो हमें रुककर सोचना चाहिए। यह सिर्फ़ कानून-व्यवस्था का मसला नहीं। यह हमारे समाज के उस खोखलेपन का प्रमाण है, जहाँ महत्वाकांक्षा ने हर मानवीय भावना को रौंद दिया है।</p>

<p>तो अब सवाल यह नहीं कि उसे सजा क्या मिलेगी। सवाल यह है कि हम किस दिशा में जा रहे हैं? क्या हर चमकती चीज़ सोना है, या इस चमक के पीछे एक घिनौना अँधेरा है जो हमें लीलने को तैयार बैठा है?</p>
]]></content:encoded>
    </item>
    <item>
      <title>माँ की सुपारी: रिश्तों का सात लाख का सौदा</title>
      <link>https://editor.manzill.com/2026-07-13/</link>
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      <pubDate>Mon, 13 Jul 2026 00:00:00 +0000</pubDate>
      <dc:creator>मंज़िल सुरोलिया</dc:creator>
      <description>सात लाख रुपए। गुलाबी नगरी के किसी छोटे से मकान की डाउन पेमेंट भी नहीं होती आज। लेकिन एक बेटी के लिए, अपनी जननी की साँसों का यही मोल था। जयपुर की वादियों में…</description>
      <content:encoded><![CDATA[<h1 id="माँ-की-सुपारी-रिश्तों-का-सात-लाख-का-सौदा">माँ की सुपारी: रिश्तों का सात लाख का सौदा</h1>

<h2 id="संपादक-की-राय">संपादक की राय</h2>

<p>सात लाख रुपए। गुलाबी नगरी के किसी छोटे से मकान की डाउन पेमेंट भी नहीं होती आज। लेकिन एक बेटी के लिए, अपनी जननी की साँसों का यही मोल था। जयपुर की वादियों में रिश्तों की गर्माहट कभी पहचान थी, पर अब लगता है, यहाँ हर संबंध एक व्यापार बन गया है, जिसकी कीमत चुकाई जा सकती है। यह कैसी तरक्की है, जहाँ माँ का आँचल अब सुरक्षा नहीं, बल्कि रास्ते का रोड़ा लगने लगा है?</p>

<p>शहर की गलियों में जहाँ हम कभी बेखौफ घूमते थे, अब एक खामोश डर का साया है। यह कोई पहला अपराध नहीं, न ही आखिरी होगा, लेकिन अपनी माँ को ठिकाने लगाने के लिए “सुपारी” देना, यह तो उन कहानियों से भी बदतर है, जिन्हें सुनकर कभी कलेजा काँप उठता था। क्या अब रिश्तों की पवित्रता सिर्फ किताबों में सिमट कर रह गई है, और हकीकत में हर गांठ को पैसों से खोला जा सकता है?</p>

<p>यह मामला सिर्फ एक आपराधिक घटना नहीं, यह हमारे समाज की अंदरूनी सड़न का एक भयानक चेहरा है। जिस शहर में लोग सुबह-शाम मंदिरों में जाकर देवी माँ की पूजा करते हैं, उसी शहर की एक बेटी ने अपनी जीवित माँ को “खत्म” करने का ठेका दे दिया। यह विरोधाभास किसी व्यंग्य से कम नहीं, यह हमें आईना दिखा रहा है कि हम ऊपर से क्या दिखते हैं और भीतर से क्या हो चले हैं।</p>

<p>क्या हमने अपनी अगली पीढ़ी को सिर्फ “क्या मिलता है” की दौड़ में धकेल दिया है? जहाँ हर चीज़ का हिसाब-किताब मुनाफे और नुकसान के तराजू पर होता है। माँ की ममता, पिता का त्याग, भाई-बहन का प्रेम—ये सब अब भावनात्मक लग्ज़री हैं, जिनकी जगह अब ठोस कैश और ज़मीन-जायदाद ने ले ली है। सात लाख! शायद इससे ज़्यादा के वारिस बनने की जल्दी थी?</p>

<p>सवाल सिर्फ उस बेटी पर नहीं उठता, जिसने यह जघन्य अपराध रचा। सवाल उस व्यवस्था पर भी है, जहाँ ऐसे “कॉन्ट्रैक्ट किलर” गली-कूचों में आसानी से मिल जाते हैं। क्या हमारी कानून व्यवस्था का डर इतना कम हो गया है कि कोई भी, किसी को भी, चंद रुपयों के लिए मार सकता है? या फिर कुछ ज़िंदगियाँ वाकई इतनी सस्ती हो गई हैं कि उन्हें खरीदने-बेचने में कोई हिचक नहीं होती?</p>

<p>यह घटना हमें सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हम एक ऐसे समाज का हिस्सा बन रहे हैं, जहाँ समस्याएं सुलझाने के बजाय उन्हें “मिटा देना” अधिक आसान लगता है? पारिवारिक झगड़े, संपत्ति विवाद, व्यक्तिगत असहमति—इन सब का अंतिम समाधान क्या अब हत्या ही है, और वो भी बाज़ार भाव पर?</p>

<p>जयपुर की गुलाबी शामों में जब पर्यटक घूमते हैं, उन्हें नहीं पता कि इस चमक के नीचे कितनी काली कहानियाँ पल रही हैं। यह सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं, यह उस हर रिश्ते पर एक घाव है, जिस पर भरोसे की नींव टिकी होती है।</p>

<p>क्या अब माँ का दर्जा सिर्फ कागज़ों पर ही पूज्यनीय रह गया है? और यदि नहीं, तो हमारी अगली पीढ़ी को रिश्तों की कीमत कौन बताएगा, जब खुद अपने ही खून के रिश्ते सात लाख में बिक रहे हों?</p>
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    </item>
    <item>
      <title>कानून की डिग्री, खूनी इरादे: जयपुर का नया पाठ</title>
      <link>https://editor.manzill.com/2026-07-12/</link>
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      <pubDate>Sun, 12 Jul 2026 00:00:00 +0000</pubDate>
      <dc:creator>मंज़िल सुरोलिया</dc:creator>
      <description>गुलाबी नगर की पहचान बदल रही है, शायद हमें स्वीकार कर लेना चाहिए। अब यह सिर्फ महलों और हवेलियों का शहर नहीं, बल्कि उन कहानियों का भी शहर है जहाँ क़ानून पढ़ने…</description>
      <content:encoded><![CDATA[<h1 id="कानून-की-डिग्री-खूनी-इरादे-जयपुर-का-नया-पाठ">कानून की डिग्री, खूनी इरादे: जयपुर का नया पाठ</h1>

<h2 id="संपादक-की-राय">संपादक की राय</h2>

<p>गुलाबी नगर की पहचान बदल रही है, शायद हमें स्वीकार कर लेना चाहिए। अब यह सिर्फ महलों और हवेलियों का शहर नहीं, बल्कि उन कहानियों का भी शहर है जहाँ क़ानून पढ़ने वाले हाथ माँ की हत्या की साजिश रचते हैं। यह सिर्फ़ एक अपराध नहीं, हमारी समझ पर पड़ा एक सर्द थप्पड़ है।</p>

<p>न्याय के मंदिरों में प्रवेश की तैयारी करती एक छात्रा ने घर में ही मौत का तांडव रचा। माँ को सड़क दुर्घटना का शिकार बताकर पुलिस और समाज को बरगलाने की यह कोशिश उतनी ही शातिर है जितनी हमारे समाज की वह परत जहाँ सब कुछ ‘ठीक’ दिखने की ज़िद पाल ली जाती है। डिग्री की चमक के पीछे इतनी स्याह सोच कैसे पनप सकती है?</p>

<p>कहते हैं शिक्षा मनुष्य को सभ्य बनाती है, विवेक देती है। पर जब कोई क़ानून की बारीकियों को सिर्फ इसलिए सीखे ताकि अपने ही घर में एक निर्मम हत्या को ‘हादसा’ साबित कर सके, तो उस शिक्षा का क्या मोल? क्या हमारी पढ़ाई सिर्फ़ दिमाग को कुशाग्र कर रही है, आत्मा को नहीं? यह कुशाग्रता अब खूनी खेल का हिस्सा बन गई है।</p>

<p>और फिर यह सिहरन पैदा करने वाला नया खुलासा कि इस खूनी साज़िश में शायद पिता की मौत का भी कोई तार जुड़ा हो। एक माँ की हत्या के बाद पिता की मौत पर उठते सवाल सामान्य नहीं हैं। यह एक सिलसिलेवार, ठंडी और सोची-समझी क्रूरता की कहानी है, जो एक ‘पढ़ी-लिखी’ बेटी के दामन से लिपटकर बाहर आ रही है।</p>

<p>जयपुर का यह वाकया सिर्फ़ एक परिवार का बिखराव नहीं, यह उस आदर्शवादी ढकोसले का पर्दाफाश है जिसे हम अक्सर ‘संस्कारी’ घरों और ‘उज्ज्वल भविष्य’ वाले बच्चों के इर्द-गिर्द बुनते रहते हैं। क्या यही है हमारी तरक्की का असली चेहरा, जहाँ रिश्तों की कीमत महत्वाकांक्षाओं के सामने शून्य हो जाती है?</p>

<p>कब तक हम ऐसे अपराधों को ‘अलग-थलग घटना’ कहकर टालते रहेंगे? यह एक ऐसी दरार है जो हमारे सामाजिक ताने-बाने में पड़ चुकी है, और इसकी गूँज सिर्फ़ पुलिस थानों या अदालतों तक सीमित नहीं रहेगी। यह उन हर माता-पिता के कानों में गूंजनी चाहिए जो अपने बच्चों को सफलता की अंधी दौड़ में धकेल रहे हैं।</p>

<p>यह घटना हमारी उस अदृश्य चुप्पी पर सवाल उठाती है, जो घरों के भीतर पनप रही कुंठाओं, हिंसा और कटुता को नज़रअंदाज़ करती है। बाहर से चमकता ‘पिंक सिटी’ का मुखौटा भीतर से कितनी ही सड़ी हुई सच्चाइयों को छुपाए बैठा है, यह अब शीशे की तरह साफ़ हो रहा है।</p>

<p>किसी अदालत का फ़ैसला इस घाव पर मरहम नहीं लगा पाएगा। यह उस खालीपन का एहसास कराता है, जहाँ मानवीय मूल्य और नैतिक आधार एक कानून की किताब के पन्नों से भी ज़्यादा हल्के हो चुके हैं। सवाल सिर्फ़ हत्यारे का नहीं, उस समाज का भी है जो ऐसी ज़मीनों को सींचता है।</p>
]]></content:encoded>
    </item>
    <item>
      <title>स्कूल की सीढ़ियाँ: अनसुनी गुहार का स्मारक</title>
      <link>https://editor.manzill.com/2026-07-11/</link>
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      <pubDate>Sat, 11 Jul 2026 00:00:00 +0000</pubDate>
      <dc:creator>मंज़िल सुरोलिया</dc:creator>
      <description>आज गुलाबी नगर में एक और मासूम ज़िंदगी खामोश हो गई, उस इमारत की ऊँचाई से गिरकर, जिसे हम &apos;ज्ञान का मंदिर&apos; कहते हैं। माता-पिता कहते रहे, उनकी बेटी ने हाथ जोड़े…</description>
      <content:encoded><![CDATA[<h1 id="स्कूल-की-सीढ़ियाँ-अनसुनी-गुहार-का-स्मारक">स्कूल की सीढ़ियाँ: अनसुनी गुहार का स्मारक</h1>

<h2 id="संपादक-की-राय">संपादक की राय</h2>

<p>आज गुलाबी नगर में एक और मासूम ज़िंदगी खामोश हो गई, उस इमारत की ऊँचाई से गिरकर, जिसे हम ‘ज्ञान का मंदिर’ कहते हैं। माता-पिता कहते रहे, उनकी बेटी ने हाथ जोड़े थे, बार-बार मिन्नतें की थीं। क्या इन ईंट-पत्थरों की दीवारों में इतनी भी जगह नहीं बची कि एक बच्ची की बेबसी की आवाज़ ठहर सके? या हमने इतने डिजिटल उपकरण लगा दिए हैं कि मानवीय संवेदना के तार ही कट गए हैं?</p>

<p>‘मैम, मैंने ये नहीं किया।’ इस एक वाक्य को उस बच्ची ने पच्चीस मिनट में पाँच बार दोहराया। ये सिर्फ़ एक आरोप या सफाई नहीं थी, ये एक डूबते हुए व्यक्ति की आखिरी कोशिश थी, जो बचाने वाले की आँखें तलाश रहा था। लेकिन शायद हमारी ‘आधुनिक’ शिक्षा व्यवस्था में अब बच्चों की आँखों के बजाय सिर्फ़ प्रगति रिपोर्ट देखी जाती है।</p>

<p>जिस कक्षा में ‘डिजिटल स्लेट’ और ‘क्लास एक्सचेंज’ जैसे नवाचारों की बातें होती हैं, वहाँ एक क्लास टीचर की भूमिका इतनी गौण कैसे हो सकती है? क्या वह सिर्फ़ एक अटेंडेंस मशीन बनकर रह गया है, जिसे बच्चों की मानसिक स्थिति या उनके दर्द से कोई सरोकार नहीं? या फिर यह मान लिया गया है कि बच्चों की समस्याएँ सिर्फ़ ‘नाराज़गी’ होती हैं, जिन्हें समय के साथ भुला दिया जाएगा?</p>

<p>जयपुर, शिक्षा का एक बड़ा केंद्र होने का दावा करता है। यहाँ हर गली-मोहल्ले में ‘बेहतरीन भविष्य’ गढ़ने वाले स्कूलों के पोस्टर लगे हैं। लेकिन क्या इस चकाचौंध के पीछे हमने यह देखना बंद कर दिया है कि ये ‘भविष्य’ किन कंधों पर टिके हैं, और उन कंधों पर कितना बोझ है? एक तरफ़ प्रतिस्पर्धा का गलाकाट माहौल, दूसरी तरफ़ अनसुनी होती चीखें।</p>

<p>हर अभिभावक अपने बच्चे को स्कूल भेजते वक्त यह सोचता है कि उसने उसे सबसे सुरक्षित जगह भेजा है, जहाँ उसे ज्ञान मिलेगा और संस्कार भी। पर जब स्कूल के भीतर से ही ऐसी खबरें आती हैं, तो यह भरोसा कहाँ जाकर टिकता है? क्या अब हर माता-पिता को अपने बच्चों को स्कूल भेजते वक्त अपने सीने पर हाथ रखकर ईश्वर से दुआ करनी होगी, कि उनका बच्चा आज सुरक्षित वापस लौट आए?</p>

<p>यह पहला मामला नहीं है, न आखिरी होगा। हर बार हम अफ़सोस जताते हैं, कुछ दिन हंगामा होता है, और फिर सब ठंडा पड़ जाता है। स्कूल अपनी फीस बढ़ाता है, अभिभावक बच्चों पर दबाव बढ़ाते हैं, और प्रशासन ‘जाँच’ के वादे करके सो जाता है। यह एक दुष्चक्र है, जिसकी अगली शिकार का इंतज़ार हम सब खामोशी से कर रहे हैं।</p>

<p>सवाल सिर्फ़ उस बच्ची की मौत का नहीं है, सवाल उन सभी बच्चों की खामोश बेबसी का है जो हर दिन अपने स्कूल में अपनी पहचान, अपनी गरिमा, या अपनी छोटी सी गलती के लिए जूझते हैं। क्या हम इतने स्वार्थी हो गए हैं कि बच्चों को सिर्फ़ अपना सपना पूरा करने का जरिया मानते हैं, या उनमें एक इंसान देखना भी हमने छोड़ दिया है?</p>

<p>अगली बार जब कोई बच्चा अपने हाथ जोड़े, क्या उसे सुनने वाला कोई होगा? या फिर स्कूल की सीढ़ियाँ सिर्फ़ एक और अनसुनी गुहार का स्मारक बनकर रह जाएँगी?</p>
]]></content:encoded>
    </item>
    <item>
      <title>जयपुर की एक छात्रा, कैमरा और एक खामोश मौत</title>
      <link>https://editor.manzill.com/2026-07-10/</link>
      <guid isPermaLink="true">https://editor.manzill.com/2026-07-10/</guid>
      <pubDate>Fri, 10 Jul 2026 00:00:00 +0000</pubDate>
      <dc:creator>मंज़िल सुरोलिया</dc:creator>
      <description>सीसीटीवी फुटेज। एक यंत्र। बेजुबान। जिसने वह सब कुछ रिकॉर्ड किया, जो किसी आँख को दिखना चाहिए था, किसी कान को सुनना चाहिए था, किसी हाथ को रोकना चाहिए था। गुलाबी…</description>
      <content:encoded><![CDATA[<h1 id="जयपुर-की-एक-छात्रा-कैमरा-और-एक-खामोश-मौत">जयपुर की एक छात्रा, कैमरा और एक खामोश मौत</h1>

<h2 id="संपादक-की-राय">संपादक की राय</h2>

<p>सीसीटीवी फुटेज। एक यंत्र। बेजुबान। जिसने वह सब कुछ रिकॉर्ड किया, जो किसी आँख को दिखना चाहिए था, किसी कान को सुनना चाहिए था, किसी हाथ को रोकना चाहिए था। गुलाबी नगर की एक प्रतिष्ठित पाठशाला, उसकी चकाचौंध भरी दीवारें और उसके भीतर एक नौ साल की बच्ची की बेबसी। कैमरे ने देखा, दुनिया ने अब देखा, लेकिन उस पल में, उस पवित्र शिक्षण संस्थान में कोई क्यों नहीं देख पाया?</p>

<p>यह सिर्फ एक छात्रा की आत्महत्या नहीं, यह उस व्यवस्था का चीख़ता हुआ सच है, जहाँ ‘शिक्षा’ के नाम पर मोटी फीसें वसूली जाती हैं, भव्य इमारतें खड़ी की जाती हैं, लेकिन बच्चों की सुरक्षा और मानसिक स्वास्थ्य को दीमक की तरह चाटने वाली हिंसा पर पर्दा डालने की कोशिश की जाती है। वे शिक्षक, वे प्राचार्य, वे स्टाफ कहाँ थे जब ‘अमाइरा’ बार-बार मदद माँग रही थी? क्या उनकी आँखों पर सिर्फ पाठ्यक्रम और फीस की पट्टी बंधी थी?</p>

<p>माता-पिता अपने कलेजे के टुकड़े को, विश्वास की गठरी बांधकर इन संस्थानों के हवाले करते हैं। उन्हें लगता है कि उनके बच्चे इन चारदीवारी के भीतर सुरक्षित हैं, भविष्य गढ़ रहे हैं। लेकिन जब यही चारदीवारी एक बच्ची की क़ब्रगाह बन जाए, तो उस विश्वास का क्या? क्या अब हर अभिभावक को अपने बच्चे के स्कूल में एक जासूस बैठाना पड़ेगा, या हर कमरे में एक सीसीटीवी कैमरा लगाना पड़ेगा ताकि उनके बच्चों की ज़िंदगी को सुरक्षा मिल सके?</p>

<p>यह अकेला मामला नहीं है, यह एक प्रवृत्ति है। ‘बच्चों का झगड़ा है’, ‘थोड़ा बहुत तो चलता है’, ‘इतना तो बच्चे करते ही हैं’ — ऐसी ही न जाने कितनी बातें कहकर बचपन की क्रूरता को अनदेखा किया जाता है। यह सिर्फ बच्चों की हिंसा नहीं, यह उस समाज की सामूहिक उदासीनता है जो ‘बुलिंग’ को तब तक गंभीरता से नहीं लेता, जब तक कि वह एक हेडलाइन न बन जाए, एक लाश न बन जाए। तब तक सब तमाशा देखते रहते हैं।</p>

<p>जयपुर, जिसे हम शिक्षा और पर्यटन का केंद्र कहते हैं, उसकी चमक के पीछे ऐसी कितनी अमाइराएँ दम तोड़ रही होंगी? गुलाबी शहर की इस दोहरी ज़िंदगी में, जहाँ एक तरफ़ आधुनिकता की बातें होती हैं, वहीं दूसरी तरफ़ मानवीय संवेदनाएँ इतनी कुंद हो चुकी हैं कि एक नौ साल की बच्ची की आँखों में दिख रहा डर भी किसी को नहीं दिखता। यह कैसा विकास है, जो आत्मा को ही मार दे?</p>

<p>अब जाँच होगी। लीपापोती की कोशिशें होंगी। कुछ लोगों को निलंबित किया जाएगा, कुछ बयानबाज़ी होगी। फिर एक और ‘जाँच समिति’ बनेगी, जिसकी रिपोर्ट शायद धूल खाएगी। और हम सब, अगली बड़ी खबर का इंतजार करते रहेंगे, जब तक कि कोई और अमाइरा, किसी और शहर में, किसी और स्कूल में, हमारी सामूहिक चेतना पर एक और थप्पड़ न जड़ दे।</p>

<p>सवाल सिर्फ यह नहीं कि सीसीटीवी फुटेज ने क्या दिखाया, सवाल यह है कि उन आँखों का क्या हुआ जो कैमरे की परवाह किए बिना भी देख सकती थीं? सवाल यह नहीं कि अमाइरा क्यों कूदी, सवाल यह है कि उसे कूदने पर मजबूर करने वाले, और उसे बचाने में नाकाम रहने वाले, आज भी उसी व्यवस्था का हिस्सा क्यों हैं?</p>

<p>एक मासूम का जीवन, उस अदृश्य बुल्लिंग की भेंट चढ़ गया जिसे हम सालों से अनदेखा कर रहे हैं। इस असहज सत्य का सामना कौन करेगा? या हम फिर एक ‘दुर्भाग्यपूर्ण घटना’ कहकर अपनी आँखें मूँद लेंगे?</p>
]]></content:encoded>
    </item>
    <item>
      <title>जयपुर: नौकरी की ख़ातिर, माँ की हत्या</title>
      <link>https://editor.manzill.com/2026-07-09/</link>
      <guid isPermaLink="true">https://editor.manzill.com/2026-07-09/</guid>
      <pubDate>Thu, 09 Jul 2026 00:00:00 +0000</pubDate>
      <dc:creator>मंज़िल सुरोलिया</dc:creator>
      <description>जयपुर अब सिर्फ़ गुलाबी पत्थरों और शांत गलियों का शहर नहीं रहा, जहाँ परदेसी पर्यटकों को &apos;अतिथि देवो भव&apos; का पाठ पढ़ाया जाता है। अब यह वह जगह भी है जहाँ एक 23 साल…</description>
      <content:encoded><![CDATA[<h1 id="जयपुर-नौकरी-की-ख़ातिर-माँ-की-हत्या">जयपुर: नौकरी की ख़ातिर, माँ की हत्या</h1>

<h2 id="संपादक-की-राय">संपादक की राय</h2>

<p>जयपुर अब सिर्फ़ गुलाबी पत्थरों और शांत गलियों का शहर नहीं रहा, जहाँ परदेसी पर्यटकों को ‘अतिथि देवो भव’ का पाठ पढ़ाया जाता है। अब यह वह जगह भी है जहाँ एक 23 साल की बेटी अपनी ही माँ की हत्या की साज़िश रचती है, और वजह? एक सरकारी नौकरी और ज़मीन-जायदाद। क्या यह सिर्फ़ एक ख़बर है या हमारे तथाकथित सभ्य समाज के गले में फँसा कोई काँटा?</p>

<p>इस वाक़ये को सुनकर रूह काँप उठती है। माँ जिसने जन्म दिया, पाला-पोसा, उसी की जान लेने की योजना, वह भी किसी ज़ायदाद या नौकरी के लिए? यह कौन सा मूल्य-पतन है जो युवा पीढ़ी को इस स्तर तक गिरा देता है कि माँ की ममता भी एक ‘डील’ के आगे कुछ नहीं?</p>

<p>जिस सरकारी नौकरी के लिए युवा सड़कों पर लाठियाँ खाते हैं, सालों तक रात-दिन एक करके पढ़ाई करते हैं, उसी नौकरी का आकर्षण अब इतना विकृत हो गया है कि वह ‘जीवन’ और ‘संबंध’ की परिभाषा ही बदल दे? यह उस व्यवस्था पर सबसे बड़ा सवाल है, जो नौकरी को सुरक्षा और सम्मान का ऐसा पर्याय बना देती है कि उसके लिए कोई भी क़ीमत चुकाई जा सकती है।</p>

<p>गुलाबी शहर के चमकते बाज़ारों और पुरानी हवेलियों की आड़ में पल रहा यह स्याह सच डरावना है। एक तरफ़ हम ‘परिवार’ और ‘संस्कार’ की दुहाई देते हैं, दूसरी तरफ़ एक बेटी अपनी माँ की लाश बिछाकर ख़ुद के लिए एक नया भविष्य गढ़ने का सपना देखती है। क्या हमारी शिक्षा प्रणाली, हमारा सामाजिक ढाँचा, इस विकृति के लिए ज़िम्मेदार नहीं?</p>

<p>यह सिर्फ़ एक ‘मनोरंजक’ अपराध की कहानी नहीं है। यह एक गंभीर बीमारी का लक्षण है, जो हमारे सामाजिक ताने-बाने को अंदर ही अंदर खा रही है। जहाँ रिश्ते अब भावनात्मक डोर से नहीं, बल्कि दस्तावेज़ों और बैंक खातों से तय होते हैं। माँ-बाप अब विरासत और भविष्य की कुंजी भर हैं।</p>

<p>सवाल सिर्फ़ उस बेटी पर नहीं है, सवाल उस समाज पर भी है जो ऐसे कृत्य को पैदा होने देता है। उस अंधी दौड़ पर सवाल है जहाँ सरकारी पद पा लेना ही जीवन का परम लक्ष्य बन गया है। जब हर सुबह अख़बार पन्ने पलटते हुए हमें ऐसी ख़बरे पढ़ने को मिलें, तो समझ लीजिये कि शहर की आत्मा पर जंग लगने लगी है।</p>

<p>सरकारी नौकरी और ज़ायदाद की लालसा ने एक माँ की जान ले ली। क्या इस लालसा को हवा देने वाली हमारी ही बेतरतीब व्यवस्था पर हम कभी उंगली उठाएंगे? या अगली बार तक, हम सिर्फ़ एक नए ‘शॉकिंग मर्डर’ का इंतज़ार करेंगे, और फिर उसे भूल जाएंगे?</p>
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      <title>भ्रामक लेबल वाली हज़ारों ऊर्जा पेय बोतलें ज़ब्त</title>
      <link>https://editor.manzill.com/2026-07-08/</link>
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      <pubDate>Wed, 08 Jul 2026 00:00:00 +0000</pubDate>
      <dc:creator>मंज़िल सुरोलिया</dc:creator>
      <description>आज जयपुर के बाजार से हज़ारों ऊर्जा पेय की बोतलें जब्त हुई हैं। यह सिर्फ़ बोतलों का ढेर नहीं, यह हमारी आँखों पर पड़ी पट्टी का सच है। तिरेपन हज़ार दो सौ छप्पन!…</description>
      <content:encoded><![CDATA[<h1 id="भ्रामक-लेबल-वाली-हज़ारों-ऊर्जा-पेय-बोतलें-ज़ब्त">भ्रामक लेबल वाली हज़ारों ऊर्जा पेय बोतलें ज़ब्त</h1>

<h2 id="संपादक-की-राय">संपादक की राय</h2>

<p>आज जयपुर के बाजार से हज़ारों ऊर्जा पेय की बोतलें जब्त हुई हैं। यह सिर्फ़ बोतलों का ढेर नहीं, यह हमारी आँखों पर पड़ी पट्टी का सच है। तिरेपन हज़ार दो सौ छप्पन! इतनी बोतलें एक साथ पकड़ी गईं, तो सवाल उठता है कि कितनी पी जा चुकी होंगी? कितने जयपुरवासी ‘ऊर्जा’ के नाम पर सिर्फ़ धोखे का घूँट पी रहे थे, और कितने समय से? क्या हमारे तंत्र को यह सब तब तक नहीं दिखता, जब तक कि वह खुद ही आँखों में उँगली डालकर न दिखाया जाए?</p>

<p>इन बोतलों पर दावे थे ऊर्जा के, शायद स्फूर्ति के, या किसी जादुई तत्व के। मगर उनके अंदर था क्या, जिस पर ‘भ्रामक लेबल’ का ठप्पा लगा? यह महज़ एक गलत जानकारी नहीं है; यह उपभोक्ता के विश्वास का सीधा-सीधा हनन है। जब हर चमकती चीज़ सोना नहीं होती, तो हर रंगीन बोतल ‘ऊर्जा’ कैसे हो सकती है? यह कैसी व्यवस्था है जहाँ खुलेआम धंधे के नाम पर ज़हर बेचने की तैयारी हो, और हम जागें तब, जब गोदामों में पहाड़ खड़े हो जाएं?</p>

<p>खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण जैसे नाम हमारे शहरों में सिर्फ़ दफ़्तरों की शान बढ़ाते हैं या फाइलों में सिमट कर रह जाते हैं? जयपुर की गुलाबी सड़कों पर घूमते हुए शायद ही कोई सोचता होगा कि उसकी अगली ‘ऊर्जा’ की खुराक सिर्फ़ एक बोतल भर मीठा पानी नहीं, बल्कि किसी शातिर दिमाग का छलावा हो सकती है। यह कैसी निगरानी है, जो हज़ारों की गिनती में बोतलों के बनने, बाज़ार तक पहुँचने और बिकने से पहले नहीं बल्कि बाद में हरकत में आती है?</p>

<p>इस खेल में सिर्फ़ उत्पादक दोषी नहीं है। वह जानता है कि इस देश में कुछ भी बिक सकता है, बशर्ते उसे सही पैकेजिंग और सही जुमलों के साथ परोसा जाए। जब तक पकड़ में नहीं आते, तब तक मुनाफा ही मुनाफा। और जब पकड़े गए? तब शायद जुर्माना, हल्की-फुल्की कार्रवाई, और फिर किसी और नाम से, किसी और बोतल में, वही पुराना धंधा। क्या यह हमारे कानूनी तंत्र की लचर चाल नहीं है जो ऐसे अपराधियों को बार-बार आज़माने का मौका देती है?</p>

<p>गुलाबी शहर की रंगीनियत के पीछे यह काली सच्चाई है कि यहाँ हर वो चीज़ आसानी से मिल जाती है जो दिखती कुछ और है, होती कुछ और है। फिर चाहे वो सत्ता के गलियारों में लुभावने वादे हों या बाज़ार में बिकते ‘स्वास्थ्यवर्धक’ पेय। हम कब तक इस ढोंग को बर्दाश्त करते रहेंगे? क्या हमारी संवेदनशीलता इतनी गहरी नींद में सो चुकी है कि जब तक कोई बड़ी त्रासदी न हो, हम आँखें नहीं खोलते?</p>

<p>यह सिर्फ़ ऊर्जा पेय का मामला नहीं है। यह उन सभी नकली उत्पादों, मिलावटी खाद्य पदार्थों और झूठे विज्ञापनों का एक छोटा सा नमूना है जो हमारी थालियों, हमारी अलमारियों और हमारे जीवन में चुपचाप जगह बनाते जा रहे हैं। आज 53,256 बोतलें पकड़ी गईं, कल कोई और संख्या होगी। लेकिन क्या यह संख्या हमें यह सोचने पर मजबूर करेगी कि कितने और ‘भ्रामक लेबल’ हमारी सेहत और हमारी जेब पर डाका डाल रहे हैं? या हम फिर से अगली खबर का इंतज़ार करेंगे, और तब तक इस ‘ऊर्जा’ का कड़वा घूँट पीते रहेंगे?</p>
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      <title>फर्जी पर्चियों से शिक्षा विभाग में 503 करोड़ का घोटाला</title>
      <link>https://editor.manzill.com/2026-07-07/</link>
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      <pubDate>Tue, 07 Jul 2026 00:00:00 +0000</pubDate>
      <dc:creator>मंज़िल सुरोलिया</dc:creator>
      <description>पांच सौ तीन करोड़ रुपए। सिर्फ कागज़ की कुछ पर्चियों ने सरकारी तिजोरी से इतनी बड़ी रकम का रास्ता काट लिया, और यह सब हुआ शिक्षा विभाग में। विडंबना देखिए, जिस…</description>
      <content:encoded><![CDATA[<h1 id="फर्जी-पर्चियों-से-शिक्षा-विभाग-में-503-करोड़-का-घोटाला">फर्जी पर्चियों से शिक्षा विभाग में 503 करोड़ का घोटाला</h1>

<h2 id="संपादक-की-राय">संपादक की राय</h2>

<p>पांच सौ तीन करोड़ रुपए। सिर्फ कागज़ की कुछ पर्चियों ने सरकारी तिजोरी से इतनी बड़ी रकम का रास्ता काट लिया, और यह सब हुआ शिक्षा विभाग में। विडंबना देखिए, जिस तंत्र पर स्कूलों की निगरानी का दारोमदार था, वही इन पर्चियों को थामे बैठा था, जैसे वह कोई पवित्र विधान हो। अब कोई बताए कि ‘निगरानी’ शब्द का नया अर्थ क्या निकाला जाए, जब रखवाला ही सेंध लगाने वालों का सरगना बन जाए?</p>

<p>यह तो उस व्यवस्था का खुला खेल है, जहाँ नियम बनाने वाले ही नियमों की आड़ में खेल रचते हैं। उन शिक्षा मॉनिटरिंग स्टाफ की कलाई पर घड़ी बांधकर उन्हें विद्यालयों की गुणवत्ता सुधारने भेजा गया था, लेकिन उनकी आँखों पर तो नोटों की पट्टी बंधी थी। कागज़ की रद्दी के बराबर भी मूल्य न रखने वाली पर्चियों ने जब करोड़ों की हस्ती बना ली, तो फिर भला कौन कहेगा कि ईमानदारी की कीमत नहीं होती?</p>

<p>क्या यह महज कागज़ी खेल था, या फिर उससे भी बढ़कर, एक सुनियोजित साजिश? वह कौन सी अदृश्य शक्ति थी जो इन मॉनिटरिंग स्टाफ के पीछे खड़ी थी, जिसने उन्हें इतनी छूट दी कि वे बेखौफ होकर इस ‘पर्ची-पुराण’ को अंजाम देते रहे? गुलाबी नगर के गलियारों में ऐसी कथाएं नई नहीं हैं, जहाँ छोटे मोहरे अक्सर बड़े खिलाड़ियों की बिसात पर चलते हैं।</p>

<p>पाँच सौ तीन करोड़। ज़रा सोचिए, यह रकम उन लाखों बच्चों के लिए क्या कुछ नहीं कर सकती थी, जिन्हें आज भी टूटी छतों और बिना किताबों के भविष्य गढ़ना पड़ता है। कितने नए स्कूल बन सकते थे, कितने शिक्षकों को बेहतर प्रशिक्षण मिल सकता था, कितने गरीब बच्चों को पोषण मिल सकता था। लेकिन नहीं, यह धन तो पर्चियों के ज़रिए कुछ मुट्ठीभर लोगों की तिजोरियों में चला गया, और हमारे बच्चों का भविष्य फिर से अंधेरे में धकेल दिया गया।</p>

<p>यह सिर्फ एक घोटाला नहीं, यह उस भरोसे की हत्या है जो एक नागरिक अपने सरकारी तंत्र पर रखता है। जब शिक्षा जैसे मूलभूत क्षेत्र में भी ऐसी लूट मचे, तो फिर किस बात पर विश्वास किया जाए? क्या हम यह मान लें कि हमारे बच्चों की पढ़ाई भी अब कुछ भ्रष्ट अधिकारियों के हाथों की कठपुतली बन चुकी है, जिसके धागे दिल्ली और जयपुर के अनाम कोनों से खींचे जा रहे हैं?</p>

<p>हर बार यही होता है। कोई नया घोटाला सामने आता है, सुर्खियाँ बनती हैं, कुछ गिरफ्तारियाँ होती हैं, और फिर सब शांत। अगले चुनाव तक जनता की याददाश्त से यह मिट जाता है, और फिर कोई नया ‘पर्ची-घोटाला’ तैयार हो जाता है। यह अब हमारी आदत बन चुकी है – हर नए घोटाले को पुराने की धुंधली याद की तरह देखना।</p>

<p>सवाल यह नहीं कि यह घोटाला हुआ कैसे, सवाल यह है कि इसे होने दिया क्यों गया? और सबसे बड़ा सवाल यह कि क्या अब भी कोई उम्मीद बची है कि किसी दिन शिक्षा के नाम पर होने वाली यह लूट सचमुच बंद होगी, या हम बस यूँ ही कागज़ की पर्चियों से अपने बच्चों का भविष्य बिकते देखते रहेंगे?</p>
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