जयपुर संपादकीय — 24 September 2026
नीट-पीजी: व्यवस्था का इम्तिहान
संपादक की राय
किसी छात्र से पूछिए, ‘परीक्षा’ शब्द सुनते ही उसके चेहरे पर कैसा भाव आता है। अब उसे ‘पुनः-परीक्षा’ या ‘री-एग्जाम’ कह कर देखिए, शायद ही कोई ऐसी गालियां होंगी जो उसके ज़हन में न आएं। जयपुर में नीट-पीजी की पुनः-परीक्षा का होना महज़ एक ख़बर नहीं, उन हज़ारों सपनों का एक और मातम है जो साल भर किताबों में डूबे रहे।
यह सिर्फ़ एक तारीख़ का बदलना नहीं। यह घंटों का सफर, अभिभावकों की बची-खुची पूंजी, और महीनों की मानसिक यंत्रणा का दोहराव है। जिस व्यवस्था पर लाखों युवाओं के भविष्य को गढ़ने की ज़िम्मेदारी है, वह एक अदद परीक्षा तक ढंग से नहीं करवा सकती, तो फिर किस बात की डींगें हांकते हैं हम शिक्षा-व्यवस्था की?
हमारे यहां तो ‘व्यवस्था’ शब्द आजकल मज़ाक का पर्याय बन गया है। पहले परीक्षा का लीक होना, फिर रद्द होना, और अब ‘पुनः-परीक्षा’ की घोषणा। लगता है यह एक वार्षिक अनुष्ठान बन गया है, जहां छात्रों को हर बार अग्नि-परीक्षा से गुज़रना पड़ता है, जबकि आयोजक ‘सत्यनारायण भगवान की कथा’ की तरह हर बार वही कहानी दोहराते हैं।
यह केवल नीट-पीजी का मामला नहीं। यह हर उस परीक्षा का अघोषित सच है, जहां पर्चा बनता है, पर्चा बिकता है, और फिर पर्चा रद्द होता है। कब तक हम इस खोखली उम्मीद पर जीते रहेंगे कि ‘इस बार सब ठीक होगा’? हर बार वही बेतुके आश्वासन, वही लीपापोती, और वही छात्रों का भविष्य दांव पर।
गुलाबी नगर, जिसे कभी शिक्षा और संस्कृति का केंद्र कहा जाता था, आज परीक्षाओं के इस भंवर में खुद को फंसा पाता है। यहां के कोचिंग संस्थानों की चमक, छात्रों की भीड़, सब एक ऐसी दौड़ में शामिल हैं जिसका ट्रैक ही हर साल टूट जाता है। जयपुर में बैठ कर यह सब देखना और भी टीस देता है, जब जानते हैं कि सत्ता के गलियारों में बैठे लोग इन ‘छोटी-मोटी’ बातों पर ध्यान देना अपनी शान के खिलाफ समझते हैं।
इस पुनः-परीक्षा के पीछे का असली कारण क्या है? क्या यह प्रशासनिक चूक थी? या फिर वह पुराना ‘पेपर लीक’ का भूत, जो हर बार परीक्षा भवन की दहलीज पर तांडव करने आ जाता है? कोई पारदर्शिता नहीं, कोई जवाबदेही नहीं। बस एक बयान – ‘पुनः-परीक्षा होगी’। जैसे यह कोई सामान्य प्रक्रिया हो।
छात्र, बेचारे, बस सिर झुकाकर निर्देशों का पालन करते हैं। उनके पास कोई और विकल्प नहीं। उनका भविष्य कुछ मुट्ठीभर अफ़सरों और कुछ भ्रष्ट तत्वों के रहमोकरम पर टिका है। एक बार फिर, वे बस यही दुआ करेंगे कि इस बार तो कम से कम उन्हें बिना किसी व्यवधान के अपनी क़िस्मत आज़माने का मौका मिल जाए।
सवाल सिर्फ़ परीक्षा का नहीं, सवाल उस भरोसे का है जो धीरे-धीरे टूट रहा है। क्या हम अपने बच्चों को वाकई एक ऐसा भविष्य दे रहे हैं जहाँ योग्यता नहीं, बल्कि क़िस्मत और ‘व्यवस्था की कृपा’ ही सब कुछ तय करेगी? जवाब की उम्मीद शायद इस ‘पुनः-परीक्षा’ के परिणाम से भी ज़्यादा देर से मिलेगी, या शायद कभी नहीं।