जयपुर संपादकीय — 26 July 2026
“भारत टैक्सी”: गुलाबी शहर का नया ख्वाब?
संपादक की राय
गुलाबी नगरी की सड़कों पर एक और ‘क्रांति’ का ढोल बजा है। मुख्यमंत्री ने ‘भारत टैक्सी’ सेवा का उद्घाटन किया, बड़े-बड़े वादे हुए – ओला-उबर से 15% सस्ता। क्या यह वही कहानी नहीं, जो हम वर्षों से सुनते आ रहे हैं? नए रंग-रोगन के साथ पुरानी बोतल में नया शोरबा, बस नाम बदल दिया गया है। जनता को तो बस एक सवारी चाहिए, लेकिन हर बार उन्हें एक नया सपना थमा दिया जाता है।
दावा है कि यह ‘सहकारी’ मॉडल परिवर्तनकारी बदलाव लाएगा। परिवर्तन? क्या परिवर्तन होगा? क्या वे ऑटो वाले सुधर जाएंगे जो मीटर पर चलने से पहले सौ नखरे दिखाते हैं? क्या वे टैक्सी चालक अनुशासित हो जाएंगे जो मनमानी दरों पर यात्रियों को लूटते हैं? या फिर यह सिर्फ एक और सरकारी उपक्रम होगा, जो कुछ महीने शोर मचाएगा और फिर अपनी ही लागतों के बोझ तले हांफने लगेगा?
पूरे जयपुर के लिए सौ कैब। सिर्फ सौ! इस शहर की आबादी, इसकी सड़कों पर दौड़ती गाड़ियां, और हर दिन की यातायात समस्या। सौ टैक्सियां इस विशालकाय समस्या के सामने क्या हैं? एक बूंद, एक जुमला, एक फोटो-ऑप। यह समाधान नहीं, यह तो मजाक है, उस जनता के साथ जो हर सुबह बस स्टैंड या टैक्सी स्टैंड पर अपनी बारी का इंतज़ार करती है।
मंत्रियों के बयानों में यह “सहकारी क्षेत्र में परिवर्तनकारी बदलाव” है। वाह! क्या यह परिवर्तन तब आएगा जब 15% सस्ती सवारी ढूंढते-ढूंढते एक आम आदमी पंद्रह और जगह ठगा जाएगा? या जब इन सौ टैक्सियों को ढूंढने में उसका इतना समय और पैसा खर्च हो जाएगा कि वह ओला-उबर की महंगी सवारी को ही बेहतर समझने लगेगा? परिवर्तन अक्सर कागजों पर बड़ा लगता है, जमीन पर आते ही वह धूल चाटने लगता है।
यह पहली बार नहीं है जब सरकार ने परिवहन के क्षेत्र में ऐसे ‘मास्टरस्ट्रोक’ चलने की कोशिश की है। सरकारी बसों की बदहाली, निजी ऑपरेटरों की मनमानी, और फिर कुछ नई योजनाओं का ऐलान। क्या पिछली योजनाएं इतनी सफल थीं कि अब एक नई ‘भारत टैक्सी’ की जरूरत पड़ गई? या पुरानी विफलताओं को ढकने का यह एक और तरीका है? शहर के लोग इन कहानियों से अब थक चुके हैं।
ओला और उबर को टक्कर देने की बात हो रही है। ठीक है। लेकिन क्या सरकार पहले अपनी परिवहन व्यवस्था को इतना सक्षम नहीं बना सकती कि निजी प्लेयर्स को टक्कर देने के लिए उसे ऐसे “सहकारी” ढोंग रचने पड़ें? क्या यह एक स्वस्थ प्रतिस्पर्धा है, या सत्ता का सहारा लेकर बाजार में घुसने की एक चाल? अंतिम बोझ किसे उठाना पड़ेगा – सरकार को (हमारे टैक्स के पैसों से) या फिर उन ड्राइवरों को, जो इस नए जुमले के तले पिसेंगे?
सवालों की लंबी फेहरिस्त है, लेकिन जवाब हमेशा खामोश रहते हैं। गुलाबी नगर की सड़कों पर आज एक नई चमचमाती टैक्सी दौड़नी शुरू हुई है। कितने दिन दौड़ेगी? कितनी दूर जाएगी? और क्या यह सच में किसी की यात्रा को आसान बनाएगी, या सिर्फ सरकार के रिपोर्ट कार्ड में एक और बेजान आंकड़ा बन कर रह जाएगी? वक्त बताएगा, या शायद नहीं। शायद हम तब तक किसी और ‘क्रांति’ का ढोल सुनने को तैयार बैठे होंगे।