जयपुर संपादकीय — 30 May 2026
नामी क्रिकेटर पर मासूम से दुष्कर्म का आरोप
संपादक की राय
जयपुर की गुलाबी शामों में, जहाँ अभी कुछ दिन पहले तक क्रिकेट के रंगीन नज़ारों का शोर था, जहाँ हर चौके-छक्के पर तालियों की गूँज आसमान छू रही थी, वहाँ आज एक स्याह, असहज चुप्पी पसरी है। उस खेल का एक सितारा, जिसकी चमक से मैदान रोशन होते थे, आज एक नन्ही ज़िंदगी पर कालिख पोतने के आरोप में कठघरे में खड़ा है। यह सिर्फ एक खिलाड़ी की बात नहीं, यह उस पाखंड की बात है जो हमारी आँखों पर पट्टी बाँधे रखता है, जब तक कि कोई वारदात सीधे हमारे दरवाज़े पर दस्तक न दे दे।
गुलाबी नगरी के जिस माथे पर विरासत और संस्कृति का तिलक सजा है, आज उस पर शर्म का टीका लगा है। एक नाबालिग के साथ दरिंदगी का आरोप, और वह भी उस शख्स पर जिसे युवा पीढ़ी अपना आदर्श मानती है, यह सवाल उठाता है कि आखिर हम किस समाज का निर्माण कर रहे हैं? क्या हमारी सराहना और हमारे नायकत्व की परिभाषा इतनी खोखली हो चुकी है कि वह इन जघन्य कृत्यों के सामने भी अपना सिर नहीं झुकाती?
सवाल सिर्फ FIR दर्ज होने का नहीं है, सवाल उस व्यवस्था का है जो ऐसे मामलों में अक्सर अपनी आँखें फेर लेती है, या फिर इतनी धीमी चलती है कि न्याय की उम्मीद ही दम तोड़ देती है। क्या यह रसूख और पैसा ही होगा जो इस गंभीर आरोप की धार को कुंद कर देगा? या फिर हर बार की तरह, कुछ दिन की गहमागहमी के बाद, यह मामला भी अखबारों के पन्नों से गुमनाम अंधेरों में खो जाएगा?
जयपुर, जो खुद को सुरक्षित और सभ्य शहरों की कतार में गिनता है, वहाँ ऐसी घटनाएँ बार-बार क्यों दोहराई जाती हैं? जब खेल के मैदान के नायक ही हमारी बेटियों की सुरक्षा के लिए खतरा बन जाएँ, तो फिर उन सरकारी दावों और सुरक्षा के वायदों का क्या अर्थ रह जाता है, जो हर चुनाव में हमें सुनने को मिलते हैं? यह सिर्फ एक खिलाड़ी का अपराध नहीं, यह उस सामूहिक उदासीनता का प्रतिबिंब है जो हमें ऐसे मामलों पर खुलकर बोलने से रोकती है।
हम बड़ी आसानी से किसी भी सार्वजनिक व्यक्ति की कमियों को उसकी प्रतिभा के आवरण में छिपा लेते हैं। “वह तो बस एक गलती थी,” “उसने बहुत नाम कमाया है,” “करियर खराब हो जाएगा” – ऐसे तमाम तर्क हमारी जुबान पर होते हैं, लेकिन उस नाबालिग के टूटे हुए विश्वास और उस परिवार की पीड़ा के लिए हमारे पास अक्सर कोई शब्द नहीं होते। यह कैसी विडंबना है कि हम खिलाड़ियों को भगवान का दर्जा दे देते हैं, लेकिन इंसानियत के सबसे निचले स्तर पर गिरने पर भी उनकी पूजा जारी रखते हैं।
एक तरफ जहाँ गुलाबी नगरी के विकास के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, वहीं दूसरी ओर उसकी सड़कों पर, उसके घरों में, उसकी गलियों में, बेटियाँ आज भी असुरक्षित महसूस करती हैं। यह घटना एक कड़वा आईना है, जो हमें दिखाता है कि चमक-दमक के पीछे कितना अंधेरा छुपा है। क्या हम सिर्फ दिखावे की दुनिया में जी रहे हैं, जहाँ प्रतिष्ठा और पैसे के आगे हर अपराध छोटा पड़ जाता है?
तो फिर, क्या उम्मीद करें हम? क्या अब भी हम उन्हीं झूठे नारों और खोखले आश्वासनों पर तालियाँ पीटते रहेंगे, या इस बार अपनी बेटियों के लिए, न्याय के लिए, और इस शहर की आत्मा के लिए, एक असहज सवाल अपनी ज़ुबान पर लाएँगे? या सिर्फ यह कहकर पल्ला झाड़ लेंगे कि “पुलिस अपना काम कर रही है”?