जयपुर संपादकीय — 31 May 2026
अवैध निर्माण पर सुप्रीम कोर्ट की नगर निगम को फटकार
संपादक की राय
आज जब देश की सर्वोच्च अदालत का हथौड़ा जयपुर के नगर निगम अधिकारियों पर गरजा, तो एक पल के लिए लगा कि शायद अब शहर में कानून का राज सचमुच स्थापित होगा। लेकिन यह मुगालता जल्द ही टूटा। यह सिर्फ एक चेतावनी नहीं थी, यह एक आईना था जो दिखा रहा था कि गुलाबी नगरी की प्रशासनिक व्यवस्था कितनी बेबाक और बेलगाम हो चुकी है। सुप्रीम कोर्ट को याद दिलाना पड़ रहा है कि उसके आदेशों का पालन हो, यह अपने आप में एक काला अध्याय है।
यह कोई छोटी-मोटी फाइल का लटकाना नहीं था, बल्कि न्यायालय के स्पष्ट ‘डी-सीलिंग’ आदेश की जानबूझकर की गई अवहेलना थी। सर्वोच्च अदालत ने कोई सलाह नहीं दी थी, उसने आदेश दिया था। और उस आदेश को जयपुर के नगर निगम के अधिकारियों ने अपने जूते की नोंक पर रखा। क्या यह अधिकार का दुरुपयोग नहीं, तो और क्या है? या क्या उन्हें लगता है कि दिल्ली का सिंहासन इतनी दूर है कि गुलाबी शहर की अट्टालिकाओं से उनकी हुंकार वहाँ तक नहीं पहुँच पाएगी?
सवाल यह नहीं कि आदेश क्यों नहीं माना गया। सवाल यह है कि इसकी हिम्मत कहाँ से आती है? क्या ये अधिकारी किसी अदृश्य शक्ति के संरक्षक हैं, जिन्हें लगता है कि वे देश के संविधान से भी ऊपर हैं? या फिर यह उनकी अपनी सल्तनत है, जहाँ कानून सिर्फ एक दिखावा है, और असली हुक्म किसी और कलम से जारी होते हैं, जिनकी स्याही का रंग शायद नोटों के बंडलों से तय होता है?
कभी लगता था कि न्यायपालिका की गरिमा ऐसी है कि उसकी तरफ आँख उठाकर देखना भी अपराध है। लेकिन जयपुर में तो अब आँखें झुकाने का नाटक भी नहीं होता। यहाँ तो सीधी चुनौती दी जाती है, खुलेआम ललकारा जाता है। जैसे कह रहे हों, ‘कर लो जो करना है, हमारा क्या बिगाड़ लोगे।’ और दुर्भाग्य से, अक्सर उनका कुछ बिगड़ता भी नहीं।
डी-सीलिंग के आदेश अक्सर व्यावसायिक संपत्तियों से जुड़े होते हैं। ये कोई गरीब की झोपड़ी या छोटे व्यापारी की दुकान नहीं होती, जिन पर कानून की तलवार आसानी से चल जाती है। यह उन बड़े मगरमच्छों की बात होती है, जो सत्ता के गलियारों में अपने पैर जमाए रखते हैं। और इन अधिकारियों की ‘अनदेखी’ के पीछे किसका हाथ होता है, यह सवाल पूछने की भी अब हिम्मत नहीं बची।
यह सिर्फ एक कानूनी अवमानना का मामला नहीं है। यह उन आम नागरिकों के विश्वास का हनन है जो अपनी छोटी-छोटी समस्याओं के लिए कचहरी के धक्के खाते हैं, और उन्हें उम्मीद होती है कि अंततः न्याय मिलेगा। जब सबसे बड़े न्यायालय के आदेश की धज्जियाँ उड़ती हैं, तो यह विश्वास रेत की तरह बिखर जाता है। और फिर यह व्यवस्था सिर्फ एक मजाक बनकर रह जाती है।
अब सर्वोच्च न्यायालय ने कड़ी चेतावनी दी है। लेकिन क्या यह चेतावनी सिर्फ हवा में घुलेगी, या वाकई किसी को सबक सिखाएगी? या फिर यह भी एक और औपचारिकता बनकर रह जाएगी, जिसके बाद कुछ दिनों की चुप्पी होगी, और फिर वही पुरानी कहानी दोहराई जाएगी? जब कानून के रखवाले ही कानून को तोड़ने का खेल खेलें, तो फिर किस पर भरोसा करें?
गुलाबी नगरी की यह गुलाबी सुबह, अब सिर्फ एक दागदार शाम का इंतज़ार कर रही है, जहाँ सूरज के डूबने के साथ-साथ, उम्मीदें भी दम तोड़ देंगी।