जयपुर संपादकीय

सुप्रीम कोर्ट में गैरहाज़िर रहा जयपुर विकास प्राधिकरण

संपादक की राय

जयपुर विकास प्राधिकरण! गुलाबी शहर के विकास के लिए गठित यह संस्था, जिसका नाम सुनकर कभी सीना चौड़ा होता था, आज सर्वोच्च न्यायालय में अपने ही शहर के अवैध निर्माणों पर जवाब देने से नदारद रही। क्या यह गुलाबी नगर अब इतना बेआबरू हो चुका है कि उसके रखवाले भी न्याय की सबसे ऊँची सीढ़ी पर खड़ी अदालत की अवहेलना करने से नहीं हिचकते? आखिर ऐसी कौन सी आपातकालीन बैठक या ‘विकास’ योजना थी, जो माननीय न्यायाधीशों के सामने हाज़िर होने से ज़्यादा महत्वपूर्ण थी?

यह सिर्फ़ एक सुनवाई में अनुपस्थिति का मामला नहीं है, यह उस पूरे सिस्टम की बेपरवाही का प्रतीक है, जिसने जयपुर को सुनियोजित शहर से बेतरतीब जंगल में बदल दिया है। जहाँ एक ओर शहर के नागरिक अवैध निर्माणों की शिकायतों से जूझते रहते हैं, वहीं दूसरी ओर उन्हीं शिकायतों पर जवाबदेही तय करने वाली संस्था, अदालत में हाज़िर तक नहीं होती। यह क्या दर्शाता है? सिर्फ़ अपनी लापरवाही का कबूलनामा, या फिर यह आत्मविश्वास कि ‘कोई हमारा क्या ही बिगाड़ लेगा’?

गुलाबी शहर की पहचान कभी उसकी भव्य वास्तुकला और योजनाबद्ध बसावट से होती थी। आज यह पहचान उन कंक्रीट के ज़ंगलों में गुम होती जा रही है, जो नियमों को ताक पर रखकर, रातों-रात खड़े कर दिए गए हैं। इन अवैध इमारतों को रोकने वाला प्राधिकरण कहाँ था, जब इनकी नींव रखी जा रही थी? कहाँ थे वे अफ़सर, जिनकी आँखें चौबीसों घंटे शहर पर नज़र रखने के लिए खुली होनी चाहिए थीं? या शायद इन नज़रों पर गुलाबी नोटों की ऐसी पट्टी बंधी थी कि उन्हें सिर्फ़ फायदा ही नज़र आ रहा था, नियम-क़ानून नहीं।

सवाल यह नहीं कि जेडीए कोर्ट क्यों नहीं पहुंचा। सवाल यह है कि अवैध निर्माणों का यह जाल बिछाने की हिम्मत कौन देता है? किसके संरक्षण में ये दीवारें खड़ी होती हैं, जो शहर के चरित्र को निगल रही हैं? क्या ये सब हवा में बन जाते हैं, बिना किसी की मिलीभगत के? यह ज़मीनी हकीकत है कि बिना सत्ता के गलियारों से ‘हरी झंडी’ मिले, एक ईंट भी टेढ़ी नहीं होती। फिर जब बात अदालत तक पहुंचती है, तो वही सत्ताधारी और उनके अफ़सरशाही के प्यादे, अपना पल्ला झाड़ लेते हैं।

यह कैसा विकास है, जो नागरिकों को सुप्रीम कोर्ट तक गुहार लगाने पर मजबूर कर दे? यह कैसा प्रशासन है, जो अपनी ही शिकायतों पर अदालत में हाज़िर होना ज़रूरी नहीं समझता? शायद उनके लिए सर्वोच्च न्यायालय के आदेश महज़ काग़ज़ के टुकड़े हैं, जिन्हें ठंडे बस्ते में डालना उनकी आदत बन चुकी है। जयपुर के निवासी अपनी आँखों से देखते हैं कि कैसे छोटे-मोटे मामलों में आम आदमी को दौड़ाया जाता है, और कैसे ‘खास’ लोगों के लिए नियम-क़ानून बदल दिए जाते हैं या अनदेखे कर दिए जाते हैं।

यह जेडीए की अनुपस्थिति केवल एक तकनीकी चूक नहीं, यह जयपुर के उन लाखों लोगों के भरोसे पर एक चोट है, जो अपनी मेहनत की कमाई से घर बनाते हैं और आशा करते हैं कि उनके शहर का विकास सही दिशा में होगा। लेकिन जब विकास की बागडोर संभालने वाले ही अपनी ज़िम्मेदारी से मुंह मोड़ लें, तो फिर उम्मीद किससे की जाए? क्या यह चुप्पी इस बात का संकेत है कि अब सिर्फ़ अदालतें ही गुलाबी शहर की बेसुरी धुन पर कोई ताल दे सकती हैं, या वे भी अंततः थक जाएंगी?

जब एक संस्था, जिसका काम शहर को व्यवस्थित करना है, ख़ुद ही इतनी अव्यवस्थित हो जाए कि सर्वोच्च न्यायालय को भी उसे चेतावनी देनी पड़े, तो यह गुलाबी नगरी के लिए एक असहज सवाल बन जाता है। क्या यह शहर अब सिर्फ़ कागज़ों पर ही गुलाबी रहेगा, और हकीकत में भ्रष्टाचार और बेतरतीबी के काले दाग़ों से लिपटा रहेगा? जवाब शायद हवा में है, और वो हवा भी अब ज़हरीली होती जा रही है।