जयपुर संपादकीय — 2 June 2026
नमक-साबुन से बनती नकली खाद का पर्दाफ़ाश
संपादक की राय
जयपुर, गुलाबी शहर। यहाँ की हवा में अब सिर्फ़ गुलाबों की महक नहीं, बल्कि नमक और साबुन के घोल की ज़हरीली गंध भी घुल गई है। क्या पता, जिस खेत से अनाज आ रहा है, उसमें फसल उगाने के नाम पर ज़हर बोया गया हो? यह कौन सी सभ्यता है, जहाँ अन्नदाता के पेट पर लात मारने के लिए ‘खाद’ का मुखौटा लगाया जाता है?
कहते हैं, कृषि प्रधान देश है हमारा। लेकिन यहाँ कृषकों की पीठ में छुरा घोंपने के लिए नए-नए नुस्खे ईजाद किए जा रहे हैं। जैविक खाद? नहीं साहब, यह तो जैविक धोखा है! नमक, मिट्टी और साबुन का मिश्रण, जिसे ‘जैविक’ का तमगा पहनाकर बेचा जा रहा था। क्या बाज़ार में अब हर चीज़ की शुद्धता पर सवालिया निशान लगाना पड़ेगा? या हमारी ज़ुबान पर भरोसा करने से पहले प्रयोगशाला की रिपोर्ट देखने की आदत डाल लें?
यह सिर्फ़ पैसा बनाने का खेल नहीं है; यह तो फसलों का क़त्ल है, मिट्टी की सेहत से खिलवाड़ है, और किसानों की रीढ़ तोड़ने की साज़िश। जो खाद पौधों को जीवन देता है, उसे ज़हर बनाकर खेतों में फैलाया जा रहा था। जब फसलें गल जाएंगी, पेट खाली रह जाएंगे, तब कौन पूछेगा कि अन्न कहाँ से आएगा? क्या यह गुलाबी नगरी इतनी बेरंग हो गई है कि यहाँ अब इंसानों को भी ‘प्रोडक्ट’ समझा जाने लगा है, जिनकी फ़सलों को गलने दिया जाए?
यह सब किसी सुनसान जंगल में तो नहीं हो रहा था। शहर के बीचों-बीच, एक अवैध गोदाम में, यह ‘उद्योग’ फल-फूल रहा था। क्या हमारी निगरानी व्यवस्था इतनी कमज़ोर है, या इतनी आँखें मूंदे बैठी है कि उसे नमक के ढेरों में जैविक खाद का भविष्य नहीं दिख रहा था? पुलिस और प्रशासन की चाबुक तब चलती है, जब सब कुछ हो चुका होता है। इससे पहले उनके गुप्तचर कहाँ सो रहे होते हैं, या किस ‘अवैध’ आय में लिप्त होते हैं, यह सवाल हमेशा अनसुना ही रहता है।
एक तरफ़ हम ‘स्मार्ट सिटी’ और ‘विकसित राजस्थान’ के नारों से आसमान गूंजाते हैं, और दूसरी तरफ़ हमारे ही शहर में ज़हर बनाने की फैक्ट्रियां धड़ल्ले से चल रही हैं। यह कैसा विकास है, जो जड़ों को खोखला कर रहा है? क्या हमने अपनी प्राथमिकताओं को इतना उलझा दिया है कि अब लाभ के सामने जीवन का मूल्य कुछ भी नहीं रहा? गुलाबी नगर की यह दोहरी ज़िंदगी, एक मुखौटा है, जिसके पीछे सड़ांध है।
यह अकेली घटना नहीं है। यह तो उस बड़ी बीमारी का एक छोटा सा लक्षण है, जो हमारे समाज में घर कर गई है। हर कोई जल्दी अमीर बनना चाहता है, चाहे उसके लिए दूसरों को कितना भी नुकसान क्यों न उठाना पड़े। ईमानदारी, नैतिकता, मानवीयता — ये सब अब शब्दकोश के पन्ने भर हैं, जिन्हें सिर्फ़ भाषणों में दोहराया जाता है, असल ज़िंदगी में नहीं। क्या हम सचमुच इतने खोखले हो गए हैं?
जब मिट्टी में ज़हर घोला जा रहा हो, और अन्न में मिलावट की जा रही हो, तब किस ‘अमृत काल’ की बात करें हम? अगली बार जब थाली में रोटी आए, तो क्या यह सोचना पड़ेगा कि इसके पीछे किसी की धोखाधड़ी तो नहीं? या यह प्रश्न पूछना ही छोड़ दें, क्योंकि जवाब हमेशा एक और कड़वी सच्चाई ही होगा?