जयपुर संपादकीय

मुख्यमंत्री के काफिले ने भिड़ाईं बसें और कारें

संपादक की राय

आज गुलाबी नगर के चौराहों पर जो दृश्य हमने देखा, वह महज़ एक दुर्घटना नहीं, बल्कि हमारे तंत्र के भीतर धंस चुकी उस सड़ी हुई मानसिकता का जीता-जागता प्रमाण है, जहाँ आम नागरिक का अस्तित्व सत्ता की राह में बिछे धूल-मिट्टी के समान है। मुख्यमंत्री के काफिले को रास्ता देने की “व्यवस्था” जब बसों को कारों से भिड़ा दे, तो सवाल ट्रैफिक जाम का नहीं, बल्कि हमारी प्राथमिकता का उठता है। क्या यह मुख्यमंत्री के आगमन का जयघोष था, या व्यवस्था की अंतिम साँसों की आहट?

सोचिए, उन बेगुनाह लोगों का क्या कसूर था, जिनकी गाड़ियाँ टुकड़े-टुकड़े हो गईं, सिर्फ इसलिए कि दिल्ली से आए किसी महत्वपूर्ण व्यक्ति के स्वागत में पलकें बिछाई जा सकें? पुलिस का काम यातायात सुचारु रखना है, उसे रोककर अराजकता फैलाना नहीं। पर जब सत्ता का गलियारा महज़ एक व्यक्ति के लिए सड़क को अखाड़ा बना दे, तो फिर नियम-कानून, आमजन की सुरक्षा – सब ताक पर धर दिए जाते हैं। यह कैसी सुरक्षा है, जो अपने ही नागरिकों को खतरे में डाल दे?

यह कोई नई बात नहीं। हमारे लोकतंत्र में ‘वीआईपी संस्कृति’ एक लाइलाज बीमारी बन चुकी है। मुख्यमंत्री क्या, एक छोटे से अधिकारी की गाड़ी भी निकलती है तो दस लोग उसे सलामी देने और रास्ता रोकने को तैयार खड़े होते हैं। यह गुलामी की मानसिकता है या सत्ता के भय का नतीजा? गुलाबी नगरी तो वैसे भी राजसी वैभव के लिए जानी जाती है, पर अब यह वैभव सड़क पर आम आदमी की बर्बादी के रूप में परोसा जा रहा है।

सड़क पर खड़ा ट्रैफिक पुलिसकर्मी, जो मुख्यमंत्री के काफिले के लिए पलक झपकते ही शहर को स्तब्ध कर देता है, वही शायद दिन भर आम आदमी की शिकायतों को अनसुना करता होगा। यह विरोधाभास सत्ता के गलियारों में बैठे लोगों को क्यों नहीं दिखता? या शायद दिखता है, पर उनकी नजरों में आमजन की फटी जेबें और टूटी गाड़ियाँ मायने ही नहीं रखतीं। उनके लिए तो यह एक सफल “बन्दोबस्त” है।

जयपुर, जो दुनिया भर में अपनी मेहमाननवाज़ी और खूबसूरती के लिए मशहूर है, उसकी अपनी जनता के साथ यही सलूक क्यों? एक तरफ हम पर्यटकों को ‘पधारो म्हारे देस’ कहते हैं, दूसरी तरफ अपने ही नागरिकों को ‘हटो म्हारे रास्ते से’ का संदेश देते हैं। यह दोहरा मापदंड हमारी सामाजिक व्यवस्था की रीढ़ को खोखला कर रहा है।

सैकड़ों लोग बसों और कारों में फंसे रहे होंगे, अपने दफ्तरों, घरों या अस्पतालों तक पहुंचने की जद्दोजहद करते हुए। किसी की ट्रेन छूटी होगी, किसी की ज़रूरी मीटिंग। पर यह सब किस कीमत पर? उस क्षणिक आभासी महत्व के लिए, जब सत्ता का प्रतीक चंद मिनटों के लिए शहर से गुज़रता है। यह कैसा विकास है, जो नागरिक जीवन को ही बाधित कर दे?

क्या कभी किसी ‘माननीय’ ने सोचा है कि उनके काफिले की वजह से होने वाली हर अड़चन, हर नुकसान, उनके शासन पर एक काला धब्बा है? यह केवल सड़क पर हुई एक टक्कर नहीं, यह लोकतंत्र के उन स्तंभों पर हुआ प्रहार है, जिन पर जनता का विश्वास टिका होता है। यह सिर्फ लोहा और प्लास्टिक का नुकसान नहीं, यह भरोसे का टूटना है।

शायद हम सब, जो इस तमाशे के मूक दर्शक हैं, उतने ही दोषी हैं। हम शिकायत करते हैं, पर फिर अगले काफिले के लिए रास्ता साफ करने को तैयार खड़े रहते हैं। यह चुप्पी कब टूटेगी? कब हम पूछेंगे कि आखिर यह राजशाही प्रदर्शन, इस आधुनिक लोकतंत्र में, किसलिए? या फिर यही हमारी नियति बन चुकी है – नेताओं के काफिले के सामने सिर झुकाकर खड़े रहना, और अपने नुकसान पर खुद ही मातम मनाना?