जयपुर संपादकीय — 4 June 2026
रिहायशी इलाकों के व्यवसायीकरण पर सुप्रीम कोर्ट सख़्त
संपादक की राय
गुलाबी नगर की गलियों में एक अजीब सी खामोशी पसरी है, या यूँ कहिए कि इतनी चहल-पहल है कि सुप्रीम कोर्ट के डंडे की आवाज़ भी उसमें दबने लगी है। जब देश की सर्वोच्च अदालत को जयपुर विकास प्राधिकरण (JDA) को यह याद दिलाना पड़े कि भाई, आवासीय इलाकों को बाज़ार में तब्दील होने से रोको, तो समझना चाहिए कि ज़मीनी हकीकत कितनी बेकाबू हो चुकी है। क्या यह हमारे ‘विकास’ की नई परिभाषा है, जहाँ रिहायशी सुकून को वाणिज्यिक शोर-शराबे के आगे घुटने टेकने पड़ते हैं?
यह वही शहर है जो कभी अपने सुनियोजित नक्शे और शांतिपूर्ण आवासीय क्षेत्रों के लिए जाना जाता था। आज आप किसी भी गली में निकल पड़िए, हर दूसरे घर के बाहर एक बोर्ड टंगा मिलेगा – कोचिंग सेंटर, बुटीक, क्लिनिक, रेस्टोरेंट। क्या JDA के अधिकारियों की आँखों पर इतने मोटे परदे पड़ गए हैं कि उन्हें यह खुला उल्लंघन दिखता ही नहीं? या फिर यह जानबूझकर ओढ़ी गई अज्ञानता है, जिसकी अपनी कीमतें तय होती हैं?
JDA का काम सिर्फ़ कागज़ों पर योजनाएँ बनाना और नई कॉलोनियों के नक्शे पास करना नहीं है। उसका मूलभूत दायित्व है शहर के स्वरूप को बनाए रखना, उसके कायदों को लागू करना। लेकिन यहाँ तो आलम यह है कि नियमों को ताक पर रखकर की जा रही गतिविधियों को तब तक पाला जाता है, जब तक वे एक विकराल समस्या न बन जाएँ और किसी अदालत को हस्तक्षेप न करना पड़े। यह केवल लापरवाही नहीं, यह एक किस्म की शह है, जिसका भुगतान आम नागरिक अपनी शांति, सुरक्षा और सुविधाओं से करता है।
सोचिए, उन रिहायशी इलाकों का हाल, जहाँ कभी बच्चे बेफ़िक्र होकर खेलते थे, आज सुबह-शाम जाम, पार्किंग की किचकिच और ग्राहकों की भीड़ से जूझ रहे हैं। जहाँ एक परिवार को सुकून से रहने का अधिकार था, वहाँ अब रोज़गार के नाम पर रोज़ का सिरदर्द परोस दिया गया है। और इस सब पर कथित विकास की मोहर लगाने वाले हमारे ‘नियोजक’ शायद यह मान बैठे हैं कि शहर की तरक्की का मतलब हर दीवार पर दुकान का बोर्ड लगाना है।
यह कोई नई बात नहीं है। जयपुर के इतिहास में ऐसे कई अध्याय लिखे गए हैं, जब नियमों को सुविधा के अनुसार मोड़ा गया, रातों-रात मास्टर प्लान बदल दिए गए और चंद लोगों के फ़ायदे के लिए पूरे शहर को दांव पर लगा दिया गया। सुप्रीम कोर्ट का यह सवाल आज की नहीं, बल्कि दशकों पुरानी उस प्रवृत्ति पर चोट करता है, जहाँ सत्ता के गलियारों में बैठे लोग अपनी आँखों पर पट्टी बांधकर उन आवाज़ों को अनसुना करते रहे, जो इस अनियोजित विकास के खिलाफ़ उठ रही थीं।
अब सर्वोच्च न्यायालय ने पूछा है, तो शायद कुछ दिनों के लिए दिखावटी तेज़ी देखने को मिलेगी। कुछ छिटपुट चालान होंगे, कुछ छोटे व्यापारियों पर गाज गिरेगी, लेकिन बड़े खिलाड़ियों को क्या कोई छू भी पाएगा? क्या उन अधिकारियों की जवाबदेही तय होगी, जिनकी नाक के नीचे यह सब बरसों से चल रहा है? या फिर यह सिर्फ़ एक और औपचारिकता भर है, जिसके बाद सब कुछ ‘पहले जैसा’ हो जाएगा?
यह सिर्फ़ JDA की अक्षमता का मामला नहीं है, यह उस पूरे सिस्टम की पोल खोलता है जहाँ जवाबदेही एक मज़ाक बनकर रह गई है। जहाँ अदालत को यह याद दिलाना पड़ता है कि शहर ‘नियमों’ से चलते हैं, ‘मर्जी’ से नहीं। तो फिर, सवाल यह है कि हमारे शहर का रखवाला कौन है, जब रखवालों को ही अपने फ़र्ज़ की याद दिलाने के लिए दिल्ली से आवाज़ देनी पड़ती है? यह सवाल हम सभी को चुभना चाहिए, क्योंकि जयपुर की ‘गुलाबी’ पहचान अब ‘स्याही’ में बदलती जा रही है।