जयपुर संपादकीय

अवैध निर्माण पर जेडीए की चुप्पी, सुप्रीम कोर्ट नाराज़

संपादक की राय

जयपुर, जिसे कभी गुलाबी नगर के सुनहरे नाम से जाना जाता था, आज सर्वोच्च न्यायालय की तीखी टिप्पणी के बाद खुद अपने ही दागदार अक्स से शर्मसार खड़ा है। जब देश की सबसे बड़ी अदालत जयपुर विकास प्राधिकरण की उस अनुपस्थिति पर सवाल उठाती है, जो अवैध निर्माण के मामलों में उसकी अपनी ही बेबसी का प्रतीक बन चुकी है, तब यह सिर्फ एक चेतावनी नहीं, बल्कि व्यवस्था के माथे पर लगा एक कलंक है। यह कैसा शहर है, जिसके संरक्षक अपनी ही आंखों पर पट्टी बांधकर घूमते हैं?

यह वही जयपुर है जिसे योजनाबद्ध विकास का प्रतीक माना जाता था। लेकिन आज, इसकी हर गली, हर मोहल्ला एक अनियंत्रित जंगल की कहानी कह रहा है, जहां नियम कागजों पर सो रहे हैं और कंक्रीट के राक्षस सिर उठा रहे हैं। आवासीय क्षेत्रों में धड़ल्ले से चल रहे व्यावसायिक अतिक्रमणों ने शहर के स्वरूप को कुरूप कर दिया है, और इस अराजकता के बीच हमारी नगरपालिकाओं और विकास प्राधिकरणों की चुप्पी किसी बहरेपन से कम नहीं।

क्या यह अक्षमता है, या फिर जानबूझकर ओढ़ी गई बेबसी? आम नागरिक, जिसने एक छोटे से निर्माण के लिए दर्जनों कागज़ और अनुमति के लिए वर्षों धक्के खाए हैं, वह इस खेल को बखूबी समझता है। लेकिन उन बड़े-बड़े व्यावसायिक ढांचों को किसने अनुमति दी, जो रातों-रात रिहायशी इलाकों की छाती पर खड़े हो गए? जिनकी रोशनी रातभर जलती है और जिनकी भीड़ दिनभर सड़कों पर जाम लगाती है, उन्हें कौन से अदृश्य हाथ अभयदान देते हैं?

इस शहर की हर सड़क पर, हर कोने में यह विडंबना साफ दिखती है। जिस हवा में कभी नीम और चमेली की खुशबू घुलती थी, वहां अब रेस्तरां और होटलों की तेज़ गंध घुल चुकी है। जिस सुकून के लिए लोग जयपुर आते थे, वह अब शोर और वाहनों के धुएं में खो चुका है। और इस सब के बावजूद, ‘विकास’ के नाम पर ढोंग रचा जाता है, जबकि हकीकत में यह सिर्फ विनाश का एक और अध्याय है।

उच्चतम न्यायालय को आखिर क्यों इस छोटे से शहर के बड़े-बड़े भ्रष्टाचारों पर अपनी आँखें फेरनी पड़ती हैं? क्या जयपुर के अपने नियामक इतने बेदम हो चुके हैं कि उन्हें अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों का पाठ दिल्ली से आकर पढ़ाया जाए? यह सिर्फ अदालती कार्यवाही नहीं, बल्कि उस शासन प्रणाली पर सीधा तमाचा है, जो अपने ही आंगन में पसरी गंदगी को देखने से इनकार करती है।

सर्वोच्च न्यायालय ने अब जयपुर के नागरिक निकाय से रिपोर्ट तलब की है। क्या यह रिपोर्ट सच्चाई का आईना होगी, या फिर लीपापोती का एक और सरकारी दस्तावेज़? क्या कोई वास्तव में इस अनियंत्रित व्यावसायिकरण के पीछे के चेहरों को बेनकाब करने की हिम्मत करेगा, या फिर यह मामला भी कुछ कागज़ों के ढेर तले दबकर दम तोड़ देगा? जयपुर अपनी साँसें थामे देख रहा है कि उसके अपने ही संरक्षक कब तक अपनी आंखें मूंदे रखेंगे।