जयपुर संपादकीय — 6 June 2026
नमाज़ के नाम पर घंटों जाम रहा जयपुर-दिल्ली हाईवे
संपादक की राय
गुलाबी नगरी की सड़कों पर एक और शुक्रवार बीता। इस बार, प्रार्थना के नाम पर राजधानी को बंधक बना लिया गया। जयपुर-दिल्ली राजमार्ग, जो कभी व्यापार और गति का प्रतीक था, अचानक आस्था के ‘जाम’ में फँस गया। घंटों तक वाहन रेंगते रहे, एम्बुलेंस शायद रास्ते में ही दम तोड़ गईं होंगी, और यात्री अपनी किस्मत को कोसते रहे। यह किसी आंदोलन का नतीजा नहीं था, न किसी आक्रोशित भीड़ का प्रदर्शन। यह तो बस ‘अधिकार’ की एक ऐसी व्याख्या थी, जहाँ सार्वजनिक स्थान, सार्वजनिक सुविधा और सार्वजनिक धैर्य, सब कुछ निजी धार्मिक प्रदर्शन के आगे घुटने टेक गए।
इस ‘धार्मिक रस्साकशी’ में सबसे बड़ा सवाल उन सैकड़ों-हज़ारों लोगों का है, जो अपने रोज़गार, अपनी मर्ज़ी, अपनी ज़रूरतों के लिए इन सड़कों पर थे। क्या यह सड़क उनकी नहीं? क्या उनके समय की कोई क़ीमत नहीं? या फिर यह मान लिया गया है कि महानगर के नागरिक सिर्फ़ एक मूक दर्शक हैं, जिन्हें हर ‘दिव्य’ अवरोध को चुपचाप सह लेना चाहिए? यह कैसी सहिष्णुता है, जो एकतरफ़ा हो चली है?
सवाल उठता है प्रशासन पर। जयपुर की सड़कों पर यह तमाशा क्या पहली बार हुआ है? क्या हमारे पुलिस और यातायात विभाग के लिए यह कोई नई बात है कि ईद के दिन सड़कों पर भीड़ उमड़ती है? क्या कोई पूर्व तैयारी नहीं थी, या फिर जानबूझकर आँखें मूंद ली गईं? क्या कुछ ‘खास’ मौकों पर कानून और व्यवस्था की परिभाषा बदल जाती है? या फिर यह संदेश देना आसान है कि कुछ चीज़ें नियंत्रण से बाहर हैं?
और उन यात्रियों का क्या, जिन्होंने ज़रूरी काम से यात्रा की होगी? बीमार माँ को अस्पताल ले जा रहा बेटा, नौकरी के इंटरव्यू के लिए निकला नौजवान, या सिर्फ़ अपने घर लौटने की जद्दोजहद में फँसा आम आदमी। क्या इस रुकावट से उनकी ज़िंदगी में कोई फ़र्क नहीं पड़ा होगा? क्या उनके समय और परेशानी की भरपाई कोई करेगा? या यह मान लिया गया है कि आस्था के आगे सब जायज़ है, और ये छोटे-मोटे नुक़सान तो होते रहते हैं?
यह केवल यातायात का मामला नहीं है। यह शहर के उस ताने-बाने पर एक सीधा प्रहार है, जहाँ हर नागरिक को समान अधिकार और सुविधाएँ मिलनी चाहिए। जब एक बड़ा राजमार्ग घंटों जाम रहता है, तो यह केवल कुछ गाड़ियों का रुकना नहीं, बल्कि शहर की जीवन-रेखा का अवरुद्ध होना है। यह एक शहर के नागरिक चेतना पर प्रश्नचिन्ह है, जो अपने ही घर में बेबस खड़ा देखता है।
जयपुर को गुलाबी शहर कहा जाता है, जहाँ मेहमाननवाज़ी और शांति की बातें होती हैं। लेकिन जब शहर की धमनियां इस तरह जाम होती हैं, तो वह गुलाबी रंग स्याह पड़ने लगता है। क्या हम एक ऐसे समाज की ओर बढ़ रहे हैं, जहाँ ‘मेरा अधिकार’ इतना बड़ा हो जाता है कि ‘हमारी व्यवस्था’ उसके सामने बौनी नज़र आती है? क्या यही है गुलाबी शहर की नई पहचान?
अंतिम सवाल सिर्फ़ इतना है: क्या जयपुर की सड़कें सिर्फ़ आवागमन के लिए हैं, या फिर समय-समय पर ‘अधिकार प्रदर्शन’ के लिए भी आरक्षित कर दी जाती हैं? और इस प्रदर्शन की क़ीमत कौन चुकाता है? हर बार की तरह, शायद वही आम नागरिक, जिसकी आवाज़ जाम में दबकर रह जाती है।