जयपुर संपादकीय

अपने ही घर में लूटी गई 74 वर्षीय बुज़ुर्ग

संपादक की राय

गुलाबी नगर की आबोहवा में आज एक और कड़वी सच्चाई घुल गई है। क्या यह वही जयपुर है, जहाँ कभी बुज़ुर्गों को घर का आँगन माना जाता था, जहाँ साँझ ढले घर के दरवाज़े भी खुले छोड़ दिए जाते थे? आज यहाँ 74 बरस की एक वृद्धा अपने ही घर में सुरक्षित नहीं। पहले उन्हें निशाना बनाया जाता है, फिर लूटा जाता है, और फिर हम खबर पढ़ते हैं कि मध्यप्रदेश से आए एक अपराधी ने इस वारदात को अंजाम दिया। यह ख़बर नहीं, हमारे माथे पर लगा एक और कलंक है।

लेकिन कहानी यहाँ ख़त्म नहीं होती। उस अपराधी के साथ-साथ, जयपुर के दो कथित “माननीय” खरीदारों को भी हिरासत में लिया गया है। यह “ख़रीदार” कौन हैं? हमारे ही शहर के नागरिक, जो बिना सोचे-समझे, या शायद सब कुछ जानते हुए भी, चोरी का माल खरीदने को तैयार बैठे थे। क्या यह हमारी नैतिकता का पैमाना नहीं, कि एक तरफ हम मंदिरों में माथा टेकते हैं, और दूसरी तरफ़ सस्ते के लालच में अपराध की पौध को सींचते हैं?

जिस शहर में चोरी का सामान खरीदने वाले ग्राहक इतनी आसानी से मिल जाते हों, वहाँ चोरी रुकेगी कैसे? क्या यह अपने आप में एक संगठित बाज़ार नहीं बन गया है, जहाँ अपराधी वारदात को अंजाम देते हैं और “सभ्य” लोग उनके माल को खपाने का इंतज़ाम करते हैं? यह केवल एक लूट की घटना नहीं, यह हमारे समाज के उस खोखलेपन का प्रमाण है जहाँ ईमानदारी की कीमत घट गई है और सुविधा की भूख बढ़ गई है।

सरकारें आती हैं, जाती हैं, “सुरक्षित राजस्थान” के नारे देती हैं, शहर को स्मार्ट बनाने के ख्वाब दिखाती हैं। लेकिन उन सपनों के बीच, एक बूढ़ी माँ का घर, उसकी इज़्ज़त और उसकी जमापूंजी धूल फाँकती रह जाती है। जिन गुलाबी गलियों में हम विदेशी पर्यटकों का स्वागत करते हैं, वहाँ अपने ही घर में एक वृद्ध महिला को खौफ़ में जीने के लिए छोड़ दिया गया है। क्या यह हमारे विकास की परिभाषा है?

कभी एक ज़माना था जब पड़ोसी, रिश्तेदार से बढ़कर होता था। आज वही पड़ोसी शायद किसी कोने में बैठा टीवी पर ख़बरें देखता होगा, या शायद चोरी का कोई सस्ता गहना खरीदने की जुगत में होगा। हमारे आपसी रिश्ते कहाँ गुम हो गए? क्या हम इतने व्यस्त हो गए हैं कि हमारे आसपास हो रहे इन अपराधों को हम सिर्फ़ एक खबर मानकर पन्ना पलट देते हैं?

पुलिस अपनी जगह काम करती है, अपराधी पकड़े जाते हैं, और शायद न्याय भी मिलेगा। लेकिन क्या यह सज़ा सिर्फ़ उस लुटेरे के लिए है, या उन लोगों के लिए भी जो समाज में चोरी का माल खपाकर अपराध को प्रोत्साहन देते हैं? क्या यह सज़ा उस व्यवस्था के लिए भी है जो वादे तो बड़े-बड़े करती है, लेकिन नागरिकों की बुनियादी सुरक्षा पर आँखें मूंद लेती है?

और हम? हम कब तक इस बेबसी और उदासीनता के चादर ओढ़े रहेंगे? कब तक हम अपने घरों की चारदीवारी में खुद को सुरक्षित मानेंगे, जबकि बाहर एक ऐसा बाज़ार तैयार है जो हमारी सुरक्षा और हमारे नैतिक मूल्यों, दोनों को निगलता जा रहा है?

यह घटना एक चेतावनी है। एक 74 वर्षीया महिला का लूटा जाना सिर्फ़ एक समाचार नहीं, यह जयपुर के ज़मीर पर लगा एक गहरा घाव है। और यह ज़ख्म तब तक नहीं भरेगा, जब तक हम गुलाबी नगर की इस दोहरी ज़िंदगी पर सवाल पूछना बंद नहीं करेंगे।