जयपुर संपादकीय — 8 June 2026
44 साल पुरानी मस्जिद ढहाने को बंद हुआ इंटरनेट
संपादक की राय
आज सुबह जयपुर ने खुद को एक अजीब शांति में पाया। सड़कों पर पुलिस के बूटों की आवाज़ और हवा में एक अजीब सा तनाव, जबकि शहर के डिजिटल धमनियों को जानबूझकर बंद कर दिया गया था। यह किसी बाहरी दुश्मन से बचाव की तैयारी नहीं थी, बल्कि अपनी ही शहर की एक 44 साल पुरानी मस्जिद को ढहाने का सरकारी इंतज़ाम था। लगता है, प्रशासन की नज़र में सुकून तभी आता है, जब ज़ुबान और आवाज़, दोनों पर ताला लगा दिया जाए।
मालवीय नगर की जिस नूरानी मस्जिद को आज निष्ठुरता से 70% तक मिटा दिया गया, वह चार दशकों से अधिक समय से अपनी जगह पर खड़ी थी। यह कौन सी रातों-रात उगी हुई इमारत थी, जो इतनी सदियों तक सरकारी कागज़ों से ‘गुमशुदा’ रही और अब अचानक ‘अतिक्रमण’ के नाम पर निशाने पर आ गई? यह सवाल किसी एक मस्जिद का नहीं, बल्कि सरकारी ‘नज़र’ की उस चुनिंदा रोशनी का है, जो ज़रूरत पड़ने पर ही जगती है।
अगर यह महज़ अतिक्रमण हटाने की कवायद थी, तो फिर 3000 से अधिक पुलिसकर्मियों की फौज और इंटरनेट बंद करने की आपातकालीन घोषणा क्यों? क्या हमारी प्रशासन मशीनरी को इतने बड़े संसाधनों की ज़रूरत एक पुरानी इमारत को ज़मीन पर लाने के लिए पड़ती है? या फिर यह सिर्फ़ एक चेतावनी है, उन सभी के लिए, जो कभी भी ‘अतिक्रमण’ की परिभाषा में फिट हो सकते हैं?
जयपुर की सड़कों पर गड्डों का साम्राज्य, बिजली-पानी की किल्लत और दफ्तरों में धूल फाँकती फाइलें बरसों से अपनी ‘अतिक्रमण’ की गाथा कह रही हैं। लेकिन वहाँ कोई बुलडोजर नहीं जाता, न ही इंटरनेट बंद होता है। प्रशासनिक फुर्ती का यह प्रदर्शन, जिसे अचानक एक धार्मिक स्थल को ढहाने के लिए दिखाया गया, उस खोखलेपन को उजागर करता है, जहाँ प्राथमिकताएं जनहित की बजाय किसी और ही ‘हित’ से तय होती हैं।
यह कैसी आधुनिकता है, जहाँ विकास के नाम पर इतिहास को मलबे में तब्दील किया जाता है? और किस ‘व्यवस्था’ की बात हम करते हैं, जहाँ एक तरफ नागरिकों से पारदर्शिता की उम्मीद की जाती है और दूसरी तरफ उनके संवाद के सबसे तेज़ माध्यम को ही छीन लिया जाता है? यह ‘हाई अलर्ट’ शहर के लिए नहीं, बल्कि उस असहमति के लिए था, जो शायद सोशल मीडिया पर फूट सकती थी।
गुलाबी नगर अपनी वास्तुकला और गंगा-जमुनी तहज़ीब के लिए जाना जाता है। लेकिन आज जिस तरह एक धार्मिक स्थल को निशाना बनाया गया, वह इस तहज़ीब पर एक गहरा दाग है। क्या अब शहर की पहचान सिर्फ़ उसकी दीवारों से होगी, जो बुलडोजर से तय होंगी, न कि उसकी विरासत और सह-अस्तित्व की कहानियों से?
जब बुलडोजर का शोर शांत हो जाएगा, और इंटरनेट की तारें फिर से जुड़ेंगी, तब क्या शहर वाकई ‘शांत’ हो पाएगा? या यह कार्रवाई अपने पीछे डर और अविश्वास की एक ऐसी छाया छोड़ गई है, जो आने वाले कई सालों तक गुलाबी नगर के आसमान पर मंडराती रहेगी? यह सवाल आज हर उस खामोश आवाज़ में गूंज रहा है, जिसे आज बंद कर दिया गया।