जयपुर संपादकीय — 9 June 2026
बुलडोज़र की गर्जना में ढहते जयपुर के पुराने निशान
संपादक की राय
जयपुर, जिसे हम कभी गुलाबी नगरी कहते थे, आज बुलडोज़र की गर्जना से थर्रा रहा है। विकास की ऐसी कौन सी अदम्य भूख है जो रातों-रात शहर के दशकों पुराने चिन्हों को निगल जाती है? जब धूल का गुबार छँटता है, तो पीछे सिर्फ़ इमारतों का मलबा नहीं, बल्कि सह-अस्तित्व की धुंधली तस्वीरें और ढहते भरोसे की इमारतें खड़ी दिखती हैं।
सवाल सड़क चौड़ीकरण का नहीं, सवाल यह है कि यह ‘विकास’ अचानक इतना उतावला क्यों हो गया? वह ‘नोरानी मस्जिद’ जो पैंतालीस साल तक शहर की पहचान का हिस्सा रही, आज अचानक ‘अतिक्रमण’ कैसे बन गई? इन चार दशकों में हमारी नगर योजनाएँ और प्रशासन कहाँ सोया हुआ था, जब यह ‘अवैध’ ढाँचा आकार ले रहा था? या यह केवल अब किसी के लिए ‘असुविधाजनक’ हो गया है?
यह हास्यास्पद है कि जिस देश में ‘स्मार्ट सिटी’ और ‘डिजिटल इंडिया’ का नारा गूँजता है, वहाँ एक शहर को पलक झपकते ही ‘अंधकार’ में धकेल दिया जाता है। इंटरनेट बंद। क्यों? ‘अफ़वाहों’ को रोकने के लिए? या प्रशासन की कार्रवाई पर उठने वाले सवालों और असहज तस्वीरों को दुनिया तक पहुँचने से रोकने के लिए? क्या हमारी कानून-व्यवस्था इतनी कमज़ोर है कि उसे कायम रखने के लिए संचार की रीढ़ ही तोड़नी पड़ती है?
बुलडोज़र अब सिर्फ़ ज़मीन पर नहीं, बल्कि समाज के मानस पर भी निशान छोड़ रहे हैं। यह मशीन अब सिर्फ़ एक औज़ार नहीं, बल्कि एक सत्ता का प्रतीक बन चुकी है, जो दिखाती है कि ‘विकास’ के नाम पर कुछ भी ढहाया जा सकता है – चाहे वह मंदिर हो या मस्जिद, या नागरिकों का बुनियादी अधिकार। यह किसकी प्राथमिकता है, कौन तय कर रहा है कि कौन सा ढाँचा ‘सही’ है और कौन सा ‘गलत’?
जो लोग इस शहर को अपना घर मानते हैं, उनका अपराध क्या है? सिर्फ़ इतना कि वे यहाँ रहते हैं, जहाँ सत्ता का खेल अब सड़कों पर बुलडोज़र के पहियों से खेला जा रहा है। उनकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी, उनके व्यापार, उनके बच्चों की पढ़ाई – सब एक झटके में रोक दी जाती है। लोकतंत्र में आवाज़ दबाने का इससे ‘सरल’ और ‘प्रभावशाली’ तरीक़ा भला और क्या हो सकता है?
गुलाबी शहर की दीवारें अब सिर्फ़ रंगीन नहीं हैं, उन पर ढहाए गए इमारतों की काली परछाई भी है। ‘विकास’ की इस दौड़ में, हम एक शहर का इतिहास, उसकी विविधता, और सबसे बढ़कर, नागरिकों का प्रशासन पर भरोसा खो रहे हैं। जब सड़कें चौड़ी हो जाएंगी, तब क्या हम खुली हवा में साँस ले पाएँगे, या हमारे सीने में एक अनकही घुटन हमेशा रहेगी?