जयपुर संपादकीय

अवैध बारूद के ढेर में जलकर राख हुईं जिंदगियाँ

संपादक की राय

गुलाबी नगर में आज एक बार फिर इंसानी माँस की गंध हवा में घुली है। वह नहीं, जो कभी होली या दीपावली के पटाखों की धुएँ से आती थी, बल्कि वह चीख जो अनधिकृत बारूद के ढेर पर जलकर राख हुई जिंदगियों से उठी है। जयपुर की सड़कों पर धूल के गुबार भले ही आम हों, लेकिन यहाँ के घरों में अब भी अपनों की राख का गुबार उठ रहा है, जो शायद कभी नहीं बैठेगा।

जिस ‘अवैध’ पटाखा गोदाम ने सात जिंदगियों को पलक झपकते ही भस्म कर दिया, वह कोई रातोंरात उग आया मशरूम नहीं था। शहर के बीचों-बीच, प्रशासन की नाक के नीचे सालों से यह मौत का कारखाना धड़ल्ले से चल रहा था। क्या यह मान लिया जाए कि हमारे निगरानी तंत्र की आँखें सिर्फ सरकारी फ़ाइलों पर ही टिकती हैं, या फिर वे ऐसी “अवैध” कमाई की चमक से स्थायी रूप से चकाचौंध हो चुकी हैं?

फिरोज का नाम अब हर जुबान पर है, लेकिन यह नाम नया नहीं है। खबर है कि दिल्ली में भी उसके अवैध कारखानों पर छापे पड़े थे, जिसके बाद वह वहाँ से भाग निकला। क्या जयपुर उसके लिए एक सुरक्षित पनाहगाह बन गया था, जहाँ कानून की पकड़ ढीली और प्रशासनिक आँखें बंद रहती हैं? यह सिर्फ एक व्यक्ति की मनमानी नहीं, बल्कि उस समूची व्यवस्था की विफलता है जो ऐसे परजीवियों को एक शहर से दूसरे शहर तक फलने-फूलने का मौका देती है।

“मेरा बेटा तो बस पानी लेने गया था…” यह उस माँ का रुदन है, जिसने अपने कलेजे के टुकड़े को चंद रुपयों के लालच और सिस्टम की लापरवाही की भेंट चढ़ते देखा। उन सात जिंदगियों में से हर एक की अपनी कहानी थी, अपने सपने थे। लेकिन उन सबका अंत एक ही था – राख और धुआँ। क्या इन जिंदगियों की कीमत सिर्फ कुछ मुआवजा और अस्थायी गिरफ्तारी तक सीमित है?

अब पुलिस फिरोज की तलाश में खाक छान रही है, मानो वह कोई अलौकिक शक्ति हो जो हवा में विलीन हो गई। यह कैसी अदालती प्रक्रिया है जो पहले जुर्म होने का इंतजार करती है, फिर अपराधी के भागने का, और अंत में उसे ढूंढने का ढोंग रचती है? क्या यह खोज सिर्फ एक चेहरा पकड़ने की है, या उस समूचे तंत्र को बेनकाब करने की जिसमें ऐसे अवैध कारोबार पनपते हैं?

हर बार ऐसी कोई भीषण आग लगती है, शहर कुछ दिन सुलगता है, नेता कड़े बयान देते हैं, अफ़सर जाँच का आश्वासन देते हैं, और फिर सब ठंडा पड़ जाता है। इस बार भी वही कहानी दोहराई जाएगी। यह आग सिर्फ उस गोदाम में नहीं लगी थी, यह तो हमारी सामूहिक चेतना और प्रशासन के झूठे दावों में लगी आग है, जो बार-बार जलकर भी सबक नहीं लेती।

एक ओर शहर में आलीशान रिसॉर्ट्स के उद्घाटन हो रहे हैं, महँगे कालीन की प्रदर्शनियाँ लग रही हैं, जयपुर को ‘साफ़-सुथरा’ और ‘मॉडल सिटी’ का तमगा दिया जा रहा है। और दूसरी ओर, इसी शहर की अंधेरी गलियों में बारूद के ढेर पर गरीब जिंदगियाँ जलकर खाक हो रही हैं। यह कैसा विरोधाभास है, कैसी विडंबना? क्या हमारी तरक्की की परिभाषा सिर्फ संगमरमर की इमारतों तक सिमट गई है?

कितनी और जिंदगियाँ चाहिए, इस ‘गुलाबी’ शहर के काले सच को सामने लाने के लिए? कितने और परिवारों को बेघर होना पड़ेगा, ताकि हमारी सोई हुई व्यवस्था की नींद टूटे? या फिर यह मान लिया जाए कि यह शहर सिर्फ पर्यटकों के लिए गुलाबी है, और यहाँ के नागरिकों के लिए इसकी सच्चाई राख और धुएँ से ढकी हुई है?