जयपुर संपादकीय — 11 June 2026
तेल पाइपलाइन से 700 मीटर दूर अवैध पटाखा फ़ैक्टरी
संपादक की राय
गुलाबी नगर! जहाँ हर गली, हर नुक्कड़ पर इतिहास की गूँज सुनाई देती है, वहाँ अब बारूद की फुसफुसाहट ने अपनी जगह बना ली है। एक ऐसा शहर, जहाँ शान-ओ-शौकत के मीनार आसमान छू रहे हैं, वहीं ज़मींदोज़ बस्तियों में मौत का सामान सरेआम तैयार हो रहा है। ख़बर है कि जिस अवैध पटाखा फ़ैक्टरी पर कभी किसी की निगाह नहीं पड़ी, वह अब तेल की पाइपलाइन से महज़ 700 मीटर की दूरी पर मौत का इंतज़ार कर रही है। क्या खूब मंजर है! एक तरफ़ समृद्धि का नशा, दूसरी तरफ़ बारूद का ढेर।
यह केवल एक फ़ैक्टरी का मामला नहीं है। यह तो एक पूरी की पूरी बस्ती का हाल है, जहाँ के साठ प्रतिशत घरों में बारूद का काम होता है। ज़रा सोचिए, जिन घरों में बच्चे खेलते हैं, जहाँ दाल-रोटी बनती है, वहीं मौत का सामान पैकेटों में बंद हो रहा है। और यह सब उस शहर में हो रहा है, जिसकी शान में कसीदे पढ़े जाते हैं, जहाँ की पुलिस चुस्त और प्रशासन दुरुस्त होने के दावे करता है। या शायद यही इनकी ‘दुरुस्ती’ की नई परिभाषा है?
जब शहरों को “स्मार्ट” बनाने के नारे गूँजते हैं, तब हम भूल जाते हैं कि बुनियादी सुरक्षा के मायने क्या होते हैं। पानी पर बसी कॉलोनियाँ, बारूद से भरे घर, और उनके ठीक नीचे से गुज़रती तेल की जीवनरेखा। यह विकास का कैसा मॉडल है, जहाँ नींव में ही तबाही का इंतज़ाम कर लिया गया है? या फिर यह मान लिया गया है कि ऊपर वाले की कृपा से सब ठीक रहेगा, क्योंकि स्थानीय प्रशासन की कृपा तो हर कदम पर बरस ही रही है।
निश्चित रूप से, यह एक रात में खड़ा हुआ साम्राज्य नहीं है। यह बरसों की अनदेखी, मिलीभगत और शायद कुछ अदृश्य लेनदेन का नतीजा है, जिसने इस पूरे इलाक़े को एक जलते हुए माचिस की डिब्बी में बदल दिया है। उन अफ़सरों की आँखों पर कौन सी पट्टी बंधी थी, जो इस खतरे को देख नहीं पाए? या उनकी जेबें इतनी गरम थीं कि आँखों की रोशनी का कोई काम ही नहीं बचा था?
क्या यह ‘जहाँ झुग्गी, वहीं मकान’ का एक नया संस्करण है – ‘जहाँ घर, वहीं बम’? यह उन लाखों लोगों की मजबूरी भी है, जिन्हें दो वक़्त की रोटी कमाने के लिए अपनी जान दांव पर लगानी पड़ती है। लेकिन उनकी जान पर मंडराते इस खतरे का ज़िम्मेदार कौन है? वह व्यवस्था, जो उन्हें कोई विकल्प नहीं देती, या वह व्यवस्था, जो इस अवैध धंधे को फलने-फूलने देती है?
जब आग लगेगी, तब जाँच बैठेगी। कुछ हेड कांस्टेबल से लेकर थानेदार तक निलंबित किए जाएँगे। बयान जारी होंगे, संवेदनाएँ व्यक्त की जाएँगी। फिर कुछ दिनों बाद, धूल बैठ जाएगी और सब कुछ पहले जैसा हो जाएगा। क्या यह तय नहीं है कि गुलाबी शहर की मिट्टी में बारूद की गंध, और भी गहरी होती चली जाएगी?
तो फिर, किस बात का इंतज़ार है? एक और त्रासदी का, जिसे बाद में ‘दुर्घटना’ का नाम दे दिया जाएगा? या हम तब तक आँखें मूंदे रहेंगे, जब तक यह पूरा शहर ही बारूद के एक बेकाबू ढेर में तब्दील नहीं हो जाता? जयपुर की यह खामोश, विस्फोटक सच्चाई, एक असहज सवाल बन कर हवा में तैर रही है, जिसका जवाब शायद किसी के पास नहीं।