जयपुर संपादकीय

मामूली तोड़फोड़ पर शहर में ‘हाई अलर्ट’ का तमाशा

संपादक की राय

जयपुर, गुलाबी नगर, आज गुलाबी नहीं, बल्कि किसी युद्धभूमि का रंग लिए हुए है। सड़कें छावनियों सी लगती हैं, और हवा में तनाव की गंध है। पर दुश्मन कहाँ है? कोई बाहरी आक्रांता नहीं, बल्कि शहर का अपना ‘विकास’, अपनी ‘व्यवस्था’। हद है! मामूली तोड़फोड़ की कार्रवाई को “हाई अलर्ट” का जामा पहना दिया गया है, मानो कोई परमाणु हमला टलना हो।

और यह सारा तांडव किसके लिए? “धार्मिक ढाँचों” के इर्द-गिर्द पनपी ‘अतिक्रमण’ की कथित समस्या के समाधान के लिए। यह शब्दजाल भी कितना अजीब है। ‘धार्मिक’ शब्द सुनते ही प्रशासन के कान खड़े हो जाते हैं, और फिर सुरक्षा का ऐसा चक्रव्यूह रचा जाता है कि लगता है ये इमारतें नहीं, बल्कि सीधे आस्था के किले ढहाए जा रहे हैं।

सबसे दिलचस्प तो यह है कि इस ‘पुनीत कार्य’ को अंजाम देने से पहले, शहर के एक बड़े हिस्से में इंटरनेट बंद कर दिया गया। वाह! सूचना का अधिकार अब सिर्फ़ तभी तक है जब तक प्रशासन को इसकी ज़रूरत न पड़े। यह कैसा लोकतंत्र है जहाँ आवाज़ उठने से पहले ही गला घोंट दिया जाता है, जहाँ तस्वीरें खींचने से पहले ही आँखें बंद कर दी जाती हैं?

पुलिस का ‘अधिग्रहण’ और ‘निगरानी’ भी देखने लायक थी। वर्दीधारी जवानों की तैनाती ऐसी थी जैसे कोई आतंकवादी संगठन घेरा गया हो, न कि वे आम नागरिक जिनके छोटे-मोटे ठिये या दुकान-ओटले तोड़ने हों। ये कैसी ‘व्यवस्था’ है जो अपने ही लोगों से डरती है, या उन्हें डराती है, ताकि उसका ‘फ़र्ज़’ बिना किसी व्यवधान के पूरा हो सके?

गुलाबी नगर की दोहरी ज़िंदगी का इससे बेहतर प्रमाण क्या होगा? एक तरफ़ पर्यटन के चमचमाते पोस्टर और ‘वर्ल्ड क्लास’ सुविधाओं के दावे, दूसरी तरफ़, अपने ही शहर के नागरिकों पर इंटरनेट का प्रतिबंध और पुलिसिया डंडा। यह कैसी प्रगति है जहाँ ईंट-पत्थरों से ज़्यादा ज़रूरी लोगों के संवाद पर नियंत्रण हो?

‘अतिक्रमण हटाओ’ अभियान, यह एक ऐसा चिरपरिचित नारा है जो हर सरकार की डायरी में सबसे ऊपर लिखा रहता है। लेकिन यह अतिक्रमण किसका? उन मजबूरों का जो पेट भरने के लिए कहीं भी जगह बना लेते हैं, या उस व्यवस्था का जो आँखें मूँदकर उन्हें पनपने देती है और फिर एक दिन बलपूर्वक उखाड़ फेंकती है? सवाल यह नहीं कि अतिक्रमण हटाना ग़लत है, सवाल यह है कि इसकी कीमत कितनी और कौन चुकाता है।

आज जयपुर ने फिर देख लिया कि जब सत्ता अपनी धुन में होती है, तो उसके लिए जन-जीवन की सामान्य गति या अभिव्यक्ति की आज़ादी के मायने क्या होते हैं। इंटरनेट बंद हुआ, दुकानें बंद हुईं, दिल सहम गए। और फिर जब सब शांत होगा, तो क्या शहर सचमुच “साफ” हो जाएगा, या सिर्फ़ एक और कड़वी याद जुड़ जाएगी – उस दिन की, जब गुलाबी शहर ने अपनी असली रंगत खो दी थी?