जयपुर संपादकीय — 13 June 2026
अतिक्रमण हटाने के नाम पर ठप की गई इंटरनेट सेवा
संपादक की राय
जयपुर! गुलाबी नगर! वो शहर जहाँ हर सुबह गुलाबी सपनों से नहीं, बल्कि एक नए सरकारी फ़रमान से होती है। आज सुना है, हमारे शहर की संचार धमनियों को ही रोक दिया गया। क्यों? क्योंकि कुछ अतिक्रमण हटाने थे, और प्रशासन को लगा कि शायद हमारी उंगलियाँ सोशल मीडिया पर ‘अतिक्रमण हटाओ’ के लाइव अपडेट्स डालने लगेंगी, जिससे उनकी ‘व्यवस्था’ बिगड़ जाएगी। क्या हमारा प्रशासन वाकई इतना कमज़ोर है कि बिना इंटरनेट के उसकी जेसीबी मशीनें अपना काम नहीं कर पातीं, या यह हमारी आज़ादी पर एक और ‘डिजिटल’ कुल्हाड़ी है?
अतिक्रमण एक समस्या है, कोई दो राय नहीं। लेकिन क्या उस समस्या का समाधान यह है कि हम पूरे शहर के लाखों लोगों को डिजिटल युग से काटकर पाषाण काल में धकेल दें? जिन लोगों को ऑनलाइन भुगतान करना था, जिनकी आपातकालीन ज़रूरतें थीं, जिनके बच्चे ऑनलाइन पढ़ाई करते हैं या जिनकी रोज़ी-रोटी ही इंटरनेट से चलती है, वे सब बस एक झटके में ‘साइड इफ़ेक्ट’ बन गए। वाह रे आधुनिक प्रशासन! आपकी सुविधा के लिए हम अपनी असुविधा पर तालियाँ बजाएँ?
यह उस देश की राजधानी का एक बड़ा शहर है, जो डिजिटल इंडिया का ढोल पीटता नहीं थकता। यहाँ एक तरफ़ सरकारें ‘स्मार्ट सिटी’ का सपना बेचती हैं, वहीं दूसरी तरफ़, ज़रा सा प्रशासनिक काम निकालने के लिए पूरे ज़िले को ‘साइलेंट ज़ोन’ घोषित कर दिया जाता है। क्या यही हमारी ‘डिजिटल’ प्रगति का असली चेहरा है? एक ऐसा मुखौटा, जिसके पीछे एक सत्तावादी मानसिकता छिपी है, जिसे नागरिकों की सहूलियत से ज़्यादा अपनी मनमानी प्यारी है?
यह कोई पहली बार नहीं है। जब भी व्यवस्था को ज़रा भी भय होता है कि नागरिक शायद आवाज़ उठा सकते हैं, या ख़बर बाहर जा सकती है, तो सबसे पहले इंटरनेट की बलि दी जाती है। यह एक ऐसी आदत बन चुकी है, जैसे पुलिस किसी चोर को पकड़ने के लिए नहीं, बल्कि अपनी नाकामियों को छिपाने के लिए पूरे बाज़ार की लाइटें गुल कर दे। क्या हमें यह मान लेना चाहिए कि हमारे अधिकारी इतने अक्षम हैं कि वे बिना सेंसरशिप के एक सामान्य अतिक्रमण अभियान भी नहीं चला सकते?
और हम? हम जयपुर के नागरिक! क्या हम बस सिर झुकाकर यह सब स्वीकार कर लेंगे? क्या हम इतने ‘सहयोगी’ हो गए हैं कि अपनी मूलभूत ज़रूरतों और अधिकारों पर इस तरह की पाबंदी को ‘व्यवस्था बनाए रखने’ के नाम पर चुपचाप सह लें? हमारी चुप्पी शायद उन्हें और बल देती है, यह सोचने के लिए कि “जब तक लोग बोलते नहीं, तब तक सब ठीक है।”
यह सिर्फ़ अतिक्रमण या इंटरनेट बंद करने का मामला नहीं है। यह एक गहरी बीमारी का लक्षण है। यह दिखाता है कि सत्ता के गलियारों में बैठे लोग नागरिकों को केवल एक ‘जनसंख्या’ मानते हैं, जिससे ज़रूरत पड़ने पर कोई भी सुविधा छीनी जा सकती है। जब आप नागरिकों से उनका संचार का अधिकार छीनते हैं, तो आप उन्हें अपनी बात कहने और अपनी असहमति व्यक्त करने के अधिकार से भी वंचित करते हैं। यह एक लोकतांत्रिक समाज के लिए शुभ संकेत नहीं।
गुलाबी शहर की यह दोहरी ज़िंदगी कितनी अजीब है। एक तरफ़ भव्य विरासत, पर्यटन और चमक-धमक की बातें, तो दूसरी तरफ़ अपने ही नागरिकों के प्रति यह अविश्वास और नियंत्रण की ज़िद। क्या हमने वाकई यह मान लिया है कि ‘अच्छी सरकार’ का मतलब यह है कि वह हमारी सुविधा के लिए हमारे मौलिक अधिकारों का गला घोंट दे, और हम उफ़ तक न करें?
अगली बार जब कोई सरकारी घोषणा या अभियान हो, तो क्या हम यह मानकर चलें कि हमारे फोन बस ‘पत्थर’ बनकर रह जाएंगे? क्या एक दिन ऐसा भी आएगा, जब सरकार यह तय करेगी कि हमें क्या सोचना है और क्या बोलना है, और इसे लागू करने के लिए वह हमारी सभी संचार कड़ियों को काट देगी? यह सवाल सिर्फ़ आज के इंटरनेट बंद होने का नहीं, बल्कि हमारे आने वाले कल की तस्वीर का है।