जयपुर संपादकीय

मंत्री की महफ़िल में बत्ती गुल, दो अफ़सर निलंबित

संपादक की राय

गुलाबी नगर की बिजली गुल हो जाए, तो कोई बड़ी बात नहीं। ये तो यहाँ का रोजमर्रा का किस्सा है, जहाँ आम आदमी अँधेरे में जीने का आदी है। लेकिन बात तब ‘खास’ बन जाती है, जब अँधेरा किसी ‘खास’ की महफ़िल में छा जाए। रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव की प्रेस कॉन्फ्रेंस में पल भर को बत्ती गुल हुई, और पलक झपकते ही दो अफ़सर निलंबित कर दिए गए। गज़ब की चुस्ती! जिस व्यवस्था को आम नागरिक की शिकायत पर एक कागज़ हिलाने में सदियाँ लग जाती हैं, वह अपने आकाओं के एक मिनट के असमय अँधेरे पर ऐसी फुर्ती से तलवार चलाती है कि आँखों पर यकीन ही नहीं आता।

ये निलंबन क्या महज़ बिजली विभाग की लापरवाही का नतीजा है? या उस अदृश्य दरबारी संस्कृति का प्रमाण, जहाँ राजा के छींकने पर पूरा दरबार हिल जाता है? ज़रा सोचिए, जयपुर के किसी आम चौराहे पर, किसी आम घर में, अस्पताल में, या स्कूल में घंटों बिजली गुल रहती है। उस पर कितने अफ़सर निलंबित होते हैं? कितने ही छात्रों की पढ़ाई अँधेरे में घुल जाती है, कितने ही मरीज़ों को असुविधा झेलनी पड़ती है, लेकिन कोई ‘तत्काल कार्रवाई’ नहीं होती। उनकी असुविधा, उनकी पीड़ा, शायद मंत्री जी की प्रेस कॉन्फ्रेंस की लाइटिंग से कम महत्वपूर्ण है।

यह घटना सिर्फ़ एक बिजली गुल होने या दो अफ़सरों के निलंबन की नहीं है। यह हमारे तंत्र की उस गहरी बीमारी का एक्स-रे है, जहाँ प्राथमिकताएँ सीधी नहीं, बल्कि ऊपर से नीचे की ओर झुकती हैं। जहाँ ‘जनता का सेवक’ दरअसल ‘सत्ता का सेवक’ बन चुका है। मंत्री जी को शायद इस बात का इल्म भी न हो कि उनकी ‘असुविधा’ पर जो ‘कार्रवाई’ हुई है, वह लाखों-करोड़ों आम नागरिकों के मन में सिस्टम के प्रति और गहरी खाई खोद रही है।

क्या यह एक अघोषित संदेश है? कि अपनी कुर्सी बचाने के लिए, अपने आलाकमान को खुश रखने के लिए, ‘व्यवस्था’ किसी भी हद तक जा सकती है। भले ही उसमें निर्दोष प्यादों को बलि का बकरा बनाना पड़े। यह भय की वह संस्कृति है, जहाँ नीचे बैठा कर्मचारी जानता है कि उसकी नौकरी का दांव पर लगना, ऊपर बैठे साहब के मूड पर निर्भर करता है, जनता की सेवा पर नहीं।

हमारा यह गुलाबी शहर, जो बाहर से जितना भव्य और शाही दिखता है, भीतर से उतना ही खोखला और असमानता से भरा है। यहाँ बड़े-बड़े रिसॉर्ट खुलते हैं (जैसा कि ख़बरें बताती हैं), लेकिन आम आदमी के घर में अँधेरा होता है, तो उसे अपनी शिकायत रजिस्टर करवाने के लिए भी लंबा संघर्ष करना पड़ता है। मंत्री के कार्यक्रम में अँधेरा होने पर तत्काल कार्रवाई, और आम जनता के लिए ‘लिखित में शिकायत दें’ का ठंडा जवाब।

यह व्यंग्य नहीं, यह यथार्थ है। एक ऐसा यथार्थ जहाँ देश की संपत्ति और सत्ता का उपभोग करने वाले कुछ लोग, अपने तात्कालिक लाभ या छवि के लिए, समूची प्रणाली को अपनी उंगलियों पर नचाते हैं। यह घटना बताती है कि हमारे लिए असल समस्या बिजली का जाना नहीं, बल्कि सत्ताधीशों का अहंकार और आम आदमी की अनदेखी है। असली अँधेरा तो हमारी सोच में है।

क्या कभी किसी सरकार ने उस ऊर्जा और तीव्रता से आम लोगों की मूलभूत समस्याओं पर कार्रवाई की है, जिस तेजी से उसने एक मंत्री के सामने बत्ती गुल होने पर अफ़सरों को सस्पेंड किया? सवाल यह नहीं कि अफ़सरों को निलंबित किया गया, सवाल यह है कि इस निलंबन के पीछे की मंशा क्या है — जवाबदेही या चापलूसी? और क्या यह सचमुच न्याय है, या सिर्फ़ उस खोखली व्यवस्था का एक और तमाशा?