जयपुर संपादकीय — 15 June 2026
सड़कों पर उतरी ‘कॉकरोच जनता पार्टी’, उठे सवाल
संपादक की राय
आज गुलाबी नगर में ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ का जलसा है। ‘कॉकरोच’! यह नाम किसने रखा? विरोध करने वालों ने खुद को यह नाम दिया, या व्यवस्था की नज़र में वे बस इतने ही थे? जयपुर, जो अपनी भव्यता और मेहमाननवाजी के लिए जाना जाता है, उसकी सड़कों पर जब ‘तिलचट्टे’ इकट्ठा होते हैं, तो यह सवाल चुभता है कि आखिर इस चमक-दमक के पीछे कैसी हकीकत पल रही है।
विरोध की इस ‘अनुमति’ के पीछे की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं। पहले पुलिस ने इनकार किया, फिर कुछ शर्तों के साथ ‘अनुग्रह’ कर दिया। यह कैसा लोकतंत्र है, जहाँ अपनी बात रखने का अधिकार भी भीख की तरह माँगा जाता है, और फिर डंडे के साथ शर्तनामा भी थमा दिया जाता है? यह दिखाता है कि सत्ता के गलियारों में ‘अधिकार’ नहीं, ‘प्रशासनिक सुविधा’ ही सर्वोपरि है।
और उन शर्तों में एक नगीना है: “भारतीय संस्कृति का ध्यान रखें।” वाह! प्रदर्शनकारियों को यह हिदायत क्यों? क्या अपनी पीड़ा व्यक्त करना, अपनी माँगें उठाना हमारी संस्कृति के खिलाफ है? या फिर ‘संस्कृति’ यहाँ सिर्फ एक सुविधाजनक लबादा है, जिसके पीछे असंतोष की आवाज़ को चुप कराया जा सके? शायद मौन रहकर पीड़ा सहना ही आज की ‘भारतीय संस्कृति’ का नया अध्याय है।
शहर की चिंता क्या है? मीडिया के एक बड़े हिस्से और प्रशासन के लिए सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस प्रदर्शन से ट्रैफिक जाम होगा या नहीं। लोगों की समस्याएँ, उनकी चीखें, उनके मुद्दे एक तरफ; और चौराहों पर लगने वाला जाम दूसरी तरफ। लगता है, इस महानगरी में जनहित की परिभाषा सिर्फ सड़क पर गाड़ियों के सुचारु आवागमन तक सीमित होकर रह गई है। बाकी सब तो बस ‘डाइवर्जन’ है।
जयपुर का यह दोहरापन अक्सर ही परेशान करता है। एक तरफ शाही विरासत, विश्वस्तरीय पर्यटन, जगमगाते होटल और आईपीएल के टिकटों के लिए उमड़ती भीड़। दूसरी तरफ वे ‘कॉकरोच’, जो आज अपनी पहचान, अपनी बात के लिए संघर्ष कर रहे हैं। शायद शहर की असली आत्मा इन भव्य इमारतों में नहीं, बल्कि उन गटरों और अंधेरी गलियों में है, जहाँ से ये ‘तिलचट्टे’ अपना रास्ता बनाते हैं।
सोनम वांगचुक जैसे बड़े नाम के जुड़ने से शायद इस प्रदर्शन को थोड़ी हवा मिल जाए, पर सवाल तो वही खड़ा है। जब विरोध भी इतना नियोजित, नियंत्रित और ‘कैप’ में बाँध दिया जाए – सिर्फ 800 लोग! – तो क्या वह सच में विरोध रहता है, या बस एक सरकारी परमिशन वाला इवेंट बन जाता है? यह लोकतंत्र के नाम पर एक दिखावा मात्र है, जहाँ असहमति को भी सलीके से पेश करने को कहा जाता है।
कौन सी समस्या इतनी बड़ी है कि लोगों को ‘तिलचट्टे’ का तमगा ओढ़ना पड़े? यह सवाल उन सभी गुलाबी कोनों से उठना चाहिए जो आज भी इस शहर को सिर्फ तस्वीरों में देखते हैं। जब तक व्यवस्था इन ‘कॉकरोचों’ की ज़मीनी हकीकत को नहीं समझेगी, तब तक ये बस रेंगते रहेंगे, और हम ‘भारतीय संस्कृति’ का पाठ पढ़ाते रहेंगे। क्या शहर इस रेंगती हकीकत से मुँह मोड़ कर चैन से सो पाएगा?