जयपुर संपादकीय

असहमति की आवाज़ का स्वागत थप्पड़ से

संपादक की राय

गुलाबी नगर में अब गाल पर गुलाबी निशान भी आम बात हो गई है, जब कोई ‘कॉकराच जनता पार्टी’ जैसा बेतुका नाम लेकर भी अपनी बात कहने की जुर्रत करे। जयपुर, जो अपनी मेहमाननवाज़ी के लिए जाना जाता था, आज वहाँ विरोध का हर स्वर पहले एक थप्पड़ से ही स्वागत पाता है। यह कैसी रीत है कि लोकतंत्र में असहमत होने का अधिकार केवल एक मुखौटा बनकर रह गया है, जिसके पीछे किसी भी क्षण हिंसा की काली छाया खड़ी मिल सकती है?

शहर की ये चमकती गलियां और भव्य विरासतें एक परदे से ज़्यादा कुछ नहीं, जिसके पीछे हर रोज़ सहिष्णुता के नाम पर असहिष्णुता का नंगा नाच होता है। हमें बताया जाता है कि हम महान परंपराओं के वाहक हैं, लेकिन जब कोई अपनी छोटी सी आवाज़ उठाने की हिम्मत करता है, तो उसे तत्काल शारीरिक रूप से ‘सही’ करने का प्रयास किया जाता है। क्या ये वही ‘अतिथि देवो भव’ की संस्कृति है, जहाँ अतिथि को ‘मारो’ कहकर विदा किया जाता है?

‘कॉकराच जनता पार्टी’ के संस्थापक अभिजीत दिपके का दावा है कि उन पर हमला करने वाले लोग “आरएसएस से जुड़े” थे। यह आरोप सिर्फ़ एक व्यक्ति या एक संगठन पर नहीं है, यह उस पूरे तंत्र पर है जो देश में असहमति के लिए जगह सिकोड़ता जा रहा है। ये वो परछाइयाँ हैं जो हर विरोध प्रदर्शन के पीछे मंडराती हैं, यह जानते हुए कि उनके नाम पर होने वाली हर हरकत को चुपचाप ‘देश हित’ का जामा पहना दिया जाएगा।

पुलिस ने छह लोगों को हिरासत में लिया है। यह कार्रवाई क्या वाकई न्याय की राह में उठाया गया कदम है, या सिर्फ़ जनता की आंखों में धूल झोंकने का एक और सरकारी नुस्खा? जब आरोप इतने गंभीर हों और हमला करने वाले कथित तौर पर किसी प्रभावशाली संगठन से जुड़े हों, तब ये हिरासतें केवल एक तात्कालिक मरहम बनकर रह जाती हैं। असली घाव तो कहीं गहरा होता है, जो लोकतंत्र के शरीर को धीरे-धीरे खोखला करता है।

दिपके का कहना है कि वे इन हमलों से “डरे नहीं” हैं और यह उनके लिए “कुछ नया नहीं” है। यह बयान केवल एक व्यक्तिगत बहादुरी का प्रदर्शन नहीं, बल्कि इस देश की कड़वी सच्चाई का प्रतिबिंब है। यह सामान्यीकरण है हिंसा का, जहाँ विरोध करना अब एक जोखिमभरा पेशा बन गया है। जब कोई नागरिक यह कहने लगे कि उस पर हमला होना ‘नया नहीं’, तो इसका अर्थ है कि राज्य अपने नागरिकों की सुरक्षा के बुनियादी कर्तव्य में विफल हो गया है।

जयपुर में पीटे जाने के बाद, दिपके अब नागपुर में ‘प्रधान-विरोधी प्रदर्शन’ के लिए रवाना हो गए। यह एक विडंबना ही है कि एक शहर में अपनी बात कहने के लिए मार खाने के बाद, उन्हें दूसरे शहर में उसी बात को दोहराने जाना पड़ रहा है। क्या अब विरोध प्रदर्शन एक खानाबदोश गतिविधि बन गया है, जो एक शहर से दूसरे शहर भागता रहेगा, उम्मीद में कि कहीं तो उसे बिना चोट खाए अपनी बात रखने का मौका मिलेगा?

क्या जयपुर की ये हवेलियाँ, ये बाज़ार, ये लोग अब बस दर्शक बनकर रह गए हैं? क्या हमारी संवेदनाएँ इतनी सुन्न हो गई हैं कि ‘जनता’ पर हमला भी अब सामान्य खबर बनकर रह गया है? ये सवाल सिर्फ़ अभिजीत दिपके के थप्पड़ से नहीं उठे हैं, ये हर उस चुप्पी से उठे हैं जो इस तरह की घटनाओं के बाद छा जाती है, और हर उस ‘व्यवस्था’ से जो इन परदे के पीछे के हमलावरों को संरक्षण देती है।

पिंक सिटी की यह लालिमा अब खून के छींटों से नहीं, बल्कि खामोश डर से आती है। जब आवाज़ उठाने पर हाथ उठते हों, और आरोपों की गंभीरता पर सिर्फ़ बयानबाजी होती हो, तो हमें पूछना चाहिए कि हम किस तरह के समाज का निर्माण कर रहे हैं। या क्या हम बस उसी समाज को बेनकाब कर रहे हैं, जो हमेशा से इस दिखावे के नीचे छिपा था?