जयपुर संपादकीय — 17 June 2026
जेल से छूटते ही थप्पड़ मारने वाले का माल्यार्पण
संपादक की राय
गुलाबी नगर में अब हिंसा के बाद ‘स्वागत’ का नया अध्याय लिखा जा रहा है। सड़कों पर किसी को थप्पड़ मारो, और फिर जेल से निकलते ही फूल-मालाओं से नवाजे जाओ। यह किस नए ‘संस्कार’ की नींव रखी जा रही है, जयपुर? यह दृश्य सिर्फ एक खबर नहीं, हमारे सामूहिक विवेक पर एक करारा थप्पड़ है।
अभिजीत दीपके, जिन्हें ‘कॉकक्रोच जनता पार्टी’ के नाम से जाना जाता है, एक विरोध प्रदर्शन में अपनी बात रखने आए थे। बात थी शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की, नीट परीक्षा में हुई धांधली की। लेकिन यहाँ तो बात ही नहीं करने दी गई, सीधे हाथ चलाए गए। अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर शहर की दीवारों पर नारे ही चिपकाए जाते हैं या कभी-कभार कोई बयान दे दिया जाता है। पर जब कोई सचमुच कुछ कहने का साहस करे, तो उसका स्वागत हाथ-पैरों से होता है?
पुलिस ने कुछ देर के लिए हमलावरों को हिरासत में लिया, और फिर छोड़ दिया। यह कैसी त्वरित न्याय प्रणाली है जहाँ अपराध सड़कों पर खुलेआम होता है और अपराधी नायक बनकर निकलते हैं? क्या यह संदेश नहीं कि ‘मारो, पीटो, और फिर बाहर आकर अपने समर्थकों से मालाएँ डलवाओ’? यह न्याय का मज़ाक है, या न्याय अब बस एक कर्मकांड बन कर रह गया है?
जयपुर, जिसे मेहमानवाज़ी और शांति का प्रतीक माना जाता है। यहाँ पर्यटकों को ‘पधारो म्हारे देस’ का नारा देकर बुलाया जाता है, पर अपने ही शहर के नागरिकों को ‘थम जाओ, नहीं तो पीट दिए जाओगे’ का परोक्ष संदेश दिया जा रहा है। शायद यही हमारी ‘ग्लोबल सिटी’ की नई परिभाषा है: जहाँ बिजनेस समिट होते हैं, कलाकार आते हैं, और साथ ही सार्वजनिक हिंसा को भी सहर्ष स्वीकार किया जाता है।
कभी इस देश में मतभेद तर्क और वाद-विवाद से सुलझाए जाते थे। अब तो लगता है, शब्दों की जगह मुट्ठियों ने ले ली है। विरोध करने वाले को पहले ही ‘देशद्रोही’ या ‘राष्ट्र-विरोधी’ घोषित कर दिया जाता है, और फिर उस पर शारीरिक हमला ‘राष्ट्रप्रेम’ का प्रमाण बन जाता है। यह कैसी सोच है जो हर असहमति को दुश्मन मानती है, बजाय इसके कि उससे संवाद करे?
इस पूरे प्रकरण पर सत्ता के गलियारों में सन्नाटा पसरा है। कोई कड़ा बयान नहीं, कोई निंदा नहीं। क्या यह चुप्पी एक तरह की मौन स्वीकृति है? या फिर ‘हमें तो कुछ पता ही नहीं’ का ढोंग है? जब नेता और प्रशासन ऐसी घटनाओं पर आँखें मूँद लेते हैं, तब सड़क पर अराजकता का राज कायम होता है और गुंडों के हौसले बुलंद होते हैं।
यह सिर्फ एक व्यक्ति पर हमला नहीं था, यह उन तमाम नागरिकों पर हमला है जो अपने लोकतांत्रिक अधिकारों का प्रयोग करना चाहते हैं। यह एक चेतावनी है: ‘ज़ुबान खोलो, पर सिर्फ़ उतना ही जितना हमें पसंद हो।’ क्या हम वाकई ऐसी डरी हुई, चुप समाज की ओर बढ़ रहे हैं जहाँ आवाज़ उठाने की कीमत सार्वजनिक अपमान और हिंसा है?
गुलाबी शहर की दीवारों पर अब शायद अहिंसा के नहीं, बल्कि मुट्ठियों के निशाँ गहरे हो रहे हैं। क्या जयपुर की यह नई ‘पहचान’ हमें स्वीकार्य है? या हम अभी भी अपने गौरवशाली अतीत के भ्रम में जी रहे हैं, जबकि वर्तमान की सड़कें हिंसा और असहिष्णुता से मैली हो चुकी हैं?