जयपुर संपादकीय

फिर ट्रैक्टरों की चपेट में जयपुर पोलो ग्राउंड

संपादक की राय

आज फिर जयपुर के सीने पर ट्रैक्टरों की वही चिर-परिचित दहाड़ गूँजी है, जो अकसर हमें यह एहसास कराती है कि “गुलाबी नगर” अब सिर्फ़ एक रंगीन धोखा है। जयपुर पोलो ग्राउंड, जो कभी शाही खेल का मैदान था, शहर की खुली हवा का एक टुकड़ा था, आज अपनी ही जड़ों से उखाड़ा जा रहा है। यह सिर्फ़ एक मैदान नहीं, यह शहर की यादों का एक शिलालेख था, जिसे बड़े इत्मीनान से मिटाया जा रहा है।

विडंबना देखिए, जिस शहर की पहचान उसकी विरासत और शाही शान से की जाती है, आज वही शहर अपनी विरासत के फेफड़ों को नोचकर “विकास” की बलि चढ़ा रहा है। कल तक जहाँ घोड़े सरपट दौड़ते थे और तालियों की गूँज सुनाई देती थी, आज वहाँ कंक्रीट की नींव खोदने वाले मशीनों का शोर है। क्या यह वही विकास है जिसकी गाथाएँ हर चुनावी रैली में गाई जाती हैं? या यह सिर्फ़ कुछ तिजोरियाँ भरने की एक और साज़िश है?

सवाल उठता है कि यह ‘ज़मीनी क्रान्ति’ आखिर किसके इशारे पर हो रही है? किस “जनहित” की ढाल के पीछे यह खेल खेला जा रहा है? फ़ाइलें कितनी तेज़ी से भागी होंगी, मुहरें कितनी फुर्ती से लगी होंगी, जब शहर के इस ऐतिहासिक स्थल को कब्ज़ाने का फ़ैसला हुआ होगा। काश इतनी ही तेज़ी उन फ़ाइलों में भी दिखती, जो आम आदमी के रोज़मर्रा के मुद्दों पर धूल फाँक रही हैं।

और हम, हम जयपुर के जागरूक नागरिक, कहाँ हैं? वही नागरिक, जो अपनी विरासत पर इतराते हैं, जो शहर की रंगत पर बड़े-बड़े दावे करते हैं। क्या इस खामोश विध्वंस के हम सिर्फ़ मूक दर्शक बने रहेंगे? क्या हमारी आत्मा भी कंक्रीट के इस जंगल में दबकर इतनी ही सुन्न हो गई है कि हमें अपने ही शहर के अंग-भंग पर कोई आपत्ति नहीं?

सत्ता के गलियारों से लेकर अफ़सरशाही की मेज़ों तक, हर जगह विरासत के संरक्षण की कसमों-वादों की झड़ी लगी रहती है। गुलाबी शहर की शान, उसके गौरवशाली अतीत का बखान करते थकते नहीं ये लोग। लेकिन ज़मीनी हकीकत तो यह है कि शहर की साँसें एक-एक करके घोंटी जा रही हैं, और उन खोखले वादों को ट्रैक्टरों के इन्हीं टायरों के नीचे रौंदा जा रहा है।

जब शहर की खुली हवा, उसके ऐतिहासिक मैदान, उसकी हरी-भरी विरासत ही नहीं बचेगी, तो किस “जयपुर” पर इतराएंगे हम? क्या सिर्फ़ गगनचुंबी इमारतों और चमकती सड़कों के नाम बदल देने से शहर की पहचान बची रहेगी? या फिर एक दिन हम सिर्फ़ एक इतिहासहीन, कंक्रीट का पिंजर बनकर रह जाएँगे, जहाँ अतीत का कोई निशान नहीं होगा, सिवा धूल और धुएँ के।