जयपुर संपादकीय — 20 June 2026
बिना अदालत, बुलडोज़र ने ढहाया ‘कथित’ तस्कर का घर
संपादक की राय
आज फिर एक घर ढहाया गया। जयपुर की गुलाबी शामों में आज एक और तस्वीर चिपका दी गई — धूल का गुबार, ईंटों का मलबा और सत्ता के रौब का बेबाक प्रदर्शन। कथित नशा तस्कर का घर था। ‘कथित’, क्योंकि अदालत ने अभी सिर्फ़ ‘तस्कर’ शब्द पर मुहर लगाई होती, तो बात कुछ और होती। यहाँ तो बुलडोज़र ही न्यायाधीश बन गया, बिना किसी अपील, बिना किसी दलील। क्या इसी तरह नशा मुक्त राजस्थान का सपना साकार होगा? या यह सिर्फ़ एक तमाशा है, उन दर्शकों के लिए जो समझते हैं कि न्याय की गति जितनी तेज़, उतना ही अच्छा?
नशा विरोधी अभियान, बड़ा पवित्र नाम है। लेकिन जब इस अभियान में एक घर को ज़मींदोज़ करना ही सबसे बड़ा ‘ऑपरेशन’ बन जाए, तो सवाल उठता है कि असली समस्या से कौन भाग रहा है। क्या नशा सिर्फ़ दीवारों में पनपता है? क्या ईंटें गिरने से नशे की जड़ें सूख जाती हैं? या यह सिर्फ़ एक सुविधा है, ताकि असली जड़ों तक पहुँचने की मेहनत से बचा जा सके? शायद पुलिस को लगा कि ड्रग्स के नेटवर्क को तोड़ने के लिए दीवारों को तोड़ना ही सबसे आसान उपाय है।
कानून की अपनी एक किताब होती है, जिसे हमने हज़ारों साल के अनुभव से सीखा है। उसमें प्रक्रियाएँ हैं, सुनवाई है, सबूत हैं और फिर सज़ा है। लेकिन जब ‘ऑपरेशन’ के नाम पर यह सब बाईपास कर दिया जाए, तब यह सिर्फ़ ‘कानून का राज’ नहीं, बल्कि ‘ताकत का राज’ कहलाता है। ‘कथित’ अपराधी का घर गिराने से पहले, क्या यह सुनिश्चित कर लिया गया कि वह अपराधी है या सिर्फ़ आरोप का शिकार? या यह मान लिया गया कि आरोप ही सज़ा के लिए काफ़ी है?
यह सिर्फ़ एक घर का ध्वस्तीकरण नहीं, यह एक संदेश है। एक ऐसा संदेश जो समाज के हर उस कोने तक पहुँचता है, जहाँ कानून के दायरे में रहकर न्याय की उम्मीद की जाती है। यह एक चेतावनी है कि आपकी ज़मीन पर खड़ा आपका आशियाना, अगर सत्ता की नज़र में ‘गलत’ साबित हुआ, तो वह एक झटके में रेत में मिल सकता है। बिना कागज़, बिना सुनवाई, बिना किसी तामझाम के। यह दिखाता है कि राज्य की ताकत कितनी निरंकुश हो सकती है, जब उसे किसी ‘महान उद्देश्य’ का चोला पहना दिया जाए।
इस प्रदर्शन के पीछे की हक़ीक़त बड़ी कड़वी है। क्या वाकई नशाखोरी की समस्या का समाधान एक इमारत को गिराने में निहित है? नशे के सौदागर तो शायद एक रात में नया ठिकाना बना लेंगे, नए नेटवर्क फैला लेंगे। लेकिन जो विश्वास कानून और व्यवस्था पर आम नागरिक का होता है, वह एक बार टूटता है तो फिर जुड़ता नहीं। यह सिर्फ़ एक घर नहीं गिरता, यह आस्था का एक स्तंभ ढह जाता है।
गुलाबी नगरी की इस दोहरी ज़िंदगी में, जहाँ एक तरफ़ जयपुर को दुनिया के बेहतरीन कला और सांस्कृतिक शहरों में गिना जाता है, वहीं दूसरी तरफ़, इसकी गलियों में ‘न्याय’ का यह नया संस्करण खेला जा रहा है। एक हाथ में कला की प्रशंसा का तमगा, दूसरे हाथ में बुलडोज़र का हैंडल। क्या यही वह सांस्कृतिक विरासत है जिसे हम दुनिया को दिखाना चाहते हैं? एक ऐसी व्यवस्था, जहाँ कानून की किताब से ज़्यादा बुलडोज़र का शोर प्रभावी माना जाता है?
तो फिर, अब किसे रोका जा रहा है? नशे के सौदागरों को, या उन लोगों को जो शायद किसी दिन कानून से अपनी सुरक्षा की उम्मीद रखेंगे? धूल का गुबार बैठ चुका होगा, लेकिन मन में उठा सवाल कई दिनों तक बैठ नहीं पाएगा। क्या इस बार वाकई “हमने कुछ किया है” का भ्रम जनता पर छा जाएगा, या वे इस ‘बुलडोज़र न्याय’ की खोखली नींव को समझ पाएँगे?