जयपुर संपादकीय

परीक्षा के पर्चे के लिए पुलिस-एसओजी ‘हाई अलर्ट’ पर

संपादक की राय

जयपुर आज फिर एक ‘इतिहास’ रच रहा है। इतिहास, जहाँ ज्ञान की परीक्षा के लिए पुलिस और एसओजी को ‘हाई अलर्ट’ पर रखा जाता है, जैसे कि कोई दुर्दांत अपराधी पकड़ना हो या सीमा पर दुश्मन की घुसपैठ रोकनी हो। यह कौन-सी शिक्षा व्यवस्था है, साहब, जहाँ बच्चों के भविष्य को तय करने वाले पर्चे को हथियारों और वर्दी के साये में ‘बचाना’ पड़ता है?

नीट यूजी की दोबारा परीक्षा, यह शब्द ही हमारी पूरी व्यवस्था पर एक करारा तमाचा है। एक बार नहीं, बार-बार, इस देश के होनहारों को यह बताना पड़ता है कि उनके सपनों की बुनियाद कितनी कमज़ोर है। पिछली बार चूक हुई, पर्चे बिके, मेहनती छात्र ठगे गए – और अब समाधान क्या है? ज़्यादा पुलिस, ज़्यादा चौकसी। वाह! समस्या की जड़ पर वार करने की बजाय, उसके पत्तों पर पानी डालने की यह कैसी कवायद है?

यह नजारा देखकर तो लगता है जैसे हम किसी युद्ध-ग्रस्त क्षेत्र में हैं, जहाँ सबसे कीमती चीज़ – ज्ञान और निष्ठा – को बचाए रखने के लिए सेना बुलानी पड़ी है। उन दावों का क्या हुआ, जो हर मंच से किए जाते हैं कि हम एक डिजिटल और प्रगतिशील भारत का निर्माण कर रहे हैं? प्रगति यही है कि एक अदद परीक्षा भी बिना पुलिस के न हो पाए, और इंटरनेट तक बंद करने की नौबत आ जाए, ताकि ‘चोर’ सफल न हो सकें?

और ये ‘चोर’ कौन हैं? क्या वे सड़क पर घूमने वाले लुटेरे हैं? नहीं, ये वही लोग हैं जो इस व्यवस्था के भीतर पलते हैं, जो ‘ज्ञान’ को एक वस्तु समझते हैं जिसे खरीदा-बेचा जा सकता है। पुलिस का काम इन्हें परीक्षा के दिन पकड़ना नहीं, बल्कि व्यवस्था में मौजूद उन सेंधों को बंद करना है जहाँ से ये पनपते हैं। लेकिन कौन पूछेगा उनसे कि हर बार यह नौबत क्यों आती है?

लाखों बच्चे, उनके माँ-बाप, इस पूरी प्रक्रिया से गुजरते हुए मानसिक और आर्थिक रूप से टूट जाते हैं। उनकी रातों की नींद, उनके कोचिंग की फीस, उनके उम्मीद भरे चेहरे – इन सबका हिसाब कौन देगा? क्या पुलिस का यह ‘हाई अलर्ट’ उन टूटे हुए भरोसे को वापस ला पाएगा, जो हर बार ऐसी खबर के साथ चकनाचूर होता है?

यह सिर्फ एक परीक्षा का मामला नहीं है, यह उस समाज की कड़वी सच्चाई है जहाँ ईमानदारी और मेहनत अब अपवाद बनती जा रही है। जहाँ योग्यता की जगह जुगाड़ ने ले ली है, और ‘मेधा’ की परिभाषा ‘पर्चा खरीदने की क्षमता’ बन गई है। क्या हम वाकई ऐसे ही भविष्य की नींव रख रहे हैं, जहाँ डॉक्टर और इंजीनियर भी ‘हाई अलर्ट’ के साये में तैयार होंगे?

जब हमारे राजनेता बड़े-बड़े आयोजनों में फीते काटते हैं और विकास के गुणगान करते हैं, तब क्या उन्हें इन बच्चों के बेबस चेहरे याद नहीं आते? क्या उन्हें यह नहीं दिखता कि उनके ‘विकसित’ समाज में सबसे बुनियादी चीज़ – न्यायपूर्ण शिक्षा – ही सबसे बड़ी चुनौती बन गई है? यह कैसा विरोधाभास है!

तो आज जब जयपुर की सड़कों पर पुलिस का सायरन गूँजेगा, तो वह सिर्फ सुरक्षा का ऐलान नहीं होगा। वह इस देश की शिक्षा व्यवस्था की चीत्कार होगी, हमारे खोखले दावों का पर्दाफ़ाश होगा। क्या कभी ऐसा भी दिन आएगा, जब हमारे बच्चे बिना किसी डर, बिना किसी पुलिस पहरे के, सिर्फ अपनी काबिलियत पर भरोसा करके परीक्षा दे पाएंगे? या फिर यह ‘हाई अलर्ट’ ही हमारी नई नियति है?