जयपुर संपादकीय

गुप्त पटाखा गोदाम में आग, सात की मौत

संपादक की राय

भारी धुएँ की चादर में घिरा हुआ जयपुर, जहाँ आग की लपटों ने एक गुप्त फायरक्रैकर गोदाम को खाकर बिखेर दिया सात जिंदगियों की धुंधला साया, ऐसा दृश्य मानो शहर के शहरी नियमन के बंधन में फंसे साप को काटने की कोशिश कर रहा हो।

साक्ष्य स्पष्ट हैं: जयपुर के एक औद्योगिक क्षेत्र में अनधिकृत रूप से जमा किए गए पटाखों की ढेर में अचानक उभरी आग ने सात श्रमिकों को बेमौके मार डाला, जबकि आस-पास की गलियों में बिखरे हुए काँच के टुकड़े और जले हुए कागजों की गंध ने यह बतलाया कि यह कोई आकस्मिक दुर्घटना नहीं थी।

ऐसे हादसे राजस्थान की इतिहास में नई बात नहीं। 2019 में बाड़मेर में वही कारणों से हुए आगजनी में दो दर्जन लोगों की जान गई थी, और 2022 में अजमेर के एक पब में फटते पटाखों ने भी कई सड़कों को ध्वस्त कर दिया था। अब तक की सख्त नियामक नीतियों को केवल कागज की परतों में ही रहना पड़ा है।

राज्य सरकार ने तुरंत “कड़ी कार्रवाई” का आश्वासन देते हुए एक बयान जारी किया, जिसमें कहा गया कि “अवैध भंडारण पर कड़ी सजा होगी”। परंतु इसी वादे के तहत पिछले दो वर्षों में निकाले गए लाइसेंसों की संख्या में असामान्य वृद्धि देखी गई, जो एक ही सवाल खड़ा करती है— क्या शब्दों का वजन ही पर्याप्त है?

फायर ब्रिगेड की देर से पहुँच और स्थानीय प्रशासन की अनदेखी इस बात का प्रमाण है कि नियामक तंत्र में गड़बड़ी केवल कागज के फ़ॉर्म नहीं, बल्कि जड़ में जड़ित भ्रष्टाचार है। कई बार तो “सुरक्षा प्रमाणपत्र” के नाम पर नकली दस्तावेज़ों को मंजूरी मिलती है, जिससे असुरक्षित गोदामों को कानूनी ढाल मिल जाती है।

साथ ही, इस घोटाले की जड़ में है जनता की अंधाधुंध पैकेजिंग की भूख। हर साल दशकों की धूमधाम से मनाए जाने वाले दीवाली के मौसम में सस्ते, तेज़ी से बनते पटाखों की मांग बाजार को घातक व्यापार की राह पर धकेल देती है, और फिर भी वह वही हाथ जो इन वस्तुओं को खरीदता है, वही हाथ इन असुरक्षित गोदामों को बना कर रखता है।

अब सवाल यह नहीं कि अगली बार कौन‑सी सड़कों को जलती लपटों से बचाया जाएगा, बल्कि क्या जयपुर की धड़कनें फिर से धुएँ में डूबे बिना अपनी साँस ले पाएंगी?