जयपुर संपादकीय — 25 June 2026
वीआईपी रूट के लिए सड़क खाली, झुलसा ठेले वाला
संपादक की राय
गुलाबी नगर में आज फिर एक नई सुबह हुई है, और हर सुबह की तरह सत्ता के गलियारे चमकाए जा रहे हैं। चमकाए जा रहे हैं यानी रास्ते साफ़ किए जा रहे हैं, ख़ासकर उनके लिए जिनके क़दमों की आहट सुनकर हवा भी रास्ता दे देती है। लेकिन इस ‘रास्ता साफ़’ करने की क़ीमत एक बेचारे ठेले वाले ने अपनी चमड़ी जलाकर चुकाई है। वीआईपी रूट के लिए सड़कें खाली कराने की इस सालाना रस्म में, लगता है, सिर्फ गाड़ियों को ही नहीं, इंसानों को भी ‘हटाया’ जाता है, कभी-कभी तो आग के लपटों में झोंककर।
यह सिर्फ़ एक दुर्घटना नहीं, यह एक कड़वा व्यंग्य है हमारी उस व्यवस्था पर जो वीआईपी के स्वागत में इतनी मशगूल रहती है कि आम आदमी की जान की कीमत उसे एक रिपोर्ट से ज़्यादा नहीं लगती। राजस्थान राज्य मानवाधिकार आयोग ने इस घटना पर रिपोर्ट माँगी है। रिपोर्ट? क्या रिपोर्ट में जले हुए आदमी की पीड़ा के सेंटीमीटर दर्ज होंगे, या उस अफसर की लापरवाही की परतें जो रौब झाड़ने में इतना मगन था कि उसे एक चलती-फिरती ज़िंदगी महज एक रुकावट लगी?
शहर को “सुंदर” दिखाना हो, “सुरक्षित” दिखाना हो, या किसी ख़ास मेहमान को “प्रभावित” करना हो – इसका सबसे आसान तरीक़ा है उन सबको रास्ते से हटा देना जो इस “सुंदरता” और “सुरक्षा” की परिभाषा में फिट नहीं बैठते। ठेले वाले, छोटे दुकानदार, राहगीर – ये सब तो शहर के परदे के पीछे के रंगमंच के पात्र हैं, जिनकी मौजूदगी तब तक असहनीय है जब तक ‘मुख्य अतिथि’ सामने हों।
आज भी जयपुर की सड़कों पर वीआईपी संस्कृति का वो अदृश्य जाल बिछा है, जो अपनी सुविधा के लिए किसी भी नागरिक को मोहरा बना सकता है। उनके स्वागत में सड़कें खाली होती हैं, एम्बुलेंस फंस जाती है, स्कूल बसें रुक जाती हैं, और अब तो इंसान भी झुलस रहे हैं। यह कैसा विकास है जहाँ कुछ लोगों का गुज़रना इतना ज़रूरी हो जाता है कि बाक़ी सब को अपनी जगह और अपनी सलामती छोड़ देनी पड़ती है?
यह सिर्फ़ जयपुर की कहानी नहीं है, यह उस पूरे तंत्र का सार है जहाँ ‘जनता के सेवक’ खुद को ‘जनता के मालिक’ समझने लगे हैं। उनके आगमन की तैयारी ऐसी होती है मानो कोई राजसी जुलूस निकलने वाला हो, और प्रजा का काम है बस रास्ते से हट जाना, सिर झुका लेना, या अगर गलती से रास्ते में आ गए तो जला दिए जाना। और फिर एक “रिपोर्ट” का इंतज़ार करना।
क्या हम इतने संवेदनहीन हो चुके हैं कि सड़क किनारे अपनी रोटी कमाने वाला एक इंसान, सिर्फ इसलिए अपनी जान जोखिम में डाले क्योंकि सत्ता के किसी प्रतीक को बिना किसी बाधा के गुज़रना है? क्या यह शहर, जिसकी आत्मा इसकी मेहनतक़श जनता में बसती है, अब बस कुछ चुनिंदा चेहरों के लिए ही सजता-संवरता है?
सवाल उस ठेले वाले के जले हुए हाथों से उठ रहा है, सवाल उस हर छोटे आदमी की बेबसी से उठ रहा है जिसकी आवाज़ वीआईपी गाड़ियों के काफिले में दब जाती है। क्या यह मानवाधिकारों का हनन नहीं कि एक व्यक्ति को सिर्फ एक “वीआईपी रूट” के लिए इतना बड़ा ख़ामियाज़ा भुगतना पड़े? या फिर अब मानवाधिकार भी सिर्फ उन लोगों के लिए हैं जो ठंडे कमरों में बैठकर ‘रिपोर्ट’ लिख सकते हैं, उन तक नहीं पहुँचते जिनके हाथ आग से झुलसे हैं?
शहर की गुलाबी दीवारें बहुत कुछ छुपाती हैं। आज एक बार फिर, उन दीवारों के पीछे का सच चीख़ रहा है। और यह चीख़ तब तक गूँजती रहेगी जब तक वीआईपी संस्कृति की यह आग हमारे समाज को ऐसे ही जलाती रहेगी, भले ही कितनी भी रिपोर्टें बन जाएँ।