जयपुर संपादकीय

लापता मासूम दस दिन बाद मिला मृत

संपादक की राय

दस दिन। एक मासूम। और फिर एक खबर – ‘लापता बच्चा मृत मिला।’ गुलाबी नगर की यह क्या नई पहचान है? चमकते बाज़ारों, ऊँचे महलों और पर्यटन की चिकनी बातों के बीच दस दिन तक एक बच्चा गायब रहता है, और फिर उसकी लाश मिलती है। क्या यह हमारी संवेदनहीनता का सबसे क्रूर प्रमाण नहीं?

जाँच चल रही है, ऐसा बताया जा रहा है। दस दिन बाद, जब सब खत्म हो चुका है, तब कैसी जाँच? क्या यह सिर्फ़ कागज़ी खानापूर्ति है, या फिर दिखावा कि ‘हमने कुछ तो किया’? जिस शहर में हर नुक्कड़ पर कैमरे का दावा है, हर गली में पुलिस की मुस्तैदी का ढोल पीटा जाता है, वहाँ एक दस साल का बच्चा इतने दिन तक कहाँ गुम रहा, और किसी को भनक तक नहीं लगी?

सुरक्षा के दावों की लंबी फेहरिस्त होती है। ‘सजग रहें’, ‘सावधान रहें’ के उपदेशों से अख़बारों के पन्ने भरे रहते हैं। लेकिन जब एक मासूम दस दिन तक लापता रहता है, तब यह सारे दावे कहाँ दुबक जाते हैं? पुलिस की फाइलों में एक और ‘गुमशुदगी’ का मामला दर्ज होता है, और फिर ‘मृत्यु’ का। आँकड़ों के इन शुष्क पन्नों में एक परिवार की टूटी उम्मीदें, एक बच्चे का खोया बचपन और एक शहर की शर्मनाक चुप्पी कहीं दब जाती है।

हम सब ने अपनी खिड़कियाँ बंद कर ली हैं। गली में कोई अजनबी बच्चा भटकता दिखे तो पूछने की जहमत कौन उठाए? किसी ने शोर मचाया हो, किसी ने कुछ संदिग्ध देखा हो – तो भी ‘अपने को क्या’ का मंत्र जपने वाले हजारों होंगे। यह शहर, जो कभी मेहमाननवाज़ी के लिए जाना जाता था, आज अपने ही बच्चों के लिए इतना पराया कैसे हो गया?

हमारे हुक्मरानों के पास ‘स्मार्ट सिटी’ बनाने की योजनाएँ हैं, पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए करोड़ों के बजट हैं, और हर मंच पर ‘सुरक्षित राजस्थान’ के नारे गूँजते हैं। लेकिन इस बीच, शहर के किसी कोने में एक दस साल का बच्चा गुम हो जाता है और फिर लाश बनकर मिलता है। क्या हमारी सारी तरक्की की इमारतें सिर्फ कागजों पर खड़ी हैं, जिनकी नींव में बच्चों की सुरक्षा नहीं?

यह सिर्फ़ एक बच्चे की कहानी नहीं है। यह हर उस माता-पिता के लिए एक डरावनी चेतावनी है, जो अपने बच्चों को बाहर खेलने भेजते हैं। यह उन लोगों के लिए भी एक संदेश है, जो सोचते हैं कि ‘मेरे घर तो ऐसा नहीं होगा’। यह एक ऐसा घाव है जो सिर्फ़ एक परिवार को नहीं, बल्कि पूरे समाज को टीस दे रहा है। अगर एक मासूम शहर के बीच से गायब होकर लाश बन जाए, तो फिर किस पर भरोसा करें?

तो अब क्या? एक और फाइल बंद होगी, कुछ दिन चर्चा होगी, और फिर सब भुला दिया जाएगा? अगला कौन? अगला किसका बच्चा? क्या हमारे इस सुंदर शहर में अब किसी बच्चे का बचपन सुरक्षित नहीं है, या फिर हमने ही तय कर लिया है कि ‘चलता है’ की संस्कृति में यही हमारा नया सामान्य है?