जयपुर संपादकीय — 27 June 2026
जेडीए के बुलडोज़रों ने उजाड़े गली-मोहल्ले
जैपुर विकास प्राधिकरण की बुलडोज़रें, धूल के बादल में चमकते हुए हेल्मेट वाले आधिकारिक मुस्कान के साथ, उन गली‑गुजारों में उतर आईं जहाँ रोज़मर्रा की ज़िन्दगी के कंकड़‑पत्थर पर क़दम रखे जाते हैं। घर‑घर में चिल्लाहट, बच्चों की आँखों में आँसू, और पीछे से फ़ाइलों की ध्वनि—एक ही क्षण में शहर का “सफाई अभियान” एक नाट्य मंच बन गया।
जैपुर विकास प्राधिकरण ने इस हफ़्ते केवल दो दिन में ही 17 अवैध इमारतों को ध्वस्त कर दिया, आधिकारिक बयान में इसे “शहर की सौंदर्यीकरण” का हिस्सा कहा गया, जबकि वास्तविक आंकड़े यह दिखाते हैं कि इन इमारतों में लगभग 120 लोग सीधे‑सीधे बेघर हुए।
ऐसी ध्वस्तियों का इतिहास जेडीए को याद दिलाता है—2018 की “बिना इज़ाजत के” सफ़ाई, जब कई बार वही ठेकेदारों को काम दिया गया था, और नतीजा यह कि ध्वस्त होने के बाद वही लोग फिर से वही जगह पर “क़ानूनी” ढाँचे में निर्माण कर रहे थे।
भले ही शहर की छत्री के नीचे “विकास” का नारा हो, इस बार का चयनित लक्ष्य—अधिकांशतः मध्यम वर्गीय परिवार—राजनीतिक टाइम‑टेबल का हिस्सा लग रहा है। चुनावी माहौल में “क़ानून का सम्मान” दिखाने के लिए, वही क्षेत्रों को टारगेट किया जाता है जहाँ वोटरों की संख्या अधिक, लेकिन आवाज़ कम।
परिणामस्वरूप, इन परिवारों को न तो उचित पुनर्वास दिया गया, न ही कोई आर्थिक मदद; उनके घर के टुकड़े‑टुकड़े बचे, जबकि ठेकेदारों के खातों में नई आय का रास्ता खुला। यह वही पैटर्न है जो शहर के विकास को “भ्रष्टाचार‑संकुल” के रूप में लिखता है।
शहर परिषद के सदस्यों की मौनता, और मुख्यमंत्री के “शहर को स्वच्छ बनाना” के भाषणों के बीच की दूरी, इस बात की ओर इशारा करती है कि शब्दों का उपयोग केवल चुनावी इमेजिंग के लिए किया जाता है, वास्तविक नीतियों की कमी को छुपाने के लिए।
क्या इस धूल‑भरे “सफाई” में वही सच्ची शांति है, जो लोगों की आँखों में आँसू के साथ गूँजती है?