जयपुर संपादकीय

मुख्यमंत्री के काफिले की भेंट चढ़ा मोमो विक्रेता

संपादक की राय

गुलाबी नगर के चौराहों पर आज एक नई आग सुलग रही है, लेकिन यह विकास की लौ नहीं, बल्कि एक मोमो विक्रेता के जलते हुए शरीर से उठी चिंगारी है। मुख्यमंत्री का काफिला गुजरने वाला था, रास्ता साफ हो रहा था – और इस ‘साफ-सफाई’ की भेंट चढ़ गया एक आम आदमी, जिसके चूल्हे की आग ने उसे ही झुलसा दिया। क्या यही हमारी तरक्की है, जहां सत्ता की शान-शौकत के आगे इंसान की जान भी बेमानी हो जाती है?

यह घटना सिर्फ एक हादसा नहीं, यह हमारी पूरी व्यवस्था के खोखलेपन का आईना है। जनता का सेवक जब जनता के बीच से गुजरता है, तो उसके लिए सड़कों पर बिछे लाल कालीन से भी अधिक चाक-चौबंद इंतजाम किए जाते हैं। पुलिस, प्रशासन, सुरक्षाकर्मी – सब एक ही धुन में लगे रहते हैं: “माई-बाप का रास्ता निर्बाध रहे।” इस कवायद में अगर कोई छोटा-मोटा मोमो बेचने वाला जल जाए, तो क्या फर्क पड़ता है? फाइल पर ‘दुर्घटना’ लिख दिया जाएगा और बात खत्म।

मुख्यमंत्री का काफिला निकल जाए, इसके लिए ट्रैफिक रोक दिया जाता है, दुकानें बंद करवा दी जाती हैं, और अब तो लगता है, सड़क पर खड़े इंसान को भी जलने के लिए छोड़ दिया जाता है। किस सुरक्षा की बात करते हैं हम, जब जिस जनता की सुरक्षा के नाम पर यह सब ढोंग रचा जाता है, वही जनता सबसे असुरक्षित महसूस करती है? यह प्रोटोकॉल है या राजसी अहंकार का खुला प्रदर्शन?

सदियों से यह देश, यह शहर, ऐसे ही चलता आया है। सत्ता हमेशा आम आदमी से ऊपर रही है। महाराजाओं के युग में भी प्रजा ऐसे ही सिर झुकाकर गुजरने का इंतजार करती थी। आज भी कोई खास बदलाव नहीं आया है। सिर्फ चेहरे बदले हैं, वेशभूषा बदली है, लेकिन सत्ता का मद और आम आदमी के प्रति उसकी उदासीनता जस की तस बनी हुई है। वह मोमो विक्रेता उस भीड़ का सिर्फ एक हिस्सा था, जिसे हर दिन अपनी रोजी-रोटी के लिए जद्दोजहद करनी पड़ती है।

सोचिए, उस जलते हुए चूल्हे के पास, उस आदमी की क्या मनोदशा रही होगी? उसे शायद यह भी नहीं पता होगा कि वह किस वीआईपी के लिए रास्ता खाली कर रहा था। उसके लिए तो बस यह था कि पुलिस का डंडा न पड़े, उसका ठेला न हटे, और किसी तरह दिन का धंधा चलता रहे। लेकिन हमारी ‘महान’ व्यवस्था ने उसकी यह छोटी सी उम्मीद भी राख कर दी। अब उस आग से सिर्फ उसका शरीर नहीं, बल्कि उसका भविष्य, उसके परिवार की उम्मीदें भी झुलस गई होंगी।

इस घटना पर भी क्या कोई ‘जांच’ बिठाई जाएगी? क्या ‘दोषियों’ को ‘कड़ी सजा’ दी जाएगी? या यह भी उन हजारों छोटी-मोटी घटनाओं में से एक बनकर रह जाएगी, जिन्हें समाचार की सुर्खियों में जगह तो मिलती है, लेकिन समाधान की फाइलों में धूल फांकते हुए दम तोड़ देती हैं? हमारी नौकरशाही की मोटी चमड़ी पर ऐसे हादसों का कोई असर नहीं होता। उनके लिए यह ‘डेली रूटीन’ का हिस्सा है।

जयपुर, जो खुद को स्मार्ट सिटी कहता है, जहां पर्यटन की बड़ी-बड़ी बातें की जाती हैं, क्या उसकी यही सच्चाई है? कि यहां मुख्यमंत्री के गुजरने के लिए एक गरीब आदमी को जलाया जा सकता है, और किसी को फर्क भी नहीं पड़ता? यह सवाल आज पूरी व्यवस्था से है। क्या वाकई हमारे लिए कुछ भी नहीं बदला? क्या हम हमेशा ऐसे ही जलते रहेंगे, ताकि हमारे ‘माई-बाप’ बिना किसी बाधा के निकल सकें? सवाल तीखा है, और इसका जवाब सिर्फ एक कड़वी चुप्पी है।