जयपुर संपादकीय — 29 June 2026
जयपुर-अजमेर हाईवे पर हादसा, तीन की मौत
संपादक की राय
जयपुर-अजमेर राजमार्ग पर आज फिर वही दोहराव देखने को मिला, जो हमारी नसों में अब रक्त के बजाय बेफ़िक्र उदासीनता भर गया है। एक खड़ी बस, एक तेज़ रफ़्तार ट्रक, और तीन जीवन पलक झपकते ही काल के ग्रास बन गए। यह सिर्फ़ एक ‘दुर्घटना’ नहीं, हमारी सामूहिक चेतना पर एक और थप्पड़ है।
जिस राजमार्ग को आधुनिक प्रगति का प्रतीक बताया जाता है, वह अब मौत का गलियारा बनता जा रहा है। चमचमाती सड़कें सिर्फ़ गति बढ़ाने का निमंत्रण बन चुकी हैं, जहाँ ‘नियम’ शब्द किसी किंवदंती सा लगता है। क्या हमारे इंजीनियर सिर्फ़ डामर बिछाना जानते हैं, या सड़कों पर सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने का विज्ञान भी उन्हें आता है?
तीन जानें। बस इतनी सी ही कीमत है क्या इंसानी ज़िंदगी की, कि वह अख़बार की एक छोटी सी खबर और सरकारी आंकड़ों में एक संख्या बनकर रह जाए? ये वे लोग थे जो किसी उम्मीद से निकले होंगे, किसी अपने का इंतज़ार कर रहे होंगे। क्या इस शहर ने, इस व्यवस्था ने, उनके परिवारों को सिर्फ़ एक अधूरी कहानी और एक अथाह शून्य ही देना सीखा है?
सुरक्षित यात्रा के वादे, ‘स्मार्ट सिटी’ की घोषणाएं, ‘हादसा मुक्त राजस्थान’ के नारे। ये सब सिर्फ़ चुनावी मंचों की शोभा बढ़ाते हैं या सरकारी रिपोर्टों में सुंदर आंकड़ों की माया रचते हैं? ज़मीन पर हकीकत यह है कि एक सामान्य बस को राजमार्ग पर सुरक्षित खड़ा होने की भी गारंटी नहीं है। यह कैसा विकास है, जो जीवन की सबसे बुनियादी सुरक्षा भी नहीं दे सकता?
जिम्मेदार कौन? तेज़ रफ़्तार से भागता ट्रक ड्राइवर? या वह पुलिस जो चौराहों पर चालान काटने में व्यस्त रहती है, पर राजमार्गों पर अनियंत्रित गति पर लगाम नहीं लगा पाती? या परिवहन विभाग, जिसे नींद से जागकर अपने नियमों को कागज़ से सड़क पर उतारने की फुर्सत नहीं? यहाँ हर कोई अपनी ज़िम्मेदारी दूसरे पर डाल देता है, और मौत अपनी फसल काटती रहती है।
हम क्वांटम लैब और इलेक्ट्रिक बसों के उद्घाटन पर गर्व करते हैं, पर हमारे राजमार्गों पर एक ‘स्थिर’ बस मौत का कारण बन जाती है। यह कैसी विडंबना है? एक ओर हम भविष्य की तकनीक पर अरबों फूंक रहे हैं, दूसरी ओर आज की बुनियादी सुरक्षा भी एक दिवास्वप्न है। क्या हमारा ‘नया राजस्थान’ सिर्फ़ विज्ञापनों और सरकारी आयोजनों में ही चमकता है?
आज की यह घटना भी कुछ दिनों में धुंधली पड़ जाएगी। अख़बार बदलेगा, ख़बरें बदलेंगी। लेकिन वह राजमार्ग वहीं रहेगा, इंतज़ार करेगा अगली दुर्घटना का, अगली उन अधूरी कहानियों का। और हम, जयपुर के नागरिक, कब तक इस नियति को ‘हादसा’ मानकर स्वीकार करते रहेंगे? कब तक हम सिर्फ़ अगली मौत की ख़बर का इंतज़ार करेंगे?