जयपुर संपादकीय

अस्सी हज़ार की रिश्वत लेते धरा गया निगम इंजीनियर

संपादक की राय

जयपुर की सुबह अक्सर गुलाबी होती है, अखबारों की सुर्खियाँ भी अक्सर रंगीन। मगर आज के पन्नों पर फिर वही घिसी-पिटी स्याह खबर छपी है, जिस पर अब किसी को हैरानी भी नहीं होती: एंटी करप्शन ब्यूरो ने नगर निगम के एक इंजीनियर साहब को अस्सी हज़ार की रिश्वत लेते रंगे हाथों धर दबोचा। यह खबर नहीं, बल्कि शहर की नियति है। एक ऐसी नियति, जिसमें ईमानदारी अब अपवाद है और भ्रष्टाचार नियम।

अस्सी हज़ार रुपये! गुलाबी नगर की सड़कों पर टहलते हुए, क्या यह रकम इतनी छोटी नहीं लगती कि इसे ‘रिश्वत’ कहने में भी शर्म आए? यह तो किसी छोटे-मोटे काम के लिए लगने वाला ‘सेवा शुल्क’ जान पड़ता है, जिसके बिना दफ़्तरों में कागज़ भी अपनी जगह से हिलने को तैयार नहीं होते। सवाल यह नहीं कि इंजीनियर साहब पकड़े गए, सवाल यह है कि कितने ऐसे ‘इंजीनियर’ और ‘साहब’ हर सुबह अपने दफ़्तरों में इसी धंधे को चलाने बैठते हैं, और कभी पकड़े नहीं जाते?

यह कोई अकेला पत्ता नहीं है जो झरने से टूटकर गिरा हो। यह उस पूरे जंगल का हाल है जहाँ हर पेड़ की जड़ में दीमक लगी है। नगर निगम, जिसने इस शहर को ‘स्मार्ट सिटी’ बनाने के सपने दिखाए, उसके अपने ही नुमाइंदे अस्सी हज़ार की खातिर अपनी साख बेच रहे हैं। फिर किस मुंह से हम बुनियादी सुविधाओं, सड़कों की गुणवत्ता या जल निकासी की सुचारु व्यवस्था की उम्मीद करें, जब नींव में ही रिश्वत की ईंटें भरी जा रही हों?

एसीबी की कार्रवाई भी अब किसी त्योहार की तरह हो चली है। हर कुछ महीनों में एक-दो ‘बलि का बकरा’ पकड़ा जाता है, ढोल पीटे जाते हैं, और फिर सब शांत। इससे क्या व्यवस्था सुधरती है? यह तो बस एक दिखावा है, ताकि जनता को लगे कि ‘कुछ हो रहा है’। असलियत में तो यह एक गहरी जड़ें जमा चुकी बीमारी का मामूली लक्षण भर है, जिसका इलाज कौन करना चाहता है, यह आज भी एक यक्ष प्रश्न है।

हम शहरवासी भी तो अजीब हैं। हम शिकायत करते हैं, कोसते हैं, मगर जब अपना काम अटकता है तो चुपचाप जेब ढीली कर देते हैं। क्या हमें अब यह स्वीकार हो गया है कि बिना ‘चढ़ावा’ चढ़ाए कोई सरकारी काम नहीं होता? क्या हमारी अंतरात्मा भी अब इस भ्रष्टाचार की भागीदार हो गई है, क्योंकि हमने प्रतिरोध करना छोड़ दिया है?

जयपुर की गुलाबी पहचान अब सिर्फ़ इमारतों और पर्यटन तक सीमित नहीं रह गई है। यह रिश्वत की उस परत से भी गुलाबी होती जा रही है, जो हर छोटे-बड़े काम पर चढ़ी हुई है। यह अस्सी हज़ार की रकम सिर्फ़ एक इंजीनियर के खाते में नहीं जा रही थी, यह सीधे-सीधे उस भरोसे को काट रही थी जो जनता का अपनी व्यवस्था पर होना चाहिए।

तो क्या यह मान लिया जाए कि ‘ईमानदार व्यवस्था’ की बात अब सिर्फ़ चुनावी नारों और किताबों तक ही सिमट कर रह गई है? क्या हम इसी ‘अस्सी हज़ारी’ संस्कृति के साथ जीने को अभिशप्त हैं, जहाँ हर सरकारी फ़ाइल पर एक अदृश्य कीमत का टैग लगा होता है? आज एक इंजीनियर पकड़ा गया, कल फिर कोई पकड़ा जाएगा। मगर क्या इस शहर की आत्मा से भ्रष्टाचार की यह कालिख कभी धुल पाएगी? या यह हर नए सूर्योदय के साथ और गहरी होती जाएगी?