जयपुर संपादकीय — 1 July 2026
जयपुर-बांदीकुई एक्सप्रेसवे पर जलती बस, मातम
संपादक की राय
दौसा के जयपुर-बांदीकुई एक्सप्रेसवे पर एक जलती हुई बस की भयावह तस्वीर क्या सिर्फ एक दुर्घटना थी, या यह हमारे तथाकथित “विकास” के हाईवे पर बिछी लाशों की एक और खामोश चेतावनी? जब कोई बस ट्रेलर से टकराकर खाई में गिरती है और आग का गोला बन जाती है, तो उसमें सिर्फ़ ईंजन नहीं, बल्कि आम आदमी का उस व्यवस्था पर विश्वास भी जलकर राख हो जाता है, जो उन्हें सुरक्षित यात्रा का भरोसा देती है।
ये चमचमाती सड़कें, जो “प्रगति” की प्रतीक बनकर पेश की जाती हैं, अक्सर सिर्फ़ मौत के नए रास्ते साबित होती हैं। क्या यही है वह तेज़ रफ़्तार विकास, जहाँ ज़िन्दगियों की क़ीमत सिर्फ़ टोल प्लाज़ा पर चुकाए गए चंद रुपयों जितनी रह जाती है? जिस एक्सप्रेसवे पर गति की बात की जाती है, वही मौत की गति का पर्याय बन जाता है, यह कैसा विरोधाभास है!
यह कोई नई कहानी नहीं। हर कुछ महीनों में, राजस्थान के किसी न किसी कोने से ऐसी ही एक त्रासदी की ख़बर आती है। पहले हादसा, फिर चीख़-पुकार, फिर मौतों का आँकड़ा और अंत में सरकारी काग़ज़ों पर सिमट जाने वाली एक ‘जाँच’ की घोषणा। यह एक रटा-रटाया नाटक है, जिसकी पटकथा में सिर्फ़ किरदारों के नाम बदलते हैं, पर अंत हमेशा करुण ही होता है।
और फिर शुरू होता है संवेदनाओं का सरकारी लिफ़ाफ़ा। मुख्यमंत्री से लेकर स्थानीय विधायक तक, सब एक-दूसरे से आगे निकलकर “गहरे दुख” और “शोक संतप्त परिवारों के प्रति सांत्वना” व्यक्त करते हैं। कुछ मुआवज़े का ऐलान होता है, कुछ जाँच समितियों का गठन, और फिर सब अगले हादसे का इंतज़ार करने लगते हैं, मानो यह हमारे सामूहिक जीवन का एक अपरिहार्य हिस्सा हो।
कभी सड़कों के डिज़ाइन में ख़ामी, कभी ओवरलोडिंग, कभी चालकों की लापरवाही, कभी प्रशासनिक ढिलाई — कारण कुछ भी हों, नतीजा एक ही है: बेक़सूर लोगों की जान। क्या कभी किसी अधिकारी, किसी ठेकेदार, या किसी मंत्री की जवाबदेही तय हुई है, जिसके बाद ऐसी घटनाओं में कमी आई हो? या हमारी व्यवस्था इतनी मज़बूत है कि वह हर त्रासदी को आसानी से पचा लेती है?
शहर की परिधि से निकलते ही, हाईवे पर ज़िन्दगी की शर्तें बदल जाती हैं। यहाँ सुरक्षा के दावे कमज़ोर पड़ जाते हैं और क़िस्मत का खेल ज़्यादा हावी हो जाता है। उन चंद पलों में, जब आग की लपटें बेबस यात्रियों को अपनी चपेट में लेती हैं, तब विकास के खोखले वादे और सुरक्षा के दिखावटी इंतज़ाम कहाँ ग़ायब हो जाते हैं?
जलती हुई बस की राख में क्या सिर्फ़ मृत शरीर ही दफ़न हुए, या उस आम नागरिक की उम्मीदें भी, जो हर सुबह बेहतर और सुरक्षित भविष्य का ख़्वाब देखता है? यह धुआँ सिर्फ़ दुर्घटना का नहीं, बल्कि हमारी सरकारी मशीनरी की उस बेपरवाही का है, जो हर बार कुछ ज़िन्दगियों के राख होने के बाद ही थोड़ी देर के लिए नींद से जागती है। अगली बार, जब कोई एक्सप्रेसवे के उदघाटन का फीता कटेगा, तो क्या हम याद रखेंगे कि इसी तेज़ रफ़्तार पर मौत भी अपनी सवारी ढूँढती है?