जयपुर संपादकीय — 2 July 2026
तोड़फोड़ के बीच शहर में ठप हुई इंटरनेट सेवा
संपादक की राय
आज जयपुर में सूरज निकला, लेकिन हवा में एक अजीब सी खामोशी थी। या शायद खामोशी नहीं, एक दबाव था। बुल्डोज़रों की गड़गड़ाहट और धड़ाधड़ गिरती दीवारों के बीच, शहर की धमनियों में सूचना का प्रवाह रोक दिया गया था—इंटरनेट सेवाएँ ठप थीं। क्या यह संयोग था, या एक सोची-समझी रणनीति कि जब शहर के कुछ हिस्से उजड़ रहे हों, तो वहाँ की आवाज़ और तस्वीर दुनिया तक न पहुँच पाए?
अतिक्रमण हटाने की यह कवायद तो बरसों से चली आ रही है, लेकिन इस बार का अंदाज़ कुछ नया था। ‘अतिक्रमण’ शब्द अपने आप में कितना लचीला है। आज जो अवैध है, कल तक वो शायद किसी की कमाई का सहारा था, किसी की पहचान का टुकड़ा। और ये ‘अवैध’ इमारतें रातों-रात तो नहीं उग गईं, इनकी बुनियाद के पीछे भी सरकारी सुस्ती या किसी अदृश्य हाथ की मेहरबानी का इतिहास रहा होगा।
जयपुर विकास प्राधिकरण के साथ पुलिस की मौजूदगी सिर्फ़ कानून-व्यवस्था बनाए रखने की नहीं थी, वह तो ‘पर्यवेक्षण’ कर रही थी। यानी, हर टूटते ईंट, हर उजड़ते घर की मूक साक्षी। जिस शहर में हर छोटी बात पर हंगामा होता है, वहाँ इतनी बड़ी तोड़फोड़ और इंटरनेट बंद होने पर कोई आवाज़ न उठे, यह अपने आप में एक संदेश है। कैसा संदेश?
इंटरनेट सेवा ठप करना कोई मामूली बात नहीं। यह लोकतंत्र में संवाद की नसें काटने जैसा है। क्या डर था? क्या इतने बड़े ‘विकास’ कार्य को खुली बहस और लोगों की प्रतिक्रिया से बचाना ज़रूरी था? या प्रशासन को पता था कि जो हो रहा है, उसे दिन के उजाले में देखना और सुनना कोई नहीं चाहेगा, इसलिए रात के अंधेरे में नहीं, बल्कि ‘डिजिटल अंधेरे’ में काम निपटाया गया।
यह कैसी स्वच्छता अभियान है, जिसमें लोगों के गले घोंट दिए जाते हैं? सड़कों को चौड़ा करना, शहर को सुंदर बनाना – ये सब अच्छी बातें हैं, लेकिन क्या इसकी क़ीमत नागरिकों की आवाज़ और उनके भरोसे को कुचलकर चुकानी होगी? क्या गुलाबी शहर को सचमुच ‘पिंकवॉश’ किया जा रहा है, ताकि अंदर की बदरंग सच्चाई किसी को दिख न पाए?
जिन लोगों के घर या रोज़गार उजड़े हैं, उनके पास न तो कोई मंच है अपनी बात कहने का, न कोई ज़रिया मदद मांगने का। सोशल मीडिया की दीवारें सूनी पड़ी हैं, फ़ोन पर बात करने का मतलब भी सीमित है। उन्होंने कहाँ जाना है, कैसे अपनी आगे की ज़िंदगी शुरू करनी है, ये सवाल कहीं हवा में गुम हो गए हैं, ठीक उसी तरह जैसे उनके मकानों का मलबा हवा में घुल रहा है।
पहले भी अतिक्रमण हटे हैं, सड़कें बनी हैं, लेकिन यह ‘डिस्प्ले ऑफ पावर’ का एक नया अध्याय है। यह सिर्फ़ कुछ अवैध निर्माणों को हटाने का मामला नहीं, यह एक पूरे सिस्टम की तानाशाही प्रवृत्ति का संकेत है, जहाँ सरकार अपनी मर्ज़ी से काम करती है और नागरिक मात्र दर्शक बनकर रह जाते हैं – और वो भी ऐसे दर्शक जिनके पास टीवी का रिमोट भी नहीं है।
क्या यही हमारा ‘स्मार्ट सिटी’ का सपना है, जहाँ तकनीक का इस्तेमाल नागरिकों को सशक्त करने की बजाय, उन्हें चुप कराने के लिए हो? अगर ‘सुशासन’ का मतलब यही है कि अपनी सहूलियत के लिए जनता की आवाज़ बंद कर दी जाए, तो फिर हमें किस तरह के शहर की ओर बढ़ रहे हैं, यह सोचना पड़ेगा। जवाब शायद खामोश हवा में ही कहीं छिपा है, जिसे अब कोई सुन नहीं पाएगा।