जयपुर संपादकीय

कृषि विभाग अधिकारियों की गाड़ी से ढाई लाख बरामद

संपादक की राय

आज सुबह, जयपुर की गुलाबी सड़कों पर एक और नाटक मंचित हुआ। एंटी करप्शन ब्यूरो ने कृषि विभाग के अधिकारियों की गाड़ी से ढाई लाख से ऊपर की नकदी बरामद की। यह कोई खबर है, या हर सुबह का सामान्य रूटीन? क्या यह पैसा किसी चाय वाले की रेहड़ी से निकला, या सड़क पर बिखरा पड़ा था? नहीं, यह ‘अधिकारियों’ की ‘गाड़ी’ में था, और यहीं से हमारी व्यवस्था का असली चेहरा दिखाई देता है।

सवाल यह नहीं कि पैसा मिला, सवाल यह है कि यह ‘ढाई लाख’ किस ‘सेवा’ का मोल था? क्या कृषि विभाग के दरवाज़े पर आने वाले हर किसान को अब पता है कि उसकी फ़ाइल की गति, उसकी अर्ज़ी का वज़न, इसी ‘अतिरिक्त शुल्क’ से तय होता है? यह सरकारी दफ्तर नहीं, बाज़ार है, जहाँ हर काम की एक अलिखित दर तय है और ईमानदार आदमी अपने काम के लिए भी ठगा जाता है।

और विभाग भी कौन सा — कृषि! जहाँ अन्नदाता पहले से ही आसमान और ज़मीन के बीच फंसा है, कभी सूखे से तो कभी बाढ़ से, वहाँ उसके अधिकारों पर बैठी व्यवस्था भी जेब तराशने में लगी है। क्या किसी अधिकारी ने सोचा होगा कि एक किसान, जो अपनी फसल को बेचने के लिए हज़ार जतन करता है, उसकी मेहनत का एक हिस्सा इस ‘नकद प्रवाह’ में बह जाता है?

अब इस पर बड़ी-बड़ी बातें होंगी। ‘ज़ीरो टॉलरेंस’ के दावे होंगे, ‘कठोर कार्रवाई’ की घोषणाएं होंगी। लेकिन हर बार सिर्फ़ एक मोहरा पकड़ा जाता है, और खेल वहीं का वहीं चलता रहता है। यह कोई इक्का-दुक्का मछली नहीं, पूरा तालाब ही मैला हो चुका है। एसीबी मछली पकड़ती है, और पीछे से नया पानी भर दिया जाता है, या शायद पानी साफ़ करने की कोशिश ही नहीं की जाती।

जयपुर, जिसे गुलाबी नगर कहा जाता है। एक तरफ़ महल, हवेलियाँ और पर्यटन की चमक। दूसरी तरफ़, सरकारी दफ़्तरों की ये बदरंग दीवारें, जहाँ हर फाइल के पीछे एक ‘अदृश्य हाथ’ चलता है। क्या गुलाबी रंग सिर्फ़ पत्थरों पर है, या हमारे शहर की सोच भी इतनी ही खोखली हो चुकी है कि हम इस दिखावे के पीछे की गंदगी को अनदेखा करते रहते हैं?

तो क्या करें आम नागरिक? क्या हर छोटे-से-छोटे काम के लिए पहले ये ‘मोलभाव’ सीखे? क्या वो हर बार अपनी ज़मीर और अपनी जेब के बीच कोई एक चुने? सवाल यह नहीं कि भ्रष्टाचार पकड़ा गया, सवाल यह है कि यह हमारी ज़िंदगी का इतना अभिन्न अंग क्यों बन गया है कि अब हमें इसकी ख़बरें भी चौंकाती नहीं, सिर्फ़ सिर हिलाने पर मजबूर करती हैं।

कब तक इसी ‘पकड़म-पकड़ाई’ का खेल चलता रहेगा? कब तक ये सरकारी गाड़ियाँ, जनता के पैसे से भरी हुई, बिना किसी भय के सड़कों पर दौड़ती रहेंगी? शायद हमें इस बात की आदत डाल लेनी चाहिए कि ये सिर्फ़ ‘रिश्वत’ नहीं, यह ‘सेवा शुल्क’ है, जिसका भुगतान हमारे शहर की हर सांस में शामिल है, और जिस पर कोई सवाल नहीं करता।