जयपुर संपादकीय

पहली बौछार में धँसी टोंक रोड, खुली विकास की पोल

संपादक की राय

जयपुर की ‘गुलाबी रंगत’ को आज काले आसमान से मिली पहली बौछार ने एक नई पहचान दी है— एक गहरा, बेढब गढ़ा। टोंक रोड, जो शहर की रीढ़ मानी जाती है, अपनी ही ज़मीन में धँस गई। यह सिर्फ़ एक सड़क का ढहना नहीं, जनाब, यह हमारे ‘विकास’ के खोखले दावों की नींव का सरकना है। क्या यही है उस स्मार्ट सिटी का चेहरा, जहाँ की सड़कें बारिश के पहले ही इम्तिहान में दम तोड़ देती हैं?

यह कोई पहला वाकया नहीं। हर साल मानसून अपनी पहली दस्तक के साथ, हमारे ‘अत्याधुनिक’ इंफ्रास्ट्रक्चर की पोल खोलने की रस्म पूरी करता है। कभी सीवर लाइन बैठ जाती है, कभी फुटपाथ गायब हो जाता है, और कभी पूरा का पूरा डामर पानी में घुल जाता है। गुलाबी नगर को ‘स्मार्ट’ बनाने की घोषणाएँ तो कागज़ पर शानदार दिखती हैं, पर ज़मीन पर ये गढ़े, ये धँसे हुए रास्ते, उन दावों का मज़ाक उड़ाते हैं।

सवाल यह नहीं कि सड़क क्यों धँसी। सवाल यह है कि इसे बनाया किसने था और किस ‘गुणवत्ता नियंत्रण’ के तहत? वे इंजीनियर कहाँ हैं, वे ठेकेदार कहाँ हैं, जिन्होंने इस सड़क को बनाने का ‘पुण्य’ कमाया था? या फिर, यह सारा खेल कमीशनखोरी की उस स्याही से लिखा गया था, जहाँ घटिया सामग्री और भ्रष्ट मिलीभगत ही निर्माण का असली मसाला होती है? कागज़ों पर तो सारे मापदंड पूरे हुए होंगे, और हर भुगतान ‘नियमों के अनुसार’ हुआ होगा।

सुबह-सुबह काम पर निकले हज़ारों लोग, जो इस विशालकाय गढ़े के सामने आकर ठिठक गए, उनकी फजीहत कौन गिनेगा? घंटों का जाम, स्कूल के बच्चों की देरी, अस्पतालों तक पहुँचने में अड़चनें— ये सब हमारे दैनिक जीवन का हिस्सा बन चुके हैं। हम एक ऐसी सभ्यता में जी रहे हैं, जहाँ सुविधा के नाम पर हमें हर दिन असुविधाएँ परोसी जाती हैं, और हम इन्हें अपनी नियति मानकर स्वीकार कर लेते हैं। क्या हम इतने अभ्यस्त हो गए हैं कि अब सड़क का ज़मीन में धँस जाना भी हमें चौंकाता नहीं?

बड़े-बड़े बजट आवंटित होते हैं, परियोजनाओं की आधारशिला रखी जाती है, फीते काटे जाते हैं और अख़बारों में रंगीन तस्वीरों के साथ विकास गाथाएँ छपती हैं। पर जब एक छोटी सी बारिश उस सारी भव्यता को मिट्टी में मिला देती है, तो क्या कोई पूछता है कि जनता के वो लाखों-करोड़ों रुपए आखिर किस ज़मीन में धँस गए? या फिर, विकास सिर्फ़ फाइलों और मंत्रियों के भाषणों तक ही सीमित है, और ज़मीनी हकीकत का इससे कोई वास्ता नहीं?

अब वही पुरानी कहानी दोहराई जाएगी। पहले बारिश को दोष दिया जाएगा, फिर ‘अनदेखी तकनीकी खामी’ का राग अलापा जाएगा। एक उच्च-स्तरीय जाँच कमेटी बैठेगी, जिसकी रिपोर्ट शायद ही कभी रोशनी देखेगी। और अंत में, ‘दोषियों के ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई’ का ऐसा आश्वासन मिलेगा, जिसकी हवा अगले मानसून तक निकल चुकी होगी। यह एक ऐसा नाटक है, जिसका अंत हम सब जानते हैं, और फिर भी हर साल टिकट लेकर देखने चले आते हैं।

तो क्या यही हमारी नियति है? कि हर साल हम अपनी सड़कों को बनते और धँसते देखेंगे, और इस पर बस कंधा उचका देंगे? कब तक हम उन ‘विकास’ के गढों को भरते रहेंगे, जो भ्रष्टाचार की नींव पर खड़े होते हैं? यह सिर्फ़ टोंक रोड का एक टुकड़ा नहीं धँसा है, यह हमारे शहर के भविष्य में एक और सवालिया निशान धँसा है। इसका जवाब देने वाला कौन है? या फिर, हम बस अगली बारिश का इंतज़ार करें, जब कोई और सड़क अपनी किस्मत पर रोएगी?