जयपुर संपादकीय

विदेश जाने के सपने का स्याह पहलू

संपादक की राय

अमेरिका की चमकती तस्वीरें, हॉलीवुड के सपने और डॉलर की खनक… जयपुर के हर मध्यमवर्गीय घर में आज भी एक सपना पल रहा है – किसी भी तरह विदेश जाकर ‘सेट’ हो जाना। लेकिन ज़रा ठहरिए, क्या हमने उस सपने का दूसरा पहलू देखा है? एक ऐसा स्याह सच, जहाँ अमेरिकी धरती पर भारतीयों के लिए ‘सपना’ अक्सर ‘दुःस्वप्न’ में बदल जाता है।

सरकारी विज्ञापनों में जब प्रवासी भारतीयों की सफ़लता और गौरवशाली गाथाओं का गुणगान होता है, तब क्या उन 141 जिंदगियों का हिसाब भी रखा जाता है, जो 2021 से 2025 के बीच केवल अमेरिका में मौत के मुँह में समा गईं? ये वो आँकड़े हैं, जो चमकीली सुर्खियों के पीछे दफ़्न हैं, और जिनकी जाँच अक्सर ‘अधूरे कागज़’ या ‘लापता सबूत’ की भेंट चढ़ जाती है।

निकिता गोडिशला के मामले में न्याय की तलाश हो या मोहम्मद अब्दुल अरफ़ात की रहस्यमयी मौत, जहाँ फिरौती की कॉल के बाद एरी झील में उसका शव मिला – हर घटना एक चीख है, जो सत्ता के गलियारों तक पहुँचते-पहुँचते दम तोड़ देती है। क्या इन परिवारों के लिए, जिनके बच्चे एक बेहतर भविष्य की आस में परदेस गए थे, उनकी अपनी सरकार का कोई दायित्व नहीं बचता?

हम यहाँ ‘विश्वगुरु’ बनने के दावे करते हैं, ‘भारत जोड़ो’ और ‘विश्वास जगाओ’ जैसे नारे बुलंद करते हैं। लेकिन जब हमारे अपने नागरिक, चाहे वे देश के भीतर हों या सात समंदर पार, असहाय और असुरक्षित महसूस करें, तो यह ‘विश्वगुरु’ की छवि कहाँ जाकर टिकती है? क्या हमारी संवेदनाएँ सीमाओं में बँधकर रह गई हैं, और केवल राजनीतिक लाभ वाले मामलों में ही जागृत होती हैं?

गुलाबी नगर में बैठे कई माँ-बाप, जिन्होंने अपनी गाढ़ी कमाई और पुश्तैनी ज़मीनें बेचकर बच्चों को परदेस भेजा है, उनकी रातों की नींद अब हराम हो चुकी होगी। हर फ़ोन की घंटी, हर विदेशी ख़बर, एक अनजाने डर को जन्म देती है। क्या यह सिर्फ़ ‘उनके’ बच्चों की कहानी है, या यह हमारी सामूहिक विफलता का एक और प्रमाण है कि हम अपने नागरिकों की हिफ़ाज़त तक नहीं कर सकते?

आज भी अखबारों के पन्ने रंगीन विज्ञापनों से अटे हैं, जो विदेश में पढ़ाई और नौकरी के सुनहरे अवसर दिखाते हैं। क्या इन विज्ञापनों के नीचे कहीं एक छोटी सी चेतावनी नहीं होनी चाहिए – ‘सतर्क रहें, आपका सपना आपकी जान का दुश्मन भी बन सकता है, और आपकी सरकार शायद आपको ढूँढने भी न आए’?

जब न्याय की पुकार अनसुनी हो जाए, और सरकारें केवल चुनाव या अपनी ‘उपलब्धियों’ का ढोल पीटने में व्यस्त रहें, तब एक सवाल उठता है – क्या वाकई किसी भारतीय जीवन का कोई मोल है? या फिर ‘विदेश में मरना’ भी एक ऐसी नियति बन गई है, जिस पर सिर्फ़ कंधा झुकाकर आँसू बहाए जा सकते हैं, और फिर अगले ‘विकास के दावे’ पर मुहर लगाई जा सकती है?