जयपुर संपादकीय

₹503 करोड़ के स्कूल मरम्मत घोटाले की पोल

संपादक की राय

आज जब गुलाबी शहर की सुबह अपनी सामान्य आपाधापी में खोई थी, तब एक ख़बर ने कान खड़े कर दिए। सुना है, ₹503 करोड़ की लागत से हमारे विद्यालयों की मरम्मत का ठेका हुआ था। मरम्मत! यह शब्द अब इस देश में किसी ठिठोली से कम नहीं लगता। उन स्कूलों की तस्वीरें बताती हैं कि दीवारों में दरारें रंग से भर दी गईं, और छत आधी टूटी छोड़ दी गई। क्या यह हमारे नौनिहालों के भविष्य की नींव है, या भ्रष्टाचार की एक और इमारत, जिस पर सरकारी लीपापोती का पेंट चढ़ा है?

यह कोई मामूली हिसाब-किताब की चूक नहीं, यह तो समूचे सरकारी तंत्र के माथे पर लगा ऐसा काला टीका है, जिसे कोई गंगाजल भी धो नहीं सकता। ₹503 करोड़। ज़रा कल्पना कीजिए, इस धन से कितने बच्चों को अच्छी शिक्षा मिल सकती थी, कितनी बेहतर प्रयोगशालाएं बन सकती थीं, कितने पुस्तकालयों में ज्ञान की रोशनी फैल सकती थी। पर नहीं, यहां तो हमारे भविष्य के कर्णधारों को सिखाया जा रहा है कि कैसे दीवारों पर पलस्तर के बजाय सिर्फ़ रंग-रोगन करके वास्तविकता को छुपाया जाता है।

कहने को ‘शिक्षा का मंदिर’ है, लेकिन इस मंदिर की छतें टपक रही हैं, दीवारें धंस रही हैं। और इसे ठीक करने के लिए जो पैसा आया, वह भी ऐसे ही लील लिया गया, जैसे कोई दीमक भीतर से लकड़ी को खोखला कर दे। क्या अधिकारियों ने इन “मरम्मत” कार्यों का निरीक्षण नहीं किया? या उनकी आँखें भी ठेकेदारों के कमीशन के रंगीन चश्मे से ढकी थीं? यह सवाल नहीं, यह तो एक नग्न सत्य है, जिसे सब जानते हैं, फिर भी सब चुप हैं।

वह ‘ड्रोन इमेजरी’ की बात भी दिलचस्प है। क्या ड्रोन इसलिए लगाए गए थे कि वे भ्रष्टाचार की हवाई तस्वीरें लें, या इसलिए कि ऊपर से सब ‘सही’ दिखे, जबकि नीचे ज़मीन पर सब कुछ सड़ रहा हो? शायद ये सरकारी बाबू और ठेकेदार सोचते हैं कि जनता की आँखें भी उतनी ही संकुचित हैं, जितनी उनकी अपनी जेबें। उन्हें लगता है कि कुछेक तस्वीरें बदल देने से या कुछ कागज़ों पर दस्तख़त कर देने से सच बदल जाएगा।

हमारा शहर, जो अपनी शिक्षा और संस्कृति के लिए जाना जाता था, आज हर रोज़ ऐसे किस्सों का गवाह बनता है, जहां सरकारी धन को लूटने की स्पर्धा चलती है। चाहे वह सड़कें हों, पुल हों या अब स्कूल। हर जगह एक ही कहानी, बस किरदार और रकम बदल जाते हैं। यह कोई इक्का-दुक्का घटना नहीं, यह तो एक सुनियोजित व्यापार है, जिसका बाज़ार सरकारी खज़ाना है और ग्राहक हम जैसे करदाता।

यह सिर्फ़ पैसों की चोरी नहीं है, यह बच्चों के सपनों की हत्या है। उन गरीब परिवारों के बच्चों की, जो सरकारी स्कूलों को ही अपना एकमात्र सहारा मानते हैं। जब स्कूल की इमारत ही असुरक्षित हो, तो किस भरोसे पर वे अपने बच्चों को वहां भेजेंगे? क्या हम उन्हें यह सिखाना चाहते हैं कि व्यवस्था ऐसे ही काम करती है, और चुपचाप सब सह लेना ही एकमात्र रास्ता है?

तो फिर, जवाबदेही किसकी है? उन मंत्रियों की, जो बड़ी-बड़ी बातें करते हैं? उन अफ़सरों की, जो फ़ाइलों पर धूल जमाते हैं? या उस ठेकेदार की, जिसने आधे-अधूरे काम को ‘पूरा’ बता दिया? या शायद हम सबकी, जो यह सब देखते हैं, जानते हैं और फिर भी अगली खबर का इंतज़ार करते हैं। क्या यही हमारा नया राजस्थान है, जहां नींव कमजोर हो और इमारत सिर्फ़ कागज़ पर बुलंद हो?