जयपुर संपादकीय

फर्जी पर्चियों से शिक्षा विभाग में 503 करोड़ का घोटाला

संपादक की राय

पांच सौ तीन करोड़ रुपए। सिर्फ कागज़ की कुछ पर्चियों ने सरकारी तिजोरी से इतनी बड़ी रकम का रास्ता काट लिया, और यह सब हुआ शिक्षा विभाग में। विडंबना देखिए, जिस तंत्र पर स्कूलों की निगरानी का दारोमदार था, वही इन पर्चियों को थामे बैठा था, जैसे वह कोई पवित्र विधान हो। अब कोई बताए कि ‘निगरानी’ शब्द का नया अर्थ क्या निकाला जाए, जब रखवाला ही सेंध लगाने वालों का सरगना बन जाए?

यह तो उस व्यवस्था का खुला खेल है, जहाँ नियम बनाने वाले ही नियमों की आड़ में खेल रचते हैं। उन शिक्षा मॉनिटरिंग स्टाफ की कलाई पर घड़ी बांधकर उन्हें विद्यालयों की गुणवत्ता सुधारने भेजा गया था, लेकिन उनकी आँखों पर तो नोटों की पट्टी बंधी थी। कागज़ की रद्दी के बराबर भी मूल्य न रखने वाली पर्चियों ने जब करोड़ों की हस्ती बना ली, तो फिर भला कौन कहेगा कि ईमानदारी की कीमत नहीं होती?

क्या यह महज कागज़ी खेल था, या फिर उससे भी बढ़कर, एक सुनियोजित साजिश? वह कौन सी अदृश्य शक्ति थी जो इन मॉनिटरिंग स्टाफ के पीछे खड़ी थी, जिसने उन्हें इतनी छूट दी कि वे बेखौफ होकर इस ‘पर्ची-पुराण’ को अंजाम देते रहे? गुलाबी नगर के गलियारों में ऐसी कथाएं नई नहीं हैं, जहाँ छोटे मोहरे अक्सर बड़े खिलाड़ियों की बिसात पर चलते हैं।

पाँच सौ तीन करोड़। ज़रा सोचिए, यह रकम उन लाखों बच्चों के लिए क्या कुछ नहीं कर सकती थी, जिन्हें आज भी टूटी छतों और बिना किताबों के भविष्य गढ़ना पड़ता है। कितने नए स्कूल बन सकते थे, कितने शिक्षकों को बेहतर प्रशिक्षण मिल सकता था, कितने गरीब बच्चों को पोषण मिल सकता था। लेकिन नहीं, यह धन तो पर्चियों के ज़रिए कुछ मुट्ठीभर लोगों की तिजोरियों में चला गया, और हमारे बच्चों का भविष्य फिर से अंधेरे में धकेल दिया गया।

यह सिर्फ एक घोटाला नहीं, यह उस भरोसे की हत्या है जो एक नागरिक अपने सरकारी तंत्र पर रखता है। जब शिक्षा जैसे मूलभूत क्षेत्र में भी ऐसी लूट मचे, तो फिर किस बात पर विश्वास किया जाए? क्या हम यह मान लें कि हमारे बच्चों की पढ़ाई भी अब कुछ भ्रष्ट अधिकारियों के हाथों की कठपुतली बन चुकी है, जिसके धागे दिल्ली और जयपुर के अनाम कोनों से खींचे जा रहे हैं?

हर बार यही होता है। कोई नया घोटाला सामने आता है, सुर्खियाँ बनती हैं, कुछ गिरफ्तारियाँ होती हैं, और फिर सब शांत। अगले चुनाव तक जनता की याददाश्त से यह मिट जाता है, और फिर कोई नया ‘पर्ची-घोटाला’ तैयार हो जाता है। यह अब हमारी आदत बन चुकी है – हर नए घोटाले को पुराने की धुंधली याद की तरह देखना।

सवाल यह नहीं कि यह घोटाला हुआ कैसे, सवाल यह है कि इसे होने दिया क्यों गया? और सबसे बड़ा सवाल यह कि क्या अब भी कोई उम्मीद बची है कि किसी दिन शिक्षा के नाम पर होने वाली यह लूट सचमुच बंद होगी, या हम बस यूँ ही कागज़ की पर्चियों से अपने बच्चों का भविष्य बिकते देखते रहेंगे?