जयपुर संपादकीय

भ्रामक लेबल वाली हज़ारों ऊर्जा पेय बोतलें ज़ब्त

संपादक की राय

आज जयपुर के बाजार से हज़ारों ऊर्जा पेय की बोतलें जब्त हुई हैं। यह सिर्फ़ बोतलों का ढेर नहीं, यह हमारी आँखों पर पड़ी पट्टी का सच है। तिरेपन हज़ार दो सौ छप्पन! इतनी बोतलें एक साथ पकड़ी गईं, तो सवाल उठता है कि कितनी पी जा चुकी होंगी? कितने जयपुरवासी ‘ऊर्जा’ के नाम पर सिर्फ़ धोखे का घूँट पी रहे थे, और कितने समय से? क्या हमारे तंत्र को यह सब तब तक नहीं दिखता, जब तक कि वह खुद ही आँखों में उँगली डालकर न दिखाया जाए?

इन बोतलों पर दावे थे ऊर्जा के, शायद स्फूर्ति के, या किसी जादुई तत्व के। मगर उनके अंदर था क्या, जिस पर ‘भ्रामक लेबल’ का ठप्पा लगा? यह महज़ एक गलत जानकारी नहीं है; यह उपभोक्ता के विश्वास का सीधा-सीधा हनन है। जब हर चमकती चीज़ सोना नहीं होती, तो हर रंगीन बोतल ‘ऊर्जा’ कैसे हो सकती है? यह कैसी व्यवस्था है जहाँ खुलेआम धंधे के नाम पर ज़हर बेचने की तैयारी हो, और हम जागें तब, जब गोदामों में पहाड़ खड़े हो जाएं?

खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण जैसे नाम हमारे शहरों में सिर्फ़ दफ़्तरों की शान बढ़ाते हैं या फाइलों में सिमट कर रह जाते हैं? जयपुर की गुलाबी सड़कों पर घूमते हुए शायद ही कोई सोचता होगा कि उसकी अगली ‘ऊर्जा’ की खुराक सिर्फ़ एक बोतल भर मीठा पानी नहीं, बल्कि किसी शातिर दिमाग का छलावा हो सकती है। यह कैसी निगरानी है, जो हज़ारों की गिनती में बोतलों के बनने, बाज़ार तक पहुँचने और बिकने से पहले नहीं बल्कि बाद में हरकत में आती है?

इस खेल में सिर्फ़ उत्पादक दोषी नहीं है। वह जानता है कि इस देश में कुछ भी बिक सकता है, बशर्ते उसे सही पैकेजिंग और सही जुमलों के साथ परोसा जाए। जब तक पकड़ में नहीं आते, तब तक मुनाफा ही मुनाफा। और जब पकड़े गए? तब शायद जुर्माना, हल्की-फुल्की कार्रवाई, और फिर किसी और नाम से, किसी और बोतल में, वही पुराना धंधा। क्या यह हमारे कानूनी तंत्र की लचर चाल नहीं है जो ऐसे अपराधियों को बार-बार आज़माने का मौका देती है?

गुलाबी शहर की रंगीनियत के पीछे यह काली सच्चाई है कि यहाँ हर वो चीज़ आसानी से मिल जाती है जो दिखती कुछ और है, होती कुछ और है। फिर चाहे वो सत्ता के गलियारों में लुभावने वादे हों या बाज़ार में बिकते ‘स्वास्थ्यवर्धक’ पेय। हम कब तक इस ढोंग को बर्दाश्त करते रहेंगे? क्या हमारी संवेदनशीलता इतनी गहरी नींद में सो चुकी है कि जब तक कोई बड़ी त्रासदी न हो, हम आँखें नहीं खोलते?

यह सिर्फ़ ऊर्जा पेय का मामला नहीं है। यह उन सभी नकली उत्पादों, मिलावटी खाद्य पदार्थों और झूठे विज्ञापनों का एक छोटा सा नमूना है जो हमारी थालियों, हमारी अलमारियों और हमारे जीवन में चुपचाप जगह बनाते जा रहे हैं। आज 53,256 बोतलें पकड़ी गईं, कल कोई और संख्या होगी। लेकिन क्या यह संख्या हमें यह सोचने पर मजबूर करेगी कि कितने और ‘भ्रामक लेबल’ हमारी सेहत और हमारी जेब पर डाका डाल रहे हैं? या हम फिर से अगली खबर का इंतज़ार करेंगे, और तब तक इस ‘ऊर्जा’ का कड़वा घूँट पीते रहेंगे?