जयपुर संपादकीय

जयपुर: नौकरी की ख़ातिर, माँ की हत्या

संपादक की राय

जयपुर अब सिर्फ़ गुलाबी पत्थरों और शांत गलियों का शहर नहीं रहा, जहाँ परदेसी पर्यटकों को ‘अतिथि देवो भव’ का पाठ पढ़ाया जाता है। अब यह वह जगह भी है जहाँ एक 23 साल की बेटी अपनी ही माँ की हत्या की साज़िश रचती है, और वजह? एक सरकारी नौकरी और ज़मीन-जायदाद। क्या यह सिर्फ़ एक ख़बर है या हमारे तथाकथित सभ्य समाज के गले में फँसा कोई काँटा?

इस वाक़ये को सुनकर रूह काँप उठती है। माँ जिसने जन्म दिया, पाला-पोसा, उसी की जान लेने की योजना, वह भी किसी ज़ायदाद या नौकरी के लिए? यह कौन सा मूल्य-पतन है जो युवा पीढ़ी को इस स्तर तक गिरा देता है कि माँ की ममता भी एक ‘डील’ के आगे कुछ नहीं?

जिस सरकारी नौकरी के लिए युवा सड़कों पर लाठियाँ खाते हैं, सालों तक रात-दिन एक करके पढ़ाई करते हैं, उसी नौकरी का आकर्षण अब इतना विकृत हो गया है कि वह ‘जीवन’ और ‘संबंध’ की परिभाषा ही बदल दे? यह उस व्यवस्था पर सबसे बड़ा सवाल है, जो नौकरी को सुरक्षा और सम्मान का ऐसा पर्याय बना देती है कि उसके लिए कोई भी क़ीमत चुकाई जा सकती है।

गुलाबी शहर के चमकते बाज़ारों और पुरानी हवेलियों की आड़ में पल रहा यह स्याह सच डरावना है। एक तरफ़ हम ‘परिवार’ और ‘संस्कार’ की दुहाई देते हैं, दूसरी तरफ़ एक बेटी अपनी माँ की लाश बिछाकर ख़ुद के लिए एक नया भविष्य गढ़ने का सपना देखती है। क्या हमारी शिक्षा प्रणाली, हमारा सामाजिक ढाँचा, इस विकृति के लिए ज़िम्मेदार नहीं?

यह सिर्फ़ एक ‘मनोरंजक’ अपराध की कहानी नहीं है। यह एक गंभीर बीमारी का लक्षण है, जो हमारे सामाजिक ताने-बाने को अंदर ही अंदर खा रही है। जहाँ रिश्ते अब भावनात्मक डोर से नहीं, बल्कि दस्तावेज़ों और बैंक खातों से तय होते हैं। माँ-बाप अब विरासत और भविष्य की कुंजी भर हैं।

सवाल सिर्फ़ उस बेटी पर नहीं है, सवाल उस समाज पर भी है जो ऐसे कृत्य को पैदा होने देता है। उस अंधी दौड़ पर सवाल है जहाँ सरकारी पद पा लेना ही जीवन का परम लक्ष्य बन गया है। जब हर सुबह अख़बार पन्ने पलटते हुए हमें ऐसी ख़बरे पढ़ने को मिलें, तो समझ लीजिये कि शहर की आत्मा पर जंग लगने लगी है।

सरकारी नौकरी और ज़ायदाद की लालसा ने एक माँ की जान ले ली। क्या इस लालसा को हवा देने वाली हमारी ही बेतरतीब व्यवस्था पर हम कभी उंगली उठाएंगे? या अगली बार तक, हम सिर्फ़ एक नए ‘शॉकिंग मर्डर’ का इंतज़ार करेंगे, और फिर उसे भूल जाएंगे?