जयपुर संपादकीय

जयपुर की एक छात्रा, कैमरा और एक खामोश मौत

संपादक की राय

सीसीटीवी फुटेज। एक यंत्र। बेजुबान। जिसने वह सब कुछ रिकॉर्ड किया, जो किसी आँख को दिखना चाहिए था, किसी कान को सुनना चाहिए था, किसी हाथ को रोकना चाहिए था। गुलाबी नगर की एक प्रतिष्ठित पाठशाला, उसकी चकाचौंध भरी दीवारें और उसके भीतर एक नौ साल की बच्ची की बेबसी। कैमरे ने देखा, दुनिया ने अब देखा, लेकिन उस पल में, उस पवित्र शिक्षण संस्थान में कोई क्यों नहीं देख पाया?

यह सिर्फ एक छात्रा की आत्महत्या नहीं, यह उस व्यवस्था का चीख़ता हुआ सच है, जहाँ ‘शिक्षा’ के नाम पर मोटी फीसें वसूली जाती हैं, भव्य इमारतें खड़ी की जाती हैं, लेकिन बच्चों की सुरक्षा और मानसिक स्वास्थ्य को दीमक की तरह चाटने वाली हिंसा पर पर्दा डालने की कोशिश की जाती है। वे शिक्षक, वे प्राचार्य, वे स्टाफ कहाँ थे जब ‘अमाइरा’ बार-बार मदद माँग रही थी? क्या उनकी आँखों पर सिर्फ पाठ्यक्रम और फीस की पट्टी बंधी थी?

माता-पिता अपने कलेजे के टुकड़े को, विश्वास की गठरी बांधकर इन संस्थानों के हवाले करते हैं। उन्हें लगता है कि उनके बच्चे इन चारदीवारी के भीतर सुरक्षित हैं, भविष्य गढ़ रहे हैं। लेकिन जब यही चारदीवारी एक बच्ची की क़ब्रगाह बन जाए, तो उस विश्वास का क्या? क्या अब हर अभिभावक को अपने बच्चे के स्कूल में एक जासूस बैठाना पड़ेगा, या हर कमरे में एक सीसीटीवी कैमरा लगाना पड़ेगा ताकि उनके बच्चों की ज़िंदगी को सुरक्षा मिल सके?

यह अकेला मामला नहीं है, यह एक प्रवृत्ति है। ‘बच्चों का झगड़ा है’, ‘थोड़ा बहुत तो चलता है’, ‘इतना तो बच्चे करते ही हैं’ — ऐसी ही न जाने कितनी बातें कहकर बचपन की क्रूरता को अनदेखा किया जाता है। यह सिर्फ बच्चों की हिंसा नहीं, यह उस समाज की सामूहिक उदासीनता है जो ‘बुलिंग’ को तब तक गंभीरता से नहीं लेता, जब तक कि वह एक हेडलाइन न बन जाए, एक लाश न बन जाए। तब तक सब तमाशा देखते रहते हैं।

जयपुर, जिसे हम शिक्षा और पर्यटन का केंद्र कहते हैं, उसकी चमक के पीछे ऐसी कितनी अमाइराएँ दम तोड़ रही होंगी? गुलाबी शहर की इस दोहरी ज़िंदगी में, जहाँ एक तरफ़ आधुनिकता की बातें होती हैं, वहीं दूसरी तरफ़ मानवीय संवेदनाएँ इतनी कुंद हो चुकी हैं कि एक नौ साल की बच्ची की आँखों में दिख रहा डर भी किसी को नहीं दिखता। यह कैसा विकास है, जो आत्मा को ही मार दे?

अब जाँच होगी। लीपापोती की कोशिशें होंगी। कुछ लोगों को निलंबित किया जाएगा, कुछ बयानबाज़ी होगी। फिर एक और ‘जाँच समिति’ बनेगी, जिसकी रिपोर्ट शायद धूल खाएगी। और हम सब, अगली बड़ी खबर का इंतजार करते रहेंगे, जब तक कि कोई और अमाइरा, किसी और शहर में, किसी और स्कूल में, हमारी सामूहिक चेतना पर एक और थप्पड़ न जड़ दे।

सवाल सिर्फ यह नहीं कि सीसीटीवी फुटेज ने क्या दिखाया, सवाल यह है कि उन आँखों का क्या हुआ जो कैमरे की परवाह किए बिना भी देख सकती थीं? सवाल यह नहीं कि अमाइरा क्यों कूदी, सवाल यह है कि उसे कूदने पर मजबूर करने वाले, और उसे बचाने में नाकाम रहने वाले, आज भी उसी व्यवस्था का हिस्सा क्यों हैं?

एक मासूम का जीवन, उस अदृश्य बुल्लिंग की भेंट चढ़ गया जिसे हम सालों से अनदेखा कर रहे हैं। इस असहज सत्य का सामना कौन करेगा? या हम फिर एक ‘दुर्भाग्यपूर्ण घटना’ कहकर अपनी आँखें मूँद लेंगे?