जयपुर संपादकीय — 11 July 2026
स्कूल की सीढ़ियाँ: अनसुनी गुहार का स्मारक
संपादक की राय
आज गुलाबी नगर में एक और मासूम ज़िंदगी खामोश हो गई, उस इमारत की ऊँचाई से गिरकर, जिसे हम ‘ज्ञान का मंदिर’ कहते हैं। माता-पिता कहते रहे, उनकी बेटी ने हाथ जोड़े थे, बार-बार मिन्नतें की थीं। क्या इन ईंट-पत्थरों की दीवारों में इतनी भी जगह नहीं बची कि एक बच्ची की बेबसी की आवाज़ ठहर सके? या हमने इतने डिजिटल उपकरण लगा दिए हैं कि मानवीय संवेदना के तार ही कट गए हैं?
‘मैम, मैंने ये नहीं किया।’ इस एक वाक्य को उस बच्ची ने पच्चीस मिनट में पाँच बार दोहराया। ये सिर्फ़ एक आरोप या सफाई नहीं थी, ये एक डूबते हुए व्यक्ति की आखिरी कोशिश थी, जो बचाने वाले की आँखें तलाश रहा था। लेकिन शायद हमारी ‘आधुनिक’ शिक्षा व्यवस्था में अब बच्चों की आँखों के बजाय सिर्फ़ प्रगति रिपोर्ट देखी जाती है।
जिस कक्षा में ‘डिजिटल स्लेट’ और ‘क्लास एक्सचेंज’ जैसे नवाचारों की बातें होती हैं, वहाँ एक क्लास टीचर की भूमिका इतनी गौण कैसे हो सकती है? क्या वह सिर्फ़ एक अटेंडेंस मशीन बनकर रह गया है, जिसे बच्चों की मानसिक स्थिति या उनके दर्द से कोई सरोकार नहीं? या फिर यह मान लिया गया है कि बच्चों की समस्याएँ सिर्फ़ ‘नाराज़गी’ होती हैं, जिन्हें समय के साथ भुला दिया जाएगा?
जयपुर, शिक्षा का एक बड़ा केंद्र होने का दावा करता है। यहाँ हर गली-मोहल्ले में ‘बेहतरीन भविष्य’ गढ़ने वाले स्कूलों के पोस्टर लगे हैं। लेकिन क्या इस चकाचौंध के पीछे हमने यह देखना बंद कर दिया है कि ये ‘भविष्य’ किन कंधों पर टिके हैं, और उन कंधों पर कितना बोझ है? एक तरफ़ प्रतिस्पर्धा का गलाकाट माहौल, दूसरी तरफ़ अनसुनी होती चीखें।
हर अभिभावक अपने बच्चे को स्कूल भेजते वक्त यह सोचता है कि उसने उसे सबसे सुरक्षित जगह भेजा है, जहाँ उसे ज्ञान मिलेगा और संस्कार भी। पर जब स्कूल के भीतर से ही ऐसी खबरें आती हैं, तो यह भरोसा कहाँ जाकर टिकता है? क्या अब हर माता-पिता को अपने बच्चों को स्कूल भेजते वक्त अपने सीने पर हाथ रखकर ईश्वर से दुआ करनी होगी, कि उनका बच्चा आज सुरक्षित वापस लौट आए?
यह पहला मामला नहीं है, न आखिरी होगा। हर बार हम अफ़सोस जताते हैं, कुछ दिन हंगामा होता है, और फिर सब ठंडा पड़ जाता है। स्कूल अपनी फीस बढ़ाता है, अभिभावक बच्चों पर दबाव बढ़ाते हैं, और प्रशासन ‘जाँच’ के वादे करके सो जाता है। यह एक दुष्चक्र है, जिसकी अगली शिकार का इंतज़ार हम सब खामोशी से कर रहे हैं।
सवाल सिर्फ़ उस बच्ची की मौत का नहीं है, सवाल उन सभी बच्चों की खामोश बेबसी का है जो हर दिन अपने स्कूल में अपनी पहचान, अपनी गरिमा, या अपनी छोटी सी गलती के लिए जूझते हैं। क्या हम इतने स्वार्थी हो गए हैं कि बच्चों को सिर्फ़ अपना सपना पूरा करने का जरिया मानते हैं, या उनमें एक इंसान देखना भी हमने छोड़ दिया है?
अगली बार जब कोई बच्चा अपने हाथ जोड़े, क्या उसे सुनने वाला कोई होगा? या फिर स्कूल की सीढ़ियाँ सिर्फ़ एक और अनसुनी गुहार का स्मारक बनकर रह जाएँगी?