जयपुर संपादकीय — 13 July 2026
माँ की सुपारी: रिश्तों का सात लाख का सौदा
संपादक की राय
सात लाख रुपए। गुलाबी नगरी के किसी छोटे से मकान की डाउन पेमेंट भी नहीं होती आज। लेकिन एक बेटी के लिए, अपनी जननी की साँसों का यही मोल था। जयपुर की वादियों में रिश्तों की गर्माहट कभी पहचान थी, पर अब लगता है, यहाँ हर संबंध एक व्यापार बन गया है, जिसकी कीमत चुकाई जा सकती है। यह कैसी तरक्की है, जहाँ माँ का आँचल अब सुरक्षा नहीं, बल्कि रास्ते का रोड़ा लगने लगा है?
शहर की गलियों में जहाँ हम कभी बेखौफ घूमते थे, अब एक खामोश डर का साया है। यह कोई पहला अपराध नहीं, न ही आखिरी होगा, लेकिन अपनी माँ को ठिकाने लगाने के लिए “सुपारी” देना, यह तो उन कहानियों से भी बदतर है, जिन्हें सुनकर कभी कलेजा काँप उठता था। क्या अब रिश्तों की पवित्रता सिर्फ किताबों में सिमट कर रह गई है, और हकीकत में हर गांठ को पैसों से खोला जा सकता है?
यह मामला सिर्फ एक आपराधिक घटना नहीं, यह हमारे समाज की अंदरूनी सड़न का एक भयानक चेहरा है। जिस शहर में लोग सुबह-शाम मंदिरों में जाकर देवी माँ की पूजा करते हैं, उसी शहर की एक बेटी ने अपनी जीवित माँ को “खत्म” करने का ठेका दे दिया। यह विरोधाभास किसी व्यंग्य से कम नहीं, यह हमें आईना दिखा रहा है कि हम ऊपर से क्या दिखते हैं और भीतर से क्या हो चले हैं।
क्या हमने अपनी अगली पीढ़ी को सिर्फ “क्या मिलता है” की दौड़ में धकेल दिया है? जहाँ हर चीज़ का हिसाब-किताब मुनाफे और नुकसान के तराजू पर होता है। माँ की ममता, पिता का त्याग, भाई-बहन का प्रेम—ये सब अब भावनात्मक लग्ज़री हैं, जिनकी जगह अब ठोस कैश और ज़मीन-जायदाद ने ले ली है। सात लाख! शायद इससे ज़्यादा के वारिस बनने की जल्दी थी?
सवाल सिर्फ उस बेटी पर नहीं उठता, जिसने यह जघन्य अपराध रचा। सवाल उस व्यवस्था पर भी है, जहाँ ऐसे “कॉन्ट्रैक्ट किलर” गली-कूचों में आसानी से मिल जाते हैं। क्या हमारी कानून व्यवस्था का डर इतना कम हो गया है कि कोई भी, किसी को भी, चंद रुपयों के लिए मार सकता है? या फिर कुछ ज़िंदगियाँ वाकई इतनी सस्ती हो गई हैं कि उन्हें खरीदने-बेचने में कोई हिचक नहीं होती?
यह घटना हमें सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हम एक ऐसे समाज का हिस्सा बन रहे हैं, जहाँ समस्याएं सुलझाने के बजाय उन्हें “मिटा देना” अधिक आसान लगता है? पारिवारिक झगड़े, संपत्ति विवाद, व्यक्तिगत असहमति—इन सब का अंतिम समाधान क्या अब हत्या ही है, और वो भी बाज़ार भाव पर?
जयपुर की गुलाबी शामों में जब पर्यटक घूमते हैं, उन्हें नहीं पता कि इस चमक के नीचे कितनी काली कहानियाँ पल रही हैं। यह सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं, यह उस हर रिश्ते पर एक घाव है, जिस पर भरोसे की नींव टिकी होती है।
क्या अब माँ का दर्जा सिर्फ कागज़ों पर ही पूज्यनीय रह गया है? और यदि नहीं, तो हमारी अगली पीढ़ी को रिश्तों की कीमत कौन बताएगा, जब खुद अपने ही खून के रिश्ते सात लाख में बिक रहे हों?