जयपुर संपादकीय — 14 July 2026
माँ की क़ीमत, सरकारी नौकरी का मोल
संपादक की राय
पिंकसिटी में आज फिर खून की स्याही से एक ऐसी कहानी लिखी गई है, जहाँ रिश्तों की मर्यादा का आखिरी कतरा भी सूख गया है। जिस शहर को दुनिया के सबसे खूबसूरत शहरों में शुमार किया जाता है, वहाँ एक बेटी ने अपनी ही माँ का गला रेतने के लिए सात लाख रुपये की सुपारी दी। क्या यही हमारा ‘विश्व स्तरीय’ समाज है, जहाँ एक अदद सरकारी नौकरी माँ के जीवन से ज़्यादा कीमती हो गई?
यह सौदा सिर्फ़ रुपयों का नहीं था, यह सौदा था आत्मा की बिक्री का। एक बेटी, जिसने माँ के आँचल में पलकर बड़े होने की बजाय, उसकी हत्या का ताना-बाना बुना। सात लाख रुपये… क्या वाकई सरकारी नौकरी की चमक इतनी चौंधियाने वाली है कि उसने ममता की आँखें फोड़ दीं, या फिर यह उस समाज का नंगा सच है जहाँ हर रिश्ते की कीमत सिर्फ़ संख्या में आँकी जाती है?
सरकारी नौकरी। आह! यह दो शब्द नहीं, हमारे समाज की एक सामूहिक सनक हैं। सुरक्षा, रुतबा, और एक झटके में ज़िंदगी संवार देने का वादा। यह ऐसा मृगतृष्णा है जिसके पीछे दौड़ते-दौड़ते लोग अपनी जड़ों को, अपने संस्कारों को, और अब अपनी माँ को भी मिट्टी में मिला रहे हैं। क्या किसी भी नौकरी की गरिमा इतनी बड़ी हो सकती है कि वह माँ के बलिदान को निगल जाए?
यह मामला सिर्फ़ एक बेटी की क्रूरता का नहीं। यह उस व्यवस्था का भी आईना है, जहाँ सरकारी नौकरी पाना एक ऐसा स्वर्ण-द्वार बन चुका है, जिसके लिए लोग साम, दाम, दंड, भेद… और अब हत्या तक करने को तैयार हैं। क्या हमारी शिक्षा प्रणाली, हमारी आर्थिक नीतियाँ और हमारी सामाजिक मूल्य-पद्धति कहीं इस विकृति को बढ़ावा तो नहीं दे रही हैं?
और कहानी में एक और खौफ़नाक मोड़। अब शक है कि इसी बेटी ने अपने पिता की हत्या में भी हाथ बँटाया था। यह एक वारदात नहीं, यह तो अपराध की एक पूरी श्रृंखला है, जो एक ही घर की चारदीवारी के भीतर रची गई। क्या यह सामान्य इंसान है, या हमने अपने बीच ऐसे भेड़िए पाल लिए हैं जो रिश्तों का मांस नोचते हैं?
गुलाबी नगरी की चमक के नीचे यह कैसा स्याह अंधेरा पसरा है? एक ओर दुनिया हमें पर्यटन के नक्शे पर चमका रही है, और दूसरी ओर हमारे घरों के भीतर ऐसी वीभत्स घटनाएँ घट रही हैं, जो रूह कंपा देती हैं। यह कैसा विकास है, जो इमारतों को तो ऊँचा कर रहा है, पर इंसानी मूल्यों को पाताल में धकेल रहा है?
जब एक सरकारी नौकरी इतनी बड़ी हो जाए कि वह रिश्तों की सारी पवित्रता को भस्म कर दे, तो हमें रुककर सोचना चाहिए। यह सिर्फ़ कानून-व्यवस्था का मसला नहीं। यह हमारे समाज के उस खोखलेपन का प्रमाण है, जहाँ महत्वाकांक्षा ने हर मानवीय भावना को रौंद दिया है।
तो अब सवाल यह नहीं कि उसे सजा क्या मिलेगी। सवाल यह है कि हम किस दिशा में जा रहे हैं? क्या हर चमकती चीज़ सोना है, या इस चमक के पीछे एक घिनौना अँधेरा है जो हमें लीलने को तैयार बैठा है?