जयपुर संपादकीय

पोक्सो पीड़िता: न्याय की चौखट से गुम

संपादक की राय

जयपुर में बैठकर जब हम यह खबर पढ़ते हैं कि जिस नाबालिग ने बलात्कार का आरोप लगाया था, वह फिर गायब हो गई है और पुलिस को शक है कि उसे उसी आरोपी ने उठाया है जिसके खिलाफ पॉक्सो का मामला दर्ज है, तो सवाल सिर्फ पीड़िता की सुरक्षा का नहीं, बल्कि हमारी पूरी व्यवस्था की आत्मा का उठ खड़ा होता है। यह कैसा न्याय है जहां एक बार आवाज उठाने के बाद भी बच्ची को अपनी जान और इज्जत के लिए हर पल खौफ में जीना पड़ता है?

पुलिस के कागजों में एक ‘पॉक्सो केस’ दर्ज है। अदालत में शायद सुनवाई भी चल रही होगी। लेकिन उस कागजी कार्यवाही का क्या अर्थ, जब आरोपी इतना बेखौफ है कि वह पीड़िता को दोबारा गायब कर सकता है? क्या कानून सिर्फ रस्म अदायगी के लिए बना है? क्या एक लड़की की सुरक्षा की जिम्मेदारी सिर्फ उसी पर है, या उस व्यवस्था पर भी जिसे हम ‘रक्षक’ कहते हैं?

पिंक सिटी की चमक-धमक और रंगीन मिजाजी के पीछे अक्सर ऐसे स्याह सच छिपे रहते हैं, जिन पर पर्दा डालना हमारी फितरत बन गई है। हम विकास के दावे करते हैं, स्मार्ट सिटी की बात करते हैं, लेकिन शहर की गलियों में सिसकती सुरक्षा और कानून के सामने दम तोड़ते विश्वास की कहानियों से आंखें फेर लेते हैं। क्या यही हमारी तरक्की है?

अब पुलिस की टीमें तलाश में निकली हैं। यह सुनकर मन में एक कड़वी मुस्कान आती है। जब मोबाइल स्विच ऑफ होने की खबर आती है, तो क्या यह इतनी बड़ी खोज होती है? यह सब कुछ ‘हो जाने’ के बाद की कवायद क्यों? जिस आरोपी पर पहले से संगीन आरोप हैं, क्या उसकी निगरानी इतनी लचर थी कि वह फिर से अपने नापाक इरादों में कामयाब हो सके?

यह घटना सिर्फ एक बच्ची के अपहरण की नहीं, बल्कि उस हर लड़की के भरोसे के अपहरण की है जो किसी दरिंदे के खिलाफ आवाज उठाने की हिम्मत करती है। यह सवाल उठाती है कि क्या हमारे कानून का खौफ अपराधियों के लिए है भी, या वे उसे सिर्फ एक कागजी खानापूर्ति मानते हैं? आरोपी खुले घूमते रहें और पीड़िताएं खौफ में जीती रहें, यह कैसा न्याय है?

क्या हमें यह मानना पड़ेगा कि कानून का डंडा सिर्फ कमजोरों पर चलता है, और जिनके हाथ सत्ता या पैसे की डोर से जुड़े हैं, वे बेखौफ घूम सकते हैं? यह कैसा समाज है जहां एक नाबालिग को न्याय की उम्मीद में अपनी जान जोखिम में डालनी पड़ती है, और अंत में उसे फिर उसी अंधेरे में धकेल दिया जाता है जिससे वह बाहर निकलने की कोशिश कर रही थी?

यह सिर्फ एक ‘केस’ नहीं है, यह हमारे समाज और व्यवस्था के माथे पर लगा एक ऐसा दाग है जिसे धोना आसान नहीं होगा। यह उन सभी मासूम चेहरों पर सवालिया निशान है जो अब भी न्याय की आस लगाए बैठे हैं। क्या उन्हें भी यही दिन देखने पड़ेंगे?

जब न्याय के मंदिर से आवाज लगाने वाली खुद ही गुम हो जाए, तो फिर किस पर भरोसा करें?