जयपुर संपादकीय — 16 July 2026
खाकी का तबादला, जनता का क्या?
संपादक की राय
जयपुर के थानों में हर कुछ दिनों बाद कुर्सियां घूमती हैं, नाम बदलते हैं, और कागज़ों पर एक नई ‘व्यवस्था’ अवतरित होती है। क्या वाकई यह फेरबदल किसी बड़ी समस्या का हल है, या बस वह चिरपरिचित बहाना है जो हमारी नौकरशाही दशकों से ढूंढती आई है – कि समस्या को ठीक करने से बेहतर है, उसे एक जगह से उठाकर दूसरी जगह रख देना? गुलाबी नगरी की गलियों में यह खेल कोई नया नहीं, पर हर बार यह सवाल उतनी ही शिद्दत से पूछता है: इन तबादलों से किसे फ़र्क पड़ता है, सिवाय उन चंद अफ़सरों के जिनकी तरक्की या सज़ा का हिसाब होता है?
प्रशासनिक सुधारों की दुहाई देते हुए जब अधिकारी बस एक दफ़्तर से दूसरे दफ़्तर भेज दिए जाते हैं, तब कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर क्या बदलता है? शायद कुछ नहीं, सिवाय इसके कि नए साहब के आने पर फ़ाइलों का ढेर फिर से खंगाला जाता है, और पुराने मामलों में नई सिरे से ‘गति’ देने का ढोंग रचा जाता है। यह कैसी दक्षता है, जहाँ हर दूसरे महीने अधिकारियों को यह समझने में लग जाता है कि उनके नए कार्यक्षेत्र में क्या चल रहा है और कौन किसे जानता है।
यह तो सत्ता के गलियारों का वह काला जादू है, जहाँ नेता अपनी पसंद के मोहरे बिठाते हैं और नापसंदों को दूर फेंकते हैं। इन तबादलों की सूची सिर्फ़ कागज़ का एक टुकड़ा नहीं होती, बल्कि यह इस बात का सीधा प्रमाण होती है कि कौन कितना ताक़तवर है, और किसकी जुबान पर सरकार का कितना भरोसा है। आम नागरिक, जो रात को बेख़ौफ़ सोना चाहता है, उसे बस दूर से यह तमाशा देखने को मिलता है।
जब शहर के एक छोर से दूसरे छोर तक अपराध की ख़बरें गूंजती हैं, तो हमें बताया जाता है कि ‘जांच जारी है’ और ‘कड़े कदम उठाए जा रहे हैं’। ये ‘कड़े कदम’ अक्सर अफ़सरों के बस्ते उठवाने तक ही सीमित रह जाते हैं। क्या कोई सोचता है कि लगातार बदलते चेहरे ज़मीनी स्तर पर काम कर रहे पुलिसवालों का मनोबल कितना गिराते होंगे? कौन सी स्थाई रणनीति बनेगी, कौन से अपराधी पकड़े जाएंगे, जब हर कुछ दिन में रणनीति बनाने वाले ही बदल जाते हैं?
सवाल यह है कि क्या जयपुर की पुलिस व्यवस्था इतनी लचर है कि उसे लगातार सर्जरी की ज़रूरत पड़ती है? या फिर हमारी व्यवस्था ने यह मान लिया है कि समस्या को जड़ से मिटाने की बजाय, उसकी सतह पर लीपापोती करना ज़्यादा आसान है? हर नया डीसीपी, हर नया एसएचओ अपनी ‘नई पहल’ की बात करता है, जो अक्सर उसके तबादले के साथ ही दम तोड़ देती है।
यह विडंबना नहीं तो और क्या है कि हम एक तरफ़ तकनीक और आधुनिक पुलिसिंग की बात करते हैं, और दूसरी तरफ़ हमारे अफ़सरों की ऊर्जा इस बात में खप जाती है कि नया दफ़्तर कहाँ मिलेगा और कौन सा फ़ोन नंबर काम करेगा। क्या यह उम्मीद करना ज़्यादा है कि पुलिस अपनी कुर्सी पर टिक कर काम करे और अपराधियों की जड़ों तक जाए, न कि बस अपनी कुर्सी से दूसरी कुर्सी तक का सफ़र तय करे?
इन प्रशासनिक फेरबदल का असली बोझ किस पर पड़ता है? न उस मंत्री पर जो आदेश पर दस्तख़त करता है, न उस अफ़सर पर जो नई गाड़ी में बैठकर नए दफ़्तर जाता है। इसका बोझ पड़ता है उस आम नागरिक पर, जो शिकायत लेकर बार-बार एक ही कहानी सुनाता है, और हर बार उसे एक नया चेहरा मिलता है जो ‘मामले को देखेगा’।
तो चलिए, यह तबादलों का खेल जारी रहे। नई सूचियाँ छपती रहें, अफ़सर अपनी गाड़ियों में घूमते रहें। मगर इस सब के बीच, जो सवाल कभी नहीं बदलते, वे हैं: मेरी सुरक्षा का क्या? मेरे न्याय का क्या? और इस शहर में सुशासन की उम्मीद का क्या?