जयपुर संपादकीय

जनाना अस्पताल: जीवन की उम्मीदों पर अँधेरा

संपादक की राय

जनाना अस्पताल, जहाँ जीवन का पहला अध्याय लिखा जाता है, वहाँ ऑपरेशन थिएटर की बत्तियाँ बुझ जाएं और रक्त बैंक ठप्प पड़ जाए – क्या यह सिर्फ़ एक इत्तफ़ाक था, या हमारी व्यवस्था की शिराओं में दौड़ता बिजली का वह करंट, जो अब बेजान हो चुका है? गुलाबी शहर की चकाचौंध में यह स्याह सच कितने चेहरों से नक़ाब उठा रहा है।

तीन घंटे का अँधेरा! ये सिर्फ़ समय की इकाई नहीं, उन माओं की धड़कनें थीं, उन शिशुओं का भविष्य था, जो शायद किसी ऑपरेशन टेबल पर पड़े होंगे। जब अस्पताल ही अपनी सांसें रोकने लगे, तो मरीज़ किस उम्मीद से भीतर आएँ? क्या ‘आपातकाल’ शब्द सिर्फ़ फाइलों में सिमट कर रह गया है?

सवाल उठता है कि क्या जयपुर में बिजली का कटना कोई नई बात है? दशकों से यह शहर अनियमित बिजली कटौती का आदी रहा है। पर एक अस्पताल, जहाँ हर पल जीवन-मृत्यु का खेल चलता है, वहाँ के लिए वैकल्पिक व्यवस्था कहाँ थी? क्या जेनरेटर सिर्फ़ सजावट के लिए हैं, या उनकी देखभाल भी उतनी ही शिद्दत से होती है, जितनी नेताओं के काफिलों की?

हमें बताया जाता है कि जयपुर ‘स्मार्ट सिटी’ बन रहा है, विश्व स्तरीय सुविधाएँ मिल रही हैं। पर जब एक सरकारी अस्पताल तीन घंटे तक अँधेरे में डूबा रहे, तो कौन-सी स्मार्टनेस और कौन-सी विश्व-स्तरीय सुविधा की बात करते हैं हम? यह ‘विकास’ का कौन-सा मॉडल है, जहाँ नींव ही जर्जर हो?

इस घटना पर भी वही पुरानी रस्मी प्रतिक्रियाएँ आएँगी। ‘जाँच कमेटी’ का गठन होगा, कागज़ों का पेट भरा जाएगा, और कुछ दिनों बाद यह मामला भी शहर के शोर में कहीं दब जाएगा। किसी की जवाबदेही तय नहीं होगी, किसी पर कोई गाज नहीं गिरेगी। क्योंकि इस शहर में ‘लापरवाही’ एक सरकारी विभाग का स्थायी सदस्य बन चुकी है।

यह सिर्फ़ बिजली की आपूर्ति का मसला नहीं, यह उस मानसिक अंधेपन का प्रतीक है, जो व्यवस्था को भीतर से खोखला कर रहा है। जब सत्ता के गलियारों में बैठे लोग अपनी वातानुकूलित इमारतों से बाहर निकलकर ज़मीनी हकीकत देखेंगे, तब शायद उन्हें एहसास होगा कि यह अँधेरा सिर्फ़ अस्पताल में नहीं, हमारी नागरिकता की चेतना में भी घुसपैठ कर रहा है।

अगली बार जब कोई बच्चा या माँ सिर्फ़ इस वजह से मौत के मुँह में समा जाए कि किसी ने एक स्विच ऑन रखना ज़रूरी नहीं समझा, तब क्या हम उसे सिर्फ़ ‘दुर्घटना’ कहकर पल्ला झाड़ लेंगे? या उस दिन हम पूछेंगे, कि हमारी उम्मीदों के इस जनाना अस्पताल में, आखिर कब तक अँधेरा रहेगा?