जयपुर संपादकीय

जनाना का अँधेरा, सरकारी उजियारा

संपादक की राय

गुलाबी नगर के जनाना अस्पताल में जब बिजली गुल हुई, तब क्या किसी ने सोचा कि ऑपरेशन टेबल पर पड़ा मरीज़ किस अंधेरे में डूब गया होगा? यह सिर्फ़ कुछ मिनटों का व्यवधान नहीं था; यह उस व्यवस्था के खोखलेपन का सीधा प्रदर्शन था जो जीवन बचाने के सबसे बुनियादी साधन को भी अक्षुण्ण रखने में असमर्थ है।

जयपुर को ‘स्मार्ट सिटी’ और ‘विश्वस्तरीय’ बनाने के दावे करने वालों से कोई पूछे कि उस अंधेरे ऑपरेशन थिएटर में क्या ‘विश्वस्तरीय’ था? क्या खून के इंतज़ार में पड़ी नन्ही ज़िंदगी को ‘स्मार्ट’ बिजली के वादे से बचाया जा सकता था, जब रक्त बैंक के रेफ्रिजरेटर दम तोड़ रहे थे?

यह सिर्फ़ एक ‘तकनीकी ख़राबी’ का बहाना नहीं हो सकता। यह उस लापरवाही का परिणाम है जो हमारी सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की रीढ़ को दीमक की तरह खा रही है। क्या जनरेटर चलाने के लिए ईंधन नहीं था, या उसकी जाँच करने की फुर्सत नहीं थी? या फिर, नागरिकों की ज़िंदगी की क़ीमत इतनी सस्ती हो चुकी है कि ऐसे हादसों पर केवल कंधा उचका कर आगे बढ़ जाया जाता है?

उस दिन, कई परिवारों की उम्मीदें उन बंद पड़े उपकरणों के साथ ठहर गई होंगी। क्या किसी ने उन आँखों में झाँका, जो अपने प्रियजनों की सलामती के लिए दुआ कर रही थीं, और अचानक एक छोटे से स्विच के बंद होने से उनकी दुनिया थमने लगी? प्रशासन के लिए यह एक और फ़ाइल होगी, पर पीड़ित के लिए ज़िंदगी और मौत के बीच का फ़र्क।

अफ़सरशाही की मोटी चमड़ी पर ऐसे वाकये कोई असर नहीं करते। एक जाँच बिठा दी जाएगी, कुछ काग़ज़ों पर हस्ताक्षर होंगे, और फिर वही पुरानी चाल। किसी को सज़ा नहीं मिलेगी, किसी की जवाबदेही तय नहीं होगी। क्योंकि यहाँ तो ‘काम’ कागज़ों पर होता है, ज़मीनी हक़ीक़त से उसका कोई संबंध नहीं।

यह सिर्फ़ जनाना अस्पताल का मुद्दा नहीं, यह उस पूरे तंत्र का आईना है जहाँ बड़ी-बड़ी योजनाओं की बातें तो होती हैं, पर बुनियादी सुविधाओं को हमेशा अनदेखा किया जाता है। जब शहर बड़े-बड़े वादों की इमारतें खड़ी करने में व्यस्त है, तब मूलभूत सुविधाओं की नींव क्यों चरमरा रही है?

हमारी आँखों के सामने यह सब होता है, और हम चुपचाप देखते रहते हैं। क्या हम अपनी सरकारों से यह भी नहीं पूछ सकते कि क्या हमारा जीवन इतना सस्ता है कि एक मामूली बिजली कट भी हमें मौत के मुहाने तक धकेल सकता है? या फिर, अब हमने मान लिया है कि यही हमारी नियति है?

अगली बार जब कोई नेता मंच से विकास के बड़े-बड़े दावे करेगा, तो ज़रा उस अंधेरे ऑपरेशन थिएटर की कल्पना कर लीजिएगा। शायद तब हमें ‘उजियारे’ और ‘अंधेरे’ के बीच का असली फ़र्क समझ आएगा।