जयपुर संपादकीय — 19 July 2026
हवेली का ‘ख़ज़ाना’: खुदाई किसकी, कमाई किसकी?
संपादक की राय
जयपुर की पुरानी हवेलियों में जब खुदाई होती है, तो अक्सर उम्मीद होती है कि इतिहास की कोई परत खुलेगी। लेकिन, ‘बॉम्बे वालों की हवेली’ में जो खुला, वह इतिहास से ज़्यादा वर्तमान के लालच की कहानी है। अचानक ज़मीन से निकली तिजोरी और सोने के घड़ों की अफवाहें, गुलाबी नगर में सदियों से दबी पड़ी उस भूख को फिर जगा गई हैं, जिसका नाम है – अनायास मिला धन।
यह कैसी खुदाई थी, जिसमें ठेकेदार को ‘ख़ज़ाना’ पहले दिखा? या यह सिर्फ़ एक इत्तेफ़ाक था कि हवेली का नया ख़रीदार और खुदाई करने वाला ठेकेदार, दोनों ही अचानक ‘अतीत के विशेषज्ञ’ बन बैठे? एक तिजोरी गायब होने के दावे के साथ, हर हाथ उस कथित ‘ख़ज़ाने’ की ओर ऐसे लपका है, मानो ज़मीन ने नहीं, बल्कि किस्मत ने खुद उन्हें पुकारा हो।
राज्य का नियम कहता है कि ज़मीन के नीचे जो कुछ भी है, वह सरकार का है। लेकिन, जब तक घड़े मिट्टी में दबे थे, तब तक किसी को परवाह नहीं थी। अब जब उनके अंदर से सोना झाँकने लगा है, तो अचानक क़ानून के रखवाले भी सक्रिय हो गए हैं। यह सक्रियता अगर पहले होती, तो शायद ऐसी ‘खोज’ और ‘चोरी’ के दावों का खेल ही शुरू न होता।
जयपुर, जो अपने शाही वैभव और समृद्ध विरासत के लिए जाना जाता है, आज उसी विरासत के टुकड़ों पर लड़ रहा है। ‘बॉम्बे वालों की हवेली’ की दीवारों में क्या सिर्फ़ ईंट-पत्थर थे या सदियों से दबी उम्मीदें और लालच? यह विडंबना है कि जिस शहर की पहचान ही उसके गौरवशाली इतिहास से है, वहीं ज़मीन से निकला कोई भी अवशेष संग्रहालय में पहुँचने से पहले ही अदालती मुकदमों और निजी झगड़ों की भेंट चढ़ जाता है।
एक तरफ़ आम आदमी मामूली दस्तावेज़ों के लिए सरकारी दफ़्तरों के चक्कर काटता है, तो दूसरी तरफ़ कुछ ‘भाग्यशाली’ लोग ज़मीन खोदते ही अकूत संपत्ति के मालिक बनने के सपने देखने लगते हैं। इस तथाकथित ‘ख़ज़ाने’ की एक तिजोरी ग़ायब होने की ख़बर बताती है कि प्रशासन की आँखें तब खुलती हैं, जब ‘अमूल्य’ वस्तुएँ अदृश्य हो जाती हैं, न कि तब जब उन्हें खोजा जा रहा होता है।
क्या यह ‘ख़ज़ाना’ कभी सार्वजनिक होगा? क्या यह कभी राज्य के कोष में पहुँचेगा और जनता के विकास के लिए इस्तेमाल होगा? या फिर यह भी उन अनगिनत कहानियों में से एक बन कर रह जाएगा, जहाँ ‘खोज’ का शोर होता है, ‘दावों’ की लड़ाई होती है, और अंत में सिर्फ़ ‘अदृश्य’ हो जाने की ख़बर आती है? ज़मीन से निकला सोना अक्सर नेताओं और अफ़सरों की जेबों में ही समा जाता है, इतिहास गवाह है।
यह पहली बार नहीं है और न ही आख़िरी होगा कि ऐसी कहानियाँ सुर्ख़ियाँ बनेंगी। हर कुछ समय बाद, राजस्थान की मिट्टी अपने गर्भ से ऐसे ‘आश्चर्य’ उगलेगी, और हर बार वही नाटक दोहराया जाएगा। लालच का वही खेल, क़ानून की वही धीमी चाल, और जनता की वही बेबसी जो सिर्फ़ तमाशा देखती रह जाती है।
तो सवाल यह नहीं कि ज़मीन से सोना निकला या नहीं। सवाल यह है कि गुलाबी नगर में कब तक सिर्फ़ ज़मीन के नीचे दबे ‘ख़ज़ाने’ ही दिखेंगे, और कब यहाँ की व्यवस्था के अंदर दबी ईमानदारी और जवाबदेही की उम्मीद जगेगी? शायद यह ‘ख़ज़ाना’ हमें फिर एक बार आईना दिखा रहा है कि असली ‘गड़े मुर्दे’ हमारी नियत में हैं, ज़मीन में नहीं।