जयपुर संपादकीय — 20 July 2026
न्याय की कुर्सी पर मुकदमे का इंतज़ार
संपादक की राय
गुलाबी नगर में आज एक अजीब सा सन्नाटा पसरा है। यह सन्नाटा उन सवालों का है जो हवा में तैर रहे हैं, पर कोई उन्हें सुनना नहीं चाहता। जब प्रदेश के पाँच माननीय मंत्रियों और तेरह विधायकों पर आपराधिक मुकदमे धूल फाँक रहे हों, तो न्याय की देवी की आँख पर बंधी पट्टी भी शायद तिरछी हो जाती होगी। अदालतें तारीख़ पर तारीख़ देती हैं, पर क्या कोई हिसाब रखता है कि ये तारीख़ें कितनों के सपनों को निगल जाती हैं और कितनों के हौसलों को तोड़ देती हैं?
विधानसभा के गलियारों में घूमते हुए इन ‘जनसेवकों’ को देखकर क्या कभी किसी को यह नहीं लगता कि इनके सिर पर कानून की तलवार नहीं, बल्कि एक लटकती हुई तख्ती है जिस पर ‘विचाराधीन’ लिखा है? जनता से उम्मीद की जाती है कि वह कानून का पालन करे, हर नियम माने, चालान कटवाए, पर उन्हीं पर कानून लागू करने वाले, या यूँ कहें कि कानून बनाने वाले, खुद कानून की गिरफ़्त से बाहर क्यों दिखते हैं?
एक मुकदमा तो सिर्फ़ गवाहों के न आने के कारण अटका पड़ा है। कल्पना कीजिए, एक आम आदमी का मामला होता तो क्या होता? क्या पुलिस उस गवाह को ढूँढ नहीं लाती, या खुद अदालत ही उसे तलब करने के लिए पूरा तंत्र झोंक देती? पर यहाँ बात ‘माननीयों’ की है। शायद उनके रसूख की परछाई इतनी लंबी है कि गवाह उस तक पहुँचते-पहुँचते रास्ता भटक जाते हैं।
यह सिर्फ़ लंबित मुकदमों का आँकड़ा नहीं है, यह उस व्यवस्था का चेहरा है जहाँ सत्ता की ताक़त न्याय की रफ़्तार को तय करती है। ये वही लोग हैं जो मंचों से सुशासन और पारदर्शिता के दावे करते हैं। इन्हीं के भाषणों में कानून का राज स्थापित करने की बातें होती हैं। पर जब आईना उनके अपने गिरेबाँ में झाँकने को कहता है, तो या तो आईना तोड़ दिया जाता है, या उसे धुँधला बता दिया जाता है।
एक तरफ़ आम नागरिक छोटी सी गलती के लिए महीनों जेल में सड़ता है, तो दूसरी तरफ़ जिनके नाम के आगे ‘मंत्री’ या ‘विधायक’ जुड़ा है, उन पर संगीन आरोप होने के बावजूद वे आज़ादी से घूमते हैं, जनसभाएँ करते हैं और अगली कुर्सी की जुगत में लगे रहते हैं। क्या यह दोहरा मापदंड नहीं है? क्या यह न्याय की सबसे बड़ी विडंबना नहीं कि जिन हाथों में कानून की रखवाली की जिम्मेदारी है, उन्हीं पर कानून के उल्लंघन के आरोप हैं?
हम गुलाबी नगर के नागरिक सदियों से देखते आ रहे हैं कि कैसे सत्ता के केंद्र में बैठे लोग खुद को आम नियमों से ऊपर समझते हैं। चाहे वह अवैध अतिक्रमण हो या भ्रष्टाचार का कोई छोटा-मोटा खेल, जब तक कोई ‘बड़ा नाम’ शामिल न हो, तब तक कानून की लाठी सिर्फ़ कमज़ोर पर बरसती है। इन मुकदमों का लंबित रहना कोई संयोग नहीं, यह एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा लगता है।
सवाल यह नहीं कि वे निर्दोष हैं या दोषी। सवाल यह है कि न्याय की प्रक्रिया उनके लिए इतनी सुस्त और सुविधाजनक क्यों है? क्या कानून की किताब में ‘माननीय’ के लिए अलग से कोई अध्याय है, जहाँ तारीख़ें अपनी मर्ज़ी से चलती हैं और सबूत अपनी शक्ल बदलने में आज़ाद होते हैं? या फिर हमारी अदालतों को भी पता है कि इस खेल का असली नतीजा क्या होना है, इसलिए वे सिर्फ़ वक्त काट रही हैं?
यह उन मतदाताओं के साथ सीधा मज़ाक है जिन्होंने उन्हें चुना है। यह उन सभी के साथ अन्याय है जो न्याय की उम्मीद लगाए कोर्ट-कचहरी के चक्कर काटते हैं। क्या हम सिर्फ़ यही मान लें कि हमारे ‘माननीय’ तब तक निर्दोष हैं जब तक उनकी कुर्सी सलामत है? और अगर हाँ, तो फिर न्याय का यह नाटक कब तक चलेगा?